विश्व कठपुतली दिवस: रंगीन कपड़ों और लकड़ी के अद्भुत नृत्य का जश्न
सारांश
Key Takeaways
- कठपुतली कला का इतिहास महाभारत से जुड़ा है।
- यह कला विभिन्न शैलियों में प्रचलित है।
- विश्व कठपुतली दिवस हर साल 21 मार्च को मनाया जाता है।
- यह कला न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि नैतिक मूल्य भी सिखाती है।
- आधुनिक तकनीक और समर्थन से इसे पुनर्जीवित किया जा सकता है।
नई दिल्ली, 20 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। आज के डिजिटल युग में, जहां मोबाइल, ओटीटी प्लेटफार्म और ऑनलाइन गेम्स मनोरंजन के नए तरीके प्रदान कर रहे हैं, एक समय था जब लोग बिना इन सभी के भी आनंदित होते थे। वह आनंद प्रदान करती थीं रंग-बिरंगी छोटी-छोटी कठपुतलियां। लकड़ी से निर्मित और रंगीन जरीदार कपड़ों से सजी ये कठपुतलियां मंच पर जीवंत हो जाती थीं। कलाकार इन्हें धागों या छड़ों से नचाते हुए लोककथाएं, प्रेम कहानियां और व्यंग्यपूर्ण किस्से सुनाते थे। ये न केवल मनोरंजन करती थीं, बल्कि नैतिक मूल्य, हास्य और सामाजिक संदेश भी प्रदान करती थीं।
कलाकारों की चतुराई, लयबद्ध संवाद और चंचलता इस कला को विशेष बनाती है। बच्चे हों या बड़े, सभी को यह आकर्षित करती है। कठपुतली कला का इतिहास अत्यंत पुराना है।
जानकारी के अनुसार, इसका सबसे पहला उल्लेख महाभारत में मिलता है। पाणिनी की अष्टाध्यायी में भी नटसूत्र के माध्यम से इसका संदर्भ है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने लकड़ी की मूर्ति में प्रवेश कर माता पार्वती का मन बहलाया था, जिससे इस कला की शुरुआत हुई।
सिंहासन बत्तीसी में विक्रमादित्य के सिंहासन की 32 कठपुतलियों का वर्णन भी है। यह कला कई कलाओं का संगम है, जिसमें नाटक, चित्रकला, मूर्तिकला, वस्त्र सज्जा, संगीत और नृत्य शामिल हैं।
खास बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय कठपुतली संघ ने 2003 से इसे वैश्विक स्तर पर मान्यता दी है। आज की आवश्यकता है कि कठपुतली कला में तकनीकी और पूंजी का निवेश हो। आधुनिकीकरण से प्रदर्शन को बेहतर बनाया जा सकता है। कलाकारों को समाज और सरकार से समर्थन मिलना चाहिए ताकि यह विरासत जीवित रह सके।
भारत में कठपुतली की कई शैलियां प्रचलित हैं। धागा कठपुतली में जोड़ों वाले अंगों को धागों से नियंत्रित किया जाता है। छाया कठपुतली में पर्दे के पीछे से प्रकाश डालकर छाया दिखाई जाती है। दस्ताना या हथेली कठपुतली हाथ में पहनकर प्रदर्शन की जाती है, जबकि छड़ कठपुतली बड़ी होती है और छड़ों से संचालित होती है।
राजस्थान में पोशाक वाली कठपुतलियां योद्धाओं या राजाओं-रानियों की कहानियां सुनाती हैं, जिसमें युद्ध, नृत्य और रोमांच होता है। ये कठपुतलियां स्थानीय वेशभूषा, वास्तुकला और चित्रकला का भी चित्रण करती हैं।
कठपुतली कला सदियों से मनोरंजन का एक साधन रही है। पुराने समय में गांवों में कलाकार घूम-घूमकर लोगों का मनोरंजन करते थे। आधुनिक युग में टीवी, फिल्में, वेब सीरीज, मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया ने इस कला को पीछे धकेल दिया है। आज के बच्चे शायद ही कठपुतलियों के बारे में जानते हों।
इसलिए, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कठपुतली कला हाशिए पर चली गई है। इस अद्भुत कला को संजोने और पुनर्जीवित करने के प्रयास में हर वर्ष 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य कठपुतली कला को फिर से जीवित करना, कलाकारों को सम्मानित करना और नई पीढ़ी में रुचि पैदा करना है।