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उत्तर प्रदेश में डेयरी क्षेत्र को मिली नई उड़ान, सरकारी योजनाओं से युवाओं को मिल रहा स्थायी रोजगार

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उत्तर प्रदेश में डेयरी क्षेत्र को मिली नई उड़ान, सरकारी योजनाओं से युवाओं को मिल रहा स्थायी रोजगार

सारांश

उत्तर प्रदेश के बस्ती में सरकारी योजनाओं ने डेयरी क्षेत्र की तस्वीर बदल दी है — 270 समितियाँ, 7,250 सदस्य, 1,200 महिलाएँ और प्रतिदिन 20,000 लीटर दूध उत्पादन। किसान क्रेडिट कार्ड और DBT ने पशुपालकों की नकदी समस्या सुलझाई, और युवा अब इसे स्थायी करियर मान रहे हैं।

मुख्य बातें

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में प्रतिदिन लगभग 20,000 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है।
जिले में 270 डेयरी समितियाँ सक्रिय हैं, जिनसे 7,250 सदस्य जुड़े हैं — इनमें 1,200 महिलाएँ भी शामिल हैं।
दूध बिक्री का भुगतान पहले 40 दिन बाद मिलता था, अब साप्ताहिक DBT के ज़रिये सीधे खाते में आता है।
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) अब पशुपालन क्षेत्र को भी वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है।
पशुपालक हर्ष पटेल ने दुग्ध उत्पादकों के लिए MSP निर्धारित करने और निजी बीमा कंपनियों के क्लेम निपटान में सुधार की माँग रखी।
युवाओं का डेयरी क्षेत्र की ओर बढ़ता रुझान ग्रामीण रोजगार संकट के समाधान के रूप में देखा जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में डेयरी और पशुपालन क्षेत्र सरकारी योजनाओं, सरल ऋण प्रक्रियाओं और तकनीकी नवाचारों की बदौलत तेज़ी से बदल रहा है। 1 जून 2026 को सामने आई ज़मीनी रिपोर्ट के अनुसार, यह क्षेत्र न केवल पशुपालकों को आर्थिक स्थिरता दे रहा है, बल्कि बड़ी संख्या में युवाओं के लिए एक स्थायी और सम्मानजनक आजीविका का विकल्प भी बन गया है।

पशुपालक की आपबीती: 26 साल की विरासत, अब आधुनिक रूप

बस्ती के पशुपालक हर्ष पटेल का परिवार पिछले 26 वर्षों से इस व्यवसाय से जुड़ा है। व्यवसाय की नींव उनके पिता ने रखी थी, और अब हर्ष इसे आधुनिक तकनीकों तथा सरकारी योजनाओं के सहयोग से आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाओं का लाभ उन्हें पहले ही मिल चुका है, जबकि कुछ अन्य योजनाओं के लिए वे प्रयासरत हैं।

हर्ष पटेल के अनुसार, पहले पशुपालन के लिए ऋण लेना बेहद जटिल प्रक्रिया थी — कई तरह की जाँचें, दस्तावेज़ और सुरक्षा संबंधी औपचारिकताएँ आड़े आती थीं। अब इस प्रक्रिया में उल्लेखनीय सरलता आई है। उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) का विशेष उल्लेख किया, जो पहले केवल फसल उत्पादन तक सीमित था, लेकिन अब पशुपालन क्षेत्र को भी वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है।

भुगतान में पारदर्शिता: 40 दिन से घटकर साप्ताहिक

हर्ष पटेल ने बताया कि सरकारी निगरानी में चलने वाली डेयरी समितियों से जुड़ने का सीधा फायदा पशुपालकों को मिल रहा है। पहले दूध बिक्री का भुगतान लगभग 40 दिनों बाद मिलता था, जो नकदी प्रवाह की गंभीर समस्या पैदा करता था। अब यह भुगतान साप्ताहिक आधार पर सीधे खातों में पहुँच रहा है, जिससे पशुपालकों की वित्तीय स्थिति में सुधार आया है।

उन्होंने दुग्ध उत्पादकों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) निर्धारित करने की भी माँग रखी। उनका तर्क है कि जिस तरह फसलों के लिए MSP तय होता है, उसी तर्ज़ पर दूध के लिए भी उचित मूल्य की गारंटी होनी चाहिए।

बीमा योजनाएँ: लाभ भी, शिकायत भी

पशुधन बीमा के मोर्चे पर हर्ष पटेल ने मिली-जुली तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त पशुधन बीमा योजनाओं का लाभ पशुपालकों को मिल रहा है। हालाँकि, निजी बीमा कंपनियों द्वारा क्लेम निपटान में अक्सर अनावश्यक बाधाएँ खड़ी की जाती हैं। उनका कहना है कि चूँकि बीमा प्रीमियम सरकार भरती है, इसलिए बीमा कंपनियों को दावों के निपटारे में सख्ती बरती जानी चाहिए और सरकार को इस दिशा में हस्तक्षेप करना चाहिए।

