कठपुतली कला का उत्सव: विश्व कठपुतली दिवस पर अनूठी शैलियाँ और परंपराएँ
सारांश
Key Takeaways
- कठपुतली कला का आयोजन हर साल 21 मार्च को होता है।
- भारत में इसकी चार मुख्य शैलियाँ हैं।
- गुलाबो-सिताबो उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख शैली है।
- कठपुतली कला सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- हर राज्य में इसकी विशेषताएँ और कहानियाँ हैं।
नई दिल्ली, 21 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। पूरे विश्व में प्राचीन लोक कला के अद्भुत स्वरूप, यानी कठपुतली की सुंदरता और सांस्कृतिक महत्व का उत्सव हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में यह कला सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है, जो लकड़ी, चमड़े, कपड़े और रंगों से निर्मित छोटी-छोटी पुतलियों के माध्यम से कहानियों को जीवंत बनाती है। यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह नैतिक मूल्यों, लोककथाओं, महाकाव्यों और सामाजिक संदेशों का वाहक भी है।
हर क्षेत्र में इसकी विभिन्न शैलियाँ हैं, जो स्थानीय संस्कृति, भाषा और परंपराओं का प्रतिबिंब प्रस्तुत करती हैं। कठपुतली कला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसका उल्लेख महाभारत और पाणिनी की अष्टाध्यायी में भी मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने लकड़ी की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाने का कार्य किया था। सिंहासन बत्तीसी में विक्रमादित्य की 32 पुतलियों का उल्लेख है। यह कला नाटक, संगीत, नृत्य, चित्रकला और शिल्प का एक सुंदर संयोग है।
भारत में कठपुतली की मुख्य शैलियाँ चार प्रकार की होती हैं: धागा वाली, छाया वाली, छड़ वाली और दस्ताने वाली। लेकिन क्षेत्रीय विविधता इसे और भी खास बनाती है। राजस्थान में कठपुतली सबसे प्रसिद्ध है। यहाँ के भाट या नट कलाकार रंग-बिरंगी पोशाक वाली लकड़ी की पुतलियाँ धागों से नचाते हैं। ये कहानियाँ योद्धाओं और राजाओं-रानियों की होती हैं, जिनमें युद्ध और रोमांच की भरपूर कहानियाँ होती हैं।
उत्तर प्रदेश में गुलाबो-सिताबो दस्ताने वाली कठपुतली कला का उदाहरण है। यह कला 17वीं शताब्दी से प्रचलित है, जहाँ एक ही पति की दो पत्नियाँ, दबंग गुलाबो और शांत सिताबो, के बीच के झगड़े और हास्य संवाद दर्शकों को हंसाते हैं। यह लखनऊ के साथ-साथ पूरे प्रदेश में लोकप्रिय रही है, लेकिन अब इसकी लोकप्रियता में कमी आ रही है। तमिलनाडु में तोलु बोम्मलट्टम (छाया कठपुतली) और बोम्मलट्टम (धागा-छड़ वाली) प्रमुख हैं। ये महाकाव्यों और पुराणों की कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं। पावा कूथु (दस्ताने वाली) अब लगभग विलुप्त हो चुकी है, जो देवी लक्ष्मी के विजय नृत्य पर आधारित है। वहीं, केरल में तोलपावा कूथु (छाया), पावकथकली जो दस्ताने वाली है और नूल पावकूथु यानी धागा वाली प्रचलित हैं।
तोलपावा कूथु भद्रकाली को समर्पित होता है और रामायण पर आधारित कई दिनों तक चलता है। पावकथकली कथकली नृत्य की नकल करती है। कर्नाटक में तोगालु गोम्बेयटा (चमड़े की छाया) और यक्षगान गोम्बेयटा (धागा वाली) प्रसिद्ध हैं। ये रामायण, महाभारत और लोककथाओं पर आधारित होती हैं। आंध्र प्रदेश में तोलु बोम्मलता (छाया), कोय्या बोम्मलता, कीलु बोम्मलता और सूत्रम बोम्मलता जैसी शैलियाँ रामायण-महाभारत के प्रसंगों को प्रस्तुत करती हैं। पुतलियाँ चमड़े से बनी बड़ी और रंगीन होती हैं।
ओडिशा में रावण छाया, गोपालिला कुंधेई (धागा वाली) और काठी कुंधेई जैसी शैलियाँ कृष्ण-राधा की लीलाओं पर केंद्रित होती हैं। पश्चिम बंगाल में डेंजर पुतुल नाच (छड़ वाली) और तारेर पुतुल नाच (धागा वाली) लोकप्रिय हैं। ये महाकाव्यों के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर भी नाटक करती हैं। असम में पुतला नाच धागा वाली है, जिसका मुख्य विषय रामायण है।