सिद्धारमैया के इस्तीफे पर मोइली का बयान: 'कांग्रेस ने दिया पूरा सम्मान, नाराजगी का सवाल नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से सिद्धारमैया के इस्तीफे के ठीक एक दिन बाद, 29 मई 2026 को बेंगलुरु में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली ने स्पष्ट किया कि इस पद-परिवर्तन से किसी के भी नाराज होने का कोई प्रश्न नहीं उठता। मोइली के अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) ने सिद्धारमैया को हमेशा 'उचित सम्मान और विशेषाधिकार' प्रदान किए हैं।
मोइली का मुख्य तर्क
मोइली ने कहा कि सिद्धारमैया ने व्यावहारिक रूप से दो कार्यकाल तक मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की — एक पूर्ण कार्यकाल और फिर लगभग तीन वर्ष का एक और कार्यकाल। उन्होंने याद दिलाया कि सिद्धारमैया मूल रूप से कांग्रेस से नहीं थे, बल्कि पार्टी में शामिल होने के बाद ही उन्हें मुख्यमंत्री पद मिला।
मोइली ने कहा, "कांग्रेस ने उन्हें आत्मसात किया, उन्हें सम्मानजनक पद दिए। इसलिए किसी के नाराज होने का सवाल ही नहीं उठता।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि सिद्धारमैया ने कांग्रेस के भीतर विपक्ष के नेता के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
डीके शिवकुमार को सत्ता हस्तांतरण
मोइली ने दावा किया कि पार्टी हाई कमान ने सिद्धारमैया को समझाने के बाद ही उन्होंने डीके शिवकुमार के लिए पद छोड़ा, और वे इस पर स्वेच्छा से सहमत हुए। यह ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में सत्ता-साझेदारी की अटकलें लंबे समय से चल रही थीं।
कांग्रेस की विरासत पर दावा
मोइली ने कांग्रेस को वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करने वाली पार्टी बताते हुए कहा कि वे स्वयं, एस. बंगारप्पा और डी. देवराज उर्स जैसे नेता मुख्यमंत्री रह चुके हैं और पार्टी ने सभी को मान्यता दी। गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब कर्नाटक में नेतृत्व बदलाव पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है।
भाजपा और जेडी(एस) पर निशाना
मोइली ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (सेक्युलर) [जेडी(एस)] हमेशा अपने स्वार्थ को प्राथमिकता देती हैं। उन्होंने कहा कि बीएस येदियुरप्पा, बसवराज बोम्मई और डीवी सदानंद गौड़ा जैसे नेताओं के साथ भाजपा ने कभी न्यायसंगत व्यवहार नहीं किया।
आगे की राजनीतिक स्थिति
कर्नाटक में अब डीके शिवकुमार के नेतृत्व में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह सत्ता-हस्तांतरण 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।