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उदयपुर को देवास परियोजना से मिलेगा हर साल 1,000 एमसीएफटी अतिरिक्त पानी, पिछोला-फतेह सागर झीलों को मिलेगी संजीवनी

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उदयपुर को देवास परियोजना से मिलेगा हर साल 1,000 एमसीएफटी अतिरिक्त पानी, पिछोला-फतेह सागर झीलों को मिलेगी संजीवनी

सारांश

उदयपुर की प्यास बुझाने को लेकर पाँच दशक पुरानी देवास परियोजना अपने सबसे महत्त्वाकांक्षी चरण में पहुँच गई है। साबरमती का वह पानी जो अरब सागर में बह जाता था, अब पिछोला झील तक पहुँचेगा — और हर साल 1,000 एमसीएफटी अतिरिक्त जल से उदयपुर की जल सुरक्षा और पर्यटन दोनों बदल सकते हैं।

मुख्य बातें

उदयपुर को देवास परियोजना के चरण-3 और चरण-4 पूरे होने के बाद प्रतिवर्ष 1,000 एमसीएफटी अतिरिक्त जल मिलेगा।
देवास-4 के तहत गोगुंदा तहसील के अंबावा गांव के पास 390 एमसीएफटी क्षमता का बांध और 4.15 किमी लंबी सुरंग बन रही है।
देवास-3 बांध की क्षमता 703 एमसीएफटी ; नाथियाथल गांव के पास निर्माणाधीन; 10.50 किमी सुरंग से अकोदरा बांध से जुड़ेगा।
यह परियोजना साबरमती बेसिन के जल को बनास बेसिन की ओर मोड़ती है — अरब सागर में बह जाने वाला पानी उदयपुर पहुँचेगा।
पिछोला और फतेह सागर झील का जलस्तर बनाए रखने में मदद मिलेगी, जिससे पर्यटन और इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
देवास परियोजना का पहला चरण 1974 में और दूसरा चरण 2015 में पूरा हुआ था।

उदयपुर को जल्द ही प्रतिवर्ष लगभग 1,000 एमसीएफटी (मिलियन क्यूबिक फीट) अतिरिक्त जल आपूर्ति मिलने की संभावना है। यह लाभ देवास परियोजना के चरण-3 और चरण-4 के पूर्ण होने के बाद मिलेगा, जिनका निर्माण कार्य इस समय तेज़ गति से चल रहा है। इन दोनों चरणों के पूरा होते ही शहर की पेयजल व्यवस्था सुदृढ़ होगी और ऐतिहासिक पिछोला झील तथा फतेह सागर झील में जलस्तर बनाए रखने में भी उल्लेखनीय सहायता मिलेगी।

परियोजना की संरचना और तकनीकी विवरण

देवास परियोजना एक अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण योजना है, जिसके अंतर्गत साबरमती बेसिन के उस जल को — जो सामान्यतः अरब सागर में व्यर्थ बह जाता है — बनास बेसिन की ओर मोड़कर उदयपुर की जल आपूर्ति प्रणाली से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रकार की इंजीनियरिंग-आधारित जल-पुनर्निर्देशन व्यवस्था राजस्थान के जल-अभाव वाले शहरों के लिए दीर्घकालिक समाधान की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

देवास-4 के तहत गोगुंदा तहसील के अंबावा गांव के निकट 390 एमसीएफटी क्षमता वाले बांध और 4.15 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण किया जा रहा है। इस बांध से संग्रहीत जल को देवास-3 परियोजना तक पहुँचाया जाएगा।

इसी क्रम में देवास-3 बांध — जिसकी क्षमता 703 एमसीएफटी है — नाथियाथल गांव के समीप निर्मित हो रहा है। इस बांध का जल 10.50 किलोमीटर लंबी सुरंग के माध्यम से मौजूदा देवास-2 (अकोदरा बांध) तक पहुँचाया जाएगा, और आवश्यकतानुसार वहाँ से पिछोला झील में प्रवाहित किया जाएगा।

परियोजना का ऐतिहासिक संदर्भ

गौरतलब है कि देवास परियोजना का पहला चरण वर्ष 1974 में उदयपुर की जल सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आरंभ हुआ था। इसके बाद देवास-2 परियोजना वर्ष 2015 में पूर्ण हुई, जिसमें अकोदरा बांध और सुरंगों के नेटवर्क के ज़रिये गुरुत्वाकर्षण-आधारित प्रणाली से जल को पिछोला झील तक पहुँचाने की व्यवस्था की गई थी। यह ऐसे समय में आया है जब राजस्थान के कई शहरी क्षेत्र मौसमी जल संकट से जूझते रहे हैं और दीर्घकालिक जल प्रबंधन की माँग प्रबल हुई है।