ज़िले में डेयरी क्षेत्र का ताज़ा आँकड़ा

डेयरी अधिकारी सुधाकर प्रसाद के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में डेयरी क्षेत्र के विकास के लिए कई प्रभावी योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि बस्ती जिले में वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 20,000 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है।

जिले में 270 डेयरी समितियाँ सक्रिय हैं, जिनसे लगभग 7,250 सदस्य जुड़े हैं। इनमें 1,200 महिलाएँ सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। समितियों के कंप्यूटरीकरण और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) व्यवस्था लागू होने से भुगतान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनी है।

युवाओं का रुझान और आगे की राह

हर्ष पटेल ने कहा कि एक समय पशुपालन को समाज में हीन दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन आधुनिक तकनीकों और बेहतर प्रबंधन ने इस धारणा को बदल दिया है। अब यह एक सम्मानजनक और लाभदायक व्यवसाय के रूप में स्थापित हो रहा है और बड़ी संख्या में युवा इसे स्थायी आजीविका के रूप में अपना रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब ग्रामीण बेरोज़गारी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य है, और इस क्षेत्र में नीतिगत सुधारों की दिशा में यह ज़मीनी बदलाव आने वाले वर्षों में और व्यापक असर दिखा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन कुछ सवाल अनुत्तरित हैं। 20,000 लीटर प्रतिदिन का आँकड़ा प्रभावशाली लगता है, परंतु उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के संदर्भ में यह एक जिले की सीमित तस्वीर है — राज्यव्यापी डेटा के बिना इसका वास्तविक महत्व आँकना कठिन है। पशुपालक हर्ष पटेल की MSP माँग और बीमा क्लेम की शिकायत बताती है कि सरकारी योजनाओं की पहुँच अभी भी असमान है। DBT और कंप्यूटरीकरण से पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन जब तक निजी बीमा कंपनियों पर नियामकीय दबाव नहीं बनता और दुग्ध मूल्य निर्धारण में किसानों की हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक यह बदलाव अधूरा रहेगा।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उत्तर प्रदेश में डेयरी क्षेत्र के विकास के लिए कौन-सी सरकारी योजनाएँ चल रही हैं?
केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त योजनाओं में किसान क्रेडिट कार्ड (पशुपालन के लिए), पशुधन बीमा योजना और डेयरी समितियों के कंप्यूटरीकरण के साथ DBT भुगतान प्रणाली प्रमुख हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में इन योजनाओं के माध्यम से डेयरी उत्पादन और पशुपालकों की आय में सुधार दर्ज किया गया है।
बस्ती जिले में डेयरी क्षेत्र की वर्तमान स्थिति क्या है?
बस्ती जिले में वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 20,000 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। जिले में 270 डेयरी समितियाँ सक्रिय हैं, जिनसे 7,250 सदस्य जुड़े हैं, जिनमें 1,200 महिलाएँ भी शामिल हैं।
किसान क्रेडिट कार्ड से पशुपालकों को क्या फायदा हुआ है?
किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) पहले केवल फसल उत्पादन के लिए उपलब्ध था, लेकिन अब इसे पशुपालन क्षेत्र तक भी विस्तारित किया गया है। इससे पशुपालकों को ऋण प्राप्त करने की प्रक्रिया सरल हुई है और उन्हें आर्थिक सहायता मिलने लगी है।
दुग्ध उत्पादकों के लिए MSP की माँग क्यों उठ रही है?
पशुपालक हर्ष पटेल सहित कई उत्पादकों का कहना है कि जिस तरह फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय होता है, उसी तर्ज़ पर दूध के लिए भी उचित मूल्य की गारंटी होनी चाहिए। इसके बिना बाज़ार में उतार-चढ़ाव के दौरान पशुपालकों को नुकसान उठाना पड़ता है।
पशुधन बीमा योजना में क्या समस्याएँ हैं?
केंद्र और राज्य सरकार की पशुधन बीमा योजनाओं का लाभ तो मिल रहा है, लेकिन निजी बीमा कंपनियों द्वारा क्लेम निपटान में अनावश्यक बाधाएँ खड़ी की जाती हैं। पशुपालकों की माँग है कि चूँकि प्रीमियम सरकार भरती है, इसलिए सरकार को बीमा कंपनियों पर दावों के त्वरित निपटारे के लिए दबाव बनाना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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