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असम यूसीसी विधेयक 2025: विपक्षी विधायकों का विरोध, बोले— 'राज्य के लोगों को कोई लाभ नहीं'

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असम यूसीसी विधेयक 2025: विपक्षी विधायकों का विरोध, बोले— 'राज्य के लोगों को कोई लाभ नहीं'

सारांश

असम विधानसभा में यूसीसी विधेयक पेश होते ही विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस ने इसे 'राजनीतिक एजेंडा' बताया, तो अखिल गोगोई ने इसे 'निजी जीवन पर हमला' करार दिया। बहु-जातीय असम में यह बहस सिर्फ कानूनी नहीं, सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई भी बन गई है।

मुख्य बातें

27 मई 2025 को असम विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने यूसीसी विधेयक पेश किया।
कांग्रेस विधायक जाकिर हुसैन सिकदर ने कहा— 'यूसीसी केवल भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिए लाया गया है।' रायजोर दल के अध्यक्ष अखिल गोगोई ने विधेयक को 'निजी जीवन पर हमला' बताया और इसे वापस कराने का संकल्प लिया।
विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने विधेयक को असम की अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए लाभकारी बताया।
विपक्ष ने आगामी सत्र में विरोध प्रदर्शन जारी रखने की चेतावनी दी है।

असम विधानसभा में 27 मई 2025 को संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा द्वारा पेश किए गए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पर सदन में तीखी बहस छिड़ गई है। सत्ता पक्ष जहाँ इसे सभी वर्गों के हित में बता रहा है, वहीं विपक्षी दलों के विधायक इसे राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज करा रहे हैं।

विपक्ष की मुख्य आपत्तियाँ

कांग्रेस विधायक जाकिर हुसैन सिकदर ने सदन में स्पष्ट शब्दों में कहा, 'असम में यूसीसी की कोई आवश्यकता नहीं है। यूसीसी लागू होने के बाद असम के लोगों को कोई लाभ नहीं होगा। इसे केवल राजनीतिक एजेंडे के लिए लाया गया है। इसे भाजपा के लाभ के लिए लाया गया है और इससे हमारे लोगों को कोई लाभ नहीं होगा।' यह बयान विधानसभा में विपक्ष की एकजुट स्थिति का प्रतिबिंब है।

कांग्रेस विधायक तंजील हुसैन ने भी विरोध की पुष्टि करते हुए कहा कि उनकी पार्टी आगामी सत्र में भी इस विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी रखेगी।

रायजोर दल का तीखा हमला

रायजोर दल के अध्यक्ष एवं विधायक अखिल गोगोई ने यूसीसी को असम के लोगों के निजी जीवन पर 'हमला' करार दिया। उन्होंने कहा, 'यह राज्य को लोगों की निजी गोपनीयता पर नज़र रखने का एक तरीका देता है। नौकरशाही आपकी जीवनशैली पर नज़र रखेगी और आपके जीवन पर प्रत्यक्ष निगरानी रखी जाएगी।' गोगोई ने सर्वोच्च न्यायालय के हवाले से यह भी तर्क दिया कि निजी जीवन के मामलों में विधानसभा की सीमाएँ हैं, और ऐलान किया कि वे इस विधेयक को वापस कराएंगे।

गौरतलब है कि असम एक बहु-जातीय और बहु-धार्मिक राज्य है, जहाँ विभिन्न समुदायों के अपने पारंपरिक व्यक्तिगत कानून हैं। ऐसे में यूसीसी का विरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक आयाम भी लिए हुए है।

सत्ता पक्ष और विधानसभा अध्यक्ष का रुख

असम विधानसभा के अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने विधेयक का स्वागत करते हुए कहा, 'यह निश्चित रूप से असम के लिए बहुत अच्छा होगा। यह असम की अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी अच्छा रहेगा।' उन्होंने सभी पक्षों के साथ सहयोग का आश्वासन दिया। सत्ता पक्ष के विधायकों और मंत्रियों का तर्क है कि यूसीसी से समाज के सभी वर्गों को समान कानूनी सुरक्षा मिलेगी।

व्यापक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड पहले ही यूसीसी लागू कर चुका है और केंद्र सरकार भी राष्ट्रीय स्तर पर इस पर विचार-विमर्श कर रही है। असम में इस विधेयक का पेश होना देश के उन राज्यों की सूची में एक नया अध्याय जोड़ता है जो इस संवेदनशील कानूनी सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि पूर्वोत्तर की विविध जनजातीय और धार्मिक पहचान को देखते हुए यहाँ यूसीसी का क्रियान्वयन अधिक जटिल हो सकता है।

आगे क्या होगा

विधानसभा सत्र में विधेयक पर बहस जारी है और विपक्ष ने आगामी सत्रों में भी विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है। विधेयक के पारित होने या संशोधित होने की स्थिति स्पष्ट होने में अभी समय लग सकता है, लेकिन यह बहस असम की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असम की जटिल जातीय और धार्मिक संरचना इसे कहीं अधिक संवेदनशील बनाती है। विपक्ष का 'निजता के उल्लंघन' वाला तर्क केवल भावनात्मक नहीं है— सर्वोच्च न्यायालय के 2017 के पुट्टस्वामी फैसले की रोशनी में यह कानूनी बहस का वैध आधार भी है। असली सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार ने विधेयक का मसौदा तैयार करते समय पूर्वोत्तर की जनजातीय परंपराओं और संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षित समुदायों की स्थिति को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखा है— यह स्पष्टता अभी तक सामने नहीं आई है।
RashtraPress
12 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

असम यूसीसी विधेयक क्या है?
असम यूसीसी विधेयक राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रस्ताव है, जिसे 27 मई 2025 को संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने विधानसभा में पेश किया। इसका उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत कानूनों को सभी धर्मों और समुदायों के लिए एकसमान बनाना है।
कांग्रेस और रायजोर दल ने यूसीसी का विरोध क्यों किया?
कांग्रेस का कहना है कि यूसीसी असम के लोगों के लिए नहीं, बल्कि भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के लिए लाया गया है। रायजोर दल के अखिल गोगोई ने इसे नागरिकों की निजता पर 'सरकारी निगरानी' का औज़ार बताया और सर्वोच्च न्यायालय के निजता संबंधी फैसलों का हवाला दिया।
असम विधानसभा अध्यक्ष का यूसीसी पर क्या रुख है?
विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने विधेयक का समर्थन किया और इसे असम की अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए विशेष रूप से लाभकारी बताया। उन्होंने सभी पक्षों के साथ सहयोग का भी आश्वासन दिया।
असम में यूसीसी लागू होने पर किन लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ेगा?
असम की विविध जनजातीय, हिंदू और मुस्लिम आबादी पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है, क्योंकि उनके व्यक्तिगत कानून अलग-अलग धार्मिक और परंपरागत आधारों पर चलते हैं। आलोचकों का कहना है कि संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षित जनजातीय समुदायों की स्थिति पर अभी स्पष्टता नहीं है।
क्या असम से पहले किसी अन्य राज्य ने यूसीसी लागू किया है?
हाँ, उत्तराखंड भारत का पहला राज्य बना जिसने यूसीसी लागू किया। असम में यह विधेयक पेश होने के साथ यह देश का दूसरा बड़ा राज्य-स्तरीय यूसीसी प्रयोग बनने की दिशा में है, हालाँकि विधेयक अभी विधानसभा में बहस के चरण में है।
राष्ट्र प्रेस
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