12 जुलाई 2026
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असम यूसीसी विधेयक 2025: भाजपा विधायक बिमल बोरा बोले — सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता की नींव है यह कानून

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असम यूसीसी विधेयक 2025: भाजपा विधायक बिमल बोरा बोले — सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता की नींव है यह कानून

सारांश

असम विधानसभा में BJP विधायक बिमल बोरा ने UCC विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 44 की पूर्ति और महिलाओं के लिए समान न्याय का माध्यम बताया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में असम इस विधेयक को आगे बढ़ाने वाला अग्रणी राज्य बन रहा है।

मुख्य बातें

BJP विधायक बिमल बोरा ने 27 मई को असम विधानसभा में UCC विधेयक का समर्थन करते हुए इसे ऐतिहासिक कदम बताया।
बोरा ने संविधान के अनुच्छेद 44 का हवाला दिया और कहा कि यह विचार संविधान निर्माताओं की मूल सोच का हिस्सा है।
विधेयक का उद्देश्य सभी समुदायों की महिलाओं को समान अधिकार और न्याय सुनिश्चित करना बताया गया।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने UCC विधेयक लाने का अपना वादा पूरा किया — 'एक राष्ट्र, एक कानून' BJP की वैचारिक प्रतिबद्धता।
विधेयक के पारित होने के बाद राज्यपाल की मंजूरी और संभावित कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

असम विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ विधायक बिमल बोरा ने बुधवार, 27 मई को समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पर चल रही बहस में हिस्सा लेते हुए इसे सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करार दिया। गुवाहाटी में विधानसभा के चालू सत्र के दौरान बोरा ने स्पष्ट किया कि यह विधेयक महज एक कानूनी प्रस्ताव नहीं, बल्कि भारत की विविधता में एकता की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिबिंब है।

विधेयक का संवैधानिक आधार

बोरा ने संविधान के अनुच्छेद 44 — राज्य के नीति निदेशक तत्वों — का हवाला देते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं ने स्वयं पूरे देश में एक समान नागरिक ढाँचा लागू करने की कल्पना की थी। उन्होंने कहा, 'यूसीसी का विचार अचानक या मनमाना नहीं है। यह संविधान निर्माताओं की सोच का हिस्सा था।' उनके अनुसार, यह विधेयक उसी संवैधानिक दृष्टि को व्यावहारिक रूप देने का प्रयास है।

उन्होंने जोर देकर कहा, 'यह विधेयक केवल कानूनी ढाँचा नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक एकता, सामाजिक न्याय और संवैधानिक चेतना को दर्शाता है।' गौरतलब है कि UCC को लेकर देश में वर्षों से बहस चली आ रही है और असम इसे विधायी स्तर पर आगे बढ़ाने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है।

विविधता में एकता का तर्क

भाजपा विधायक ने भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करते हुए कहा कि कश्मीर से कन्याकुमारी और पूर्वोत्तर से देश के अन्य हिस्सों तक भाषाएँ, परंपराएँ और रीति-रिवाज भले ही अलग हों, किंतु राष्ट्र की आत्मा एक ही है। उन्होंने कहा, 'भारत विविधताओं में एकता वाला राष्ट्र है। भाषाएँ, परंपराएँ और संस्कृतियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी भावना एक ही है।'

यह ऐसे समय में आया है जब पूर्वोत्तर भारत में विभिन्न समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को लेकर दीर्घकालिक सामाजिक विमर्श चल रहा है। असम में जनजातीय और गैर-जनजातीय समुदायों की बहुलता को देखते हुए यह विधेयक राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी माना जा रहा है।

महिलाओं के अधिकार और लैंगिक समानता

बोरा ने विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों पर जोर देते हुए कहा कि प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य सभी समुदायों की महिलाओं को सम्मान और न्याय सुनिश्चित करना है। उन्होंने लैंगिक समानता और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े न्यायालयों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान में कई कानूनी प्रावधान महिलाओं के साथ असमानता पैदा करते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि विवाह और परिवार की परंपराएँ समाज की मजबूत नींव हैं और यह विधेयक परिवारों में सामाजिक जिम्मेदारी और स्थिरता को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।

मुख्यमंत्री सरमा का वादा और 'एक राष्ट्र, एक कानून'

बोरा ने 'एक राष्ट्र, एक कानून' की अवधारणा को BJP की वैचारिक प्रतिबद्धता बताते हुए कहा कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने विधानसभा में UCC विधेयक लाने का अपना वादा पूरा किया है। उन्होंने इस विधेयक को विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए मुख्यमंत्री का आभार भी व्यक्त किया।

आगे की राह में यह विधेयक विधानसभा में पारित होने के बाद राज्यपाल की मंजूरी और संभावित कानूनी चुनौतियों से गुजरेगा। विपक्षी दलों और कुछ समुदायों की आपत्तियाँ इस प्रक्रिया को जटिल बना सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक-वैचारिक संदेश है — विशेषकर उस राज्य में जहाँ जनजातीय परंपराएँ और बहुसमुदायिक व्यक्तिगत कानून गहरी जड़ें रखते हैं। अनुच्छेद 44 का संदर्भ देकर विधायक बोरा ने विधेयक को संवैधानिक वैधता देने की कोशिश की, लेकिन आलोचक यह भी पूछते हैं कि क्या एकरूपता की यह परिभाषा पूर्वोत्तर की विविध जनजातीय पहचानों के साथ न्याय करती है। महिला अधिकारों की दुहाई सशक्त तर्क है, पर यह तभी विश्वसनीय होगा जब विधेयक में जनजातीय महिलाओं की परंपरागत संपत्ति और उत्तराधिकार संबंधी विशेष स्थिति की रक्षा के स्पष्ट प्रावधान हों — जिसका ब्यौरा अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

असम का UCC विधेयक क्या है और इसमें क्या प्रावधान हैं?
असम समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक राज्य में सभी नागरिकों पर एक समान व्यक्तिगत कानून लागू करने का प्रस्ताव है, जो विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में धर्म-निरपेक्ष नियम स्थापित करेगा। यह संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना पर आधारित बताया गया है।
BJP विधायक बिमल बोरा ने UCC विधेयक के समर्थन में क्या तर्क दिए?
बोरा ने कहा कि यह विधेयक संविधान निर्माताओं की मूल सोच का हिस्सा है और अनुच्छेद 44 इसकी संवैधानिक नींव है। उन्होंने महिलाओं के लिए समान न्याय और 'एक राष्ट्र, एक कानून' की अवधारणा को इसका मुख्य उद्देश्य बताया।
असम में UCC लागू होने पर किसे सबसे अधिक फर्क पड़ेगा?
विभिन्न धार्मिक और जनजातीय समुदायों की महिलाएँ इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगी, क्योंकि वर्तमान में उनके विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के अधिकार अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों से संचालित होते हैं। पूर्वोत्तर की जनजातीय परंपराओं पर इसका प्रभाव विशेष रूप से चर्चा में है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने UCC पर क्या वादा किया था?
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने असम विधानसभा में UCC विधेयक लाने का वादा किया था, जिसे BJP विधायक बिमल बोरा ने 27 मई की बहस में पूरा हुआ बताया। यह विधेयक BJP की 'एक राष्ट्र, एक कानून' की वैचारिक प्रतिबद्धता का हिस्सा है।
UCC विधेयक के विधानसभा में पारित होने के बाद क्या प्रक्रिया होगी?
विधानसभा में पारित होने के बाद विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी की आवश्यकता होगी। इसके बाद इसे संभावित कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, विशेषकर जनजातीय अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों को लेकर।
राष्ट्र प्रेस
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