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जीपीएस तकनीक: अंतरिक्ष के 30 सैटेलाइट कैसे बताते हैं आपकी सटीक लोकेशन, जानें पूरा सिस्टम

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जीपीएस तकनीक: अंतरिक्ष के 30 सैटेलाइट कैसे बताते हैं आपकी सटीक लोकेशन, जानें पूरा सिस्टम

सारांश

जीपीएस तकनीक 30 से अधिक सैटेलाइट, ग्राउंड स्टेशन और रिसीवर के समन्वय से काम करती है। ट्राइलेटरेशन विधि से सटीक लोकेशन मिलती है। अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा विकसित यह सिस्टम अब भारत के NavIC सहित कई देशों के नेटवर्क में विस्तारित हो चुका है।

मुख्य बातें

जीपीएस पृथ्वी से 20,000 किलोमीटर ऊपर घूमते 30 से अधिक सैटेलाइट के नेटवर्क पर आधारित है।
यह सिस्टम सैटेलाइट, ग्राउंड स्टेशन और रिसीवर — तीन मुख्य घटकों से मिलकर काम करता है।
ट्राइलेटरेशन (Trilateration) विधि से कम से कम चार सैटेलाइट के सिग्नल के आधार पर सटीक लोकेशन निर्धारित होती है।
जीपीएस को अमेरिकी रक्षा विभाग ने विकसित किया था, जबकि रूस का GLONASS (24 सैटेलाइट) और भारत का NavIC इसी श्रेणी के स्वतंत्र सिस्टम हैं।
जीपीएस का उपयोग भूकंप निगरानी, सटीक खेती, सैन्य अभियान और स्वायत्त वाहनों जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में हो रहा है।
आने वाले वर्षों में AI और ड्रोन तकनीक के विस्तार के साथ जीपीएस की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती जाएगी।

नई दिल्ली, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) आज की सबसे क्रांतिकारी तकनीकों में से एक है, जो पृथ्वी से लगभग 20,000 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में घूम रहे 30 से अधिक नेविगेशन सैटेलाइट के नेटवर्क के जरिए आपकी सटीक भौगोलिक स्थिति का पता लगाती है। स्मार्टफोन से लेकर युद्धक विमानों तक, यह तकनीक आज मानव जीवन के हर क्षेत्र में अपरिहार्य बन चुकी है।

जीपीएस क्या है और इसका इतिहास

जीपीएस को मूल रूप से अमेरिकी रक्षा विभाग (US Department of Defense) ने सैन्य उद्देश्यों के लिए विकसित किया था। बाद में इसे आम नागरिकों के लिए भी उपलब्ध कराया गया। आज