12 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

असम यूसीसी विधेयक: सरमा का कांग्रेस पर प्रहार — 'सांप्रदायिक ताकतों के आगे झुकी पार्टी'

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
असम यूसीसी विधेयक: सरमा का कांग्रेस पर प्रहार — 'सांप्रदायिक ताकतों के आगे झुकी पार्टी'

सारांश

असम विधानसभा में यूसीसी विधेयक पारित होने से पहले सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस को उसकी ही विरासत से घेरा — राजेंद्र प्रसाद और पटेल का नाम लेकर। उनका आरोप: जो पार्टी कभी यूसीसी की पैरोकार थी, वही आज 'सांप्रदायिक ताकतों' के आगे झुक गई है।

मुख्य बातें

असम विधानसभा में 27 मई 2026 को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पर बहस हुई।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस पर 'सांप्रदायिक ताकतों के आगे घुटने टेकने' का आरोप लगाया।
सरमा ने यूसीसी को BJP या RSS नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम-युगीन कांग्रेस नेताओं की सोच बताया।
उन्होंने कहा कि आज की कांग्रेस डॉ.
राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल की कांग्रेस नहीं रही।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने विधेयक के कई प्रावधानों का विरोध किया।

असम विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पर 27 मई 2026 को हुई बहस के दौरान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ने अपनी संवैधानिक विरासत को त्यागकर 'सांप्रदायिक ताकतों' के सामने घुटने टेक दिए हैं। विधेयक पारित होने से पहले सदन में दिए गए अपने संबोधन में सरमा ने यूसीसी को कांग्रेस की ऐतिहासिक सोच का हिस्सा बताते हुए वर्तमान पार्टी नेतृत्व पर राजनीतिक अवसरवाद का आरोप लगाया।

यूसीसी की ऐतिहासिक जड़ें और सरमा का तर्क

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार न तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) की देन है और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की। उन्होंने तर्क दिया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने स्वयं एक समान नागरिक ढाँचे का सपना देखा था। उनके शब्दों में, 'यूसीसी की दिशा में प्रयास भाजपा या आरएसएस से शुरू नहीं हुए थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने भी देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का सपना देखा था।'

सरमा ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से यह परिकल्पना की गई है कि देश धीरे-धीरे समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ेगा। उन्होंने संविधान निर्माताओं की मंशा का हवाला देते हुए कहा, 'संविधान ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जैसे-जैसे देश आगे बढ़ेगा, भारत को समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ना चाहिए।'

कांग्रेस पर सीधा आरोप

सरमा ने कांग्रेस की वर्तमान स्थिति पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि आज की पार्टी डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार वल्लभभाई पटेल की कांग्रेस नहीं रही। उनके अनुसार पार्टी में धर्मनिरपेक्षता पर बोलने का साहस नहीं बचा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि यूसीसी विधेयक का विरोध करते हुए कांग्रेस संवैधानिक सिद्धांतों की बजाय धार्मिक मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है। उनके शब्दों में, 'कांग्रेस की जिम्मेदारी संविधान का प्रतिनिधित्व करने की थी, लेकिन आज पार्टी सिर्फ शरीयत और कुरान की बात कर रही है।'

असम और केरल का संदर्भ

मुख्यमंत्री ने असम और केरल जैसे राज्यों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस राजनीतिक कारणों से इन राज्यों में 'सांप्रदायिक ताकतों' के साथ खड़ी है। उनके अनुसार पार्टी अब सभी धर्मों के बारे में समान रूप से बोलने का आत्मविश्वास खो चुकी है और उसकी राजनीति चुनिंदा धार्मिक मुद्दों तक सीमित हो गई है।

सरकार और विपक्ष की स्थिति

BJP नीत असम सरकार का कहना है कि प्रस्तावित यूसीसी समानता सुनिश्चित करने और सभी नागरिकों को एक समान नागरिक अधिकार देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने विधेयक के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई है और सदन में इसका विरोध किया।

गौरतलब है कि उत्तराखंड के बाद असम यूसीसी लागू करने वाला दूसरा राज्य बनने की ओर अग्रसर है, जो इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर केंद्र में ले आता है।

आगे क्या

विधेयक के पारित होने के बाद इसके क्रियान्वयन की रूपरेखा तय करना असम सरकार की अगली बड़ी चुनौती होगी। विपक्षी दलों द्वारा इसे न्यायालय में चुनौती देने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। यह विधेयक आने वाले दिनों में असम की राजनीति और देश की यूसीसी बहस की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक पुनर्परिभाषा की कोशिश है — यूसीसी को 'हिंदुत्व एजेंडा' की बजाय 'कांग्रेस की भूली हुई विरासत' के रूप में स्थापित करना। यह रणनीति विपक्ष के उस मुख्य तर्क को कमज़ोर करती है जो इसे सांप्रदायिक रंग देता है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या असम का यूसीसी मॉडल वास्तव में सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार करता है, या कुछ प्रावधान चुनिंदा रूप से लागू होंगे — यह विश्लेषण अभी सार्वजनिक बहस से गायब है। उत्तराखंड के अनुभव से सबक लेना ज़रूरी है, जहाँ क्रियान्वयन की जटिलताएँ अभी भी सुलझाई जा रही हैं।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

असम यूसीसी विधेयक क्या है और इसमें क्या प्रावधान हैं?
असम यूसीसी विधेयक राज्य में सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में एक समान कानूनी ढाँचा लागू करने का प्रस्ताव करता है। BJP नीत असम सरकार इसे समानता और संवैधानिक दिशा-निर्देश के अनुरूप बताती है।
सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस पर क्या आरोप लगाए?
सरमा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपनी संवैधानिक विरासत छोड़कर 'सांप्रदायिक ताकतों' के सामने समर्पण कर दिया है। उन्होंने कहा कि पार्टी अब संविधान की बजाय धार्मिक मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है और असम व केरल में राजनीतिक कारणों से ऐसी ताकतों के साथ खड़ी है।
कांग्रेस और विपक्ष ने यूसीसी विधेयक का विरोध क्यों किया?
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने विधेयक के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि यह विधेयक विभिन्न धार्मिक समुदायों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और परंपराओं में अनुचित हस्तक्षेप करता है।
यूसीसी का विचार कांग्रेस की विरासत से कैसे जुड़ा है?
सरमा के अनुसार, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं ने भी समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था। भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में भी यूसीसी लागू करने की परिकल्पना की गई है।
असम में यूसीसी लागू होने के बाद आगे क्या होगा?
विधेयक के पारित होने के बाद सरकार को इसके क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा तैयार करनी होगी। विपक्षी दलों द्वारा इसे न्यायालय में चुनौती देने की संभावना है। उत्तराखंड के बाद असम यूसीसी लागू करने वाला दूसरा राज्य बन सकता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 1 महीना पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 1 महीना पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 1 महीना पहले
  8. 1 महीना पहले