आम जनता और पर्यटन पर असर

अतिरिक्त जल उपलब्धता से उदयपुर की बढ़ती आबादी की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता मिलेगी। साथ ही, पिछोला और फतेह सागर झीलों का जलस्तर स्थिर रहने से शहर के पर्यटन, इको-टूरिज्म और संबंधित आर्थिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। ये दोनों झीलें उदयपुर की पहचान और पर्यटक आकर्षण का केंद्र हैं, और इनके जलस्तर में गिरावट से सीधे रोज़गार व राजस्व पर असर पड़ता है।

विस्थापित परिवारों का पुनर्वास

राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार, परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास हेतु ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। प्रभावित लोगों को नज़दीकी क्षेत्रों में आवासीय भूखंड और आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है, ताकि उनका सुरक्षित और सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित हो सके।

क्या होगा आगे

देवास-3 और देवास-4 के पूर्ण होने के पश्चात उदयपुर को प्रतिवर्ष 1,000 एमसीएफटी अतिरिक्त जल मिलने लगेगा, जिससे शहर की भविष्य में जल संकट से निपटने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। यह परियोजना राजस्थान में जल-बुनियादी ढाँचे के विस्तार की दिशा में एक दीर्घकालिक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन चरण-1 से चरण-2 तक के अंतराल ने दिखाया कि जल बुनियादी ढाँचे में नीतिगत निरंतरता कितनी कठिन है — पहला चरण 1974 में, दूसरा 2015 में। असली सवाल यह है कि क्या चरण-3 और 4 की समय-सीमा सार्वजनिक रूप से बाध्यकारी बनाई जाएगी, या ये भी दशकों की प्रतीक्षा में सिमट जाएँगे। पुनर्वास का उल्लेख सरकारी बयान में है, लेकिन प्रभावित परिवारों की संख्या और मुआवज़े की रूपरेखा अभी स्पष्ट नहीं — यह वह बिंदु है जहाँ बड़ी बुनियादी परियोजनाएँ अक्सर विवादों में घिर जाती हैं।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

देवास परियोजना क्या है और उदयपुर के लिए यह क्यों ज़रूरी है?
देवास परियोजना एक अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण योजना है, जो साबरमती बेसिन के जल को बनास बेसिन की ओर मोड़कर उदयपुर की पेयजल आपूर्ति से जोड़ती है। इसकी शुरुआत 1974 में हुई थी और यह उदयपुर की दीर्घकालिक जल सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती है।
उदयपुर को कितना अतिरिक्त पानी मिलेगा और कब तक?
देवास परियोजना के चरण-3 और चरण-4 के पूरा होने के बाद उदयपुर को प्रतिवर्ष लगभग 1,000 एमसीएफटी अतिरिक्त जल मिलेगा। दोनों चरणों का निर्माण कार्य वर्तमान में तेज़ गति से जारी है, हालाँकि अभी पूर्णता की निश्चित तिथि सार्वजनिक नहीं की गई है।
देवास-3 और देवास-4 की तकनीकी विशेषताएँ क्या हैं?
देवास-4 के तहत गोगुंदा तहसील के अंबावा गांव के पास 390 एमसीएफटी क्षमता का बांध और 4.15 किमी लंबी सुरंग बन रही है। देवास-3 बांध की क्षमता 703 एमसीएफटी है और यह नाथियाथल गांव के पास निर्मित हो रहा है; इसका जल 10.50 किमी लंबी सुरंग से अकोदरा बांध (देवास-2) तक पहुँचेगा।
पिछोला और फतेह सागर झीलों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
अतिरिक्त जल को आवश्यकतानुसार अकोदरा बांध से पिछोला झील में छोड़ा जाएगा, जिससे दोनों प्रतिष्ठित झीलों का जलस्तर बनाए रखने में मदद मिलेगी। इससे उदयपुर के पर्यटन और इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
परियोजना से प्रभावित परिवारों का पुनर्वास कैसे होगा?
राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार प्रभावित परिवारों को नज़दीकी क्षेत्रों में आवासीय भूखंड और आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी। सरकार का लक्ष्य सुरक्षित और सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित करना बताया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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