गोक्षुरा और चंद्रशूरा की सुरक्षा जाँच के लिए आयुष मंत्रालय की मल्टीडिसीप्लिनरी कमेटी गठित
सारांश
मुख्य बातें
आयुष मंत्रालय ने 7 अक्टूबर 2026 को दो प्रमुख औषधीय पौधों — गोक्षुरा (ट्रिबुलस टेरेस्ट्रिस) और चंद्रशूरा (लेपिडियम सैटिवम) — की सुरक्षा प्रोफाइल की वैज्ञानिक समीक्षा के लिए एक मल्टीडिसीप्लिनरी एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया है। नई रेगुलेटरी चिंताओं और हर्बल उत्पादों की बढ़ती वैश्विक माँग के बीच यह कदम उपभोक्ता सुरक्षा और साक्ष्य-आधारित नियमन को मज़बूत करने की दिशा में उठाया गया है।
गोक्षुरा और चंद्रशूरा: परंपरा से आधुनिक विज्ञान तक
चंद्रशूरा को आयुर्वेद में पाचन सुधारने, शरीर को बल देने और समग्र ऊर्जा बढ़ाने वाली औषधि के रूप में सदियों से उपयोग किया जाता रहा है। यह एक सामान्य पोषण-समृद्ध पौधा माना जाता है।
वहीं गोक्षुरा पारंपरिक भारतीय, चीनी और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में अपना विशेष स्थान रखता है। पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में इसकी माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसके चलते वैज्ञानिक और शोध समुदाय इसके पारंपरिक उपयोगों को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखने में जुटा है।
कमेटी का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र
अलग-अलग विशेषज्ञता के क्षेत्रों से चुने गए विशेषज्ञों से बनी यह कमेटी सबूतों पर आधारित तकनीकी रिपोर्ट (डोजियर) तैयार करेगी। इन रिपोर्टों का मुख्य उद्देश्य इन औषधीय पौधों की वैज्ञानिक समझ को सुदृढ़ करना है।
इसके अलावा कमेटी यह भी चिह्नित करेगी कि अभी किन क्षेत्रों में जानकारी की कमी है और भविष्य में किस तरह के शोध की आवश्यकता है। मंत्रालय के अनुसार, ये तकनीकी रिपोर्ट्स रेगुलेटरी संस्थाओं को वैज्ञानिक आधार पर सटीक निर्णय लेने में सहायक होंगी।
नियामक चिंताएँ और वैश्विक परिदृश्य
यह ऐसे समय में आया है जब आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों का वैश्विक बाज़ार तेज़ी से विस्तार कर रहा है। गौरतलब है कि बाज़ार के विस्तार के साथ-साथ इन उत्पादों की गुणवत्ता, प्रभावकारिता और दीर्घकालिक सुरक्षा से जुड़े सवाल भी नियामक एजेंसियों के सामने बार-बार उठते रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिना ठोस वैज्ञानिक प्रमाण के इन पौधों का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग उपभोक्ताओं के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। मंत्रालय की यह पहल इसी अंतर को पाटने की कोशिश है।
परंपरा और आधुनिक विज्ञान का संगम
मंत्रालय का मानना है कि इस मल्टीडिसीप्लिनरी प्रयास से न केवल इन पौधों के सुरक्षित इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने का एक विश्वसनीय मार्ग भी तैयार होगा। यह भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों — आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी — की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है।
आगे की राह
एक्सपर्ट कमेटी द्वारा तैयार डोजियर रेगुलेटरी ढाँचे को नया आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। उम्मीद है कि इन रिपोर्टों से गोक्षुरा और चंद्रशूरा से संबंधित उत्पादों के लाइसेंसिंग, लेबलिंग और गुणवत्ता मानकों पर स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए जा सकेंगे।