शी जिनपिंग-ट्रंप मुलाकात: पूर्व राजनयिक सज्जनहार बोले — बड़े समझौते की उम्मीद कम, तनाव घटाने पर रहेगा जोर
सारांश
मुख्य बातें
पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहार ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच होने वाली मुलाकात को वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण करार दिया है। उन्होंने 21 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि दोनों नेताओं की बातचीत का असर केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसकी गूँज पूरी दुनिया में सुनाई देगी। हालांकि, उनके अनुसार इस मुलाकात से किसी बड़े या ऐतिहासिक समझौते की अपेक्षा रखना उचित नहीं होगा।
वैश्विक शक्ति संतुलन और दोनों देशों की भूमिका
सज्जनहार के अनुसार, अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी और चीन दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल व्यापार और आर्थिक मोर्चे तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव और रणनीतिक वर्चस्व को लेकर भी गहरी होड़ जारी है। उन्होंने कहा कि चीन 2049 तक खुद को एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच ताइवान, दक्षिण चीन सागर और तकनीकी वर्चस्व जैसे मुद्दों पर तनाव बना हुआ है। गौरतलब है कि यह बैठक ऐसे भू-राजनीतिक माहौल में हो रही है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार और आपूर्ति शृंखलाएँ पहले से दबाव में हैं।
मुलाकात से क्या उम्मीदें, क्या नहीं
सज्जनहार ने स्पष्ट किया कि शी जिनपिंग और ट्रंप की यह बैठक महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इससे किसी बड़े समझौते या नाटकीय घोषणा की संभावना कम है। उनके मुताबिक, दोनों पक्ष मुख्य रूप से व्यापारिक संबंधों को और खराब होने से बचाने और आपसी आर्थिक सहयोग बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका की ओर से चीन पर अमेरिकी कृषि उत्पादों, एयरक्राफ्ट और अन्य वस्तुओं की खरीद बढ़ाने का दबाव बनाए रखने की संभावना है। साथ ही, सीनेटर लिंडसे ग्राहम से जुड़े 100 प्रतिशत टैरिफ के प्रस्ताव जैसे कदम राष्ट्रपति ट्रंप को वार्ता में एक महत्वपूर्ण दबाव का साधन दे सकते हैं।
ताइवान, रूस और ईरान पर टकराव के बिंदु
सज्जनहार के अनुसार, चीन की प्राथमिकता यह हो सकती है कि अमेरिका ताइवान को हथियारों की आपूर्ति कम करे या पूरी तरह बंद करे। दूसरी ओर, अमेरिका चीन पर रूस और ईरान के संदर्भ में अपने प्रभाव का उपयोग करने के लिए दबाव डाल सकता है, ताकि मौजूदा वैश्विक संघर्षों और तनावों को कम किया जा सके।
ईरान-अमेरिका तनाव पर उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति काफी जटिल हो चुकी है। राष्ट्रपति ट्रंप पहले भी ईरान को कड़ी चेतावनियाँ दे चुके हैं, लेकिन वास्तविक कदम क्या होंगे, यह अभी अनिश्चित है। कठोर आर्थिक दबाव की चेतावनियाँ भी हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं देती हैं, यह उन्होंने रेखांकित किया।
वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर खतरे
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और हूती हमलों के संदर्भ में सज्जनहार ने कहा कि शिपिंग मार्गों, पाइपलाइनों और रिफाइनरियों जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा ढाँचे पर हमले वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। यदि स्थिति और बिगड़ती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता और कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है।
उन्होंने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की संभावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि भारत, चीन, तुर्किये और हंगरी जैसे देशों पर ऐसे उपाय लागू हुए तो वैश्विक तेल बाजार पर दबाव उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है। इसका सबसे गंभीर असर विकासशील देशों को भुगतना पड़ सकता है।
बातचीत का असल महत्व
सज्जनहार ने निष्कर्ष में कहा कि व्यापार, ताइवान, रूस, ईरान और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा जैसे बहुआयामी मुद्दों के कारण जिनपिंग-ट्रंप वार्ता का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। दोनों नेताओं की बातचीत से किसी ऐतिहासिक करार की बजाय तनाव घटाने और व्यापारिक संबंधों को स्थिर रखने की दिशा में सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं — और यही इस समय की सबसे बड़ी जरूरत भी है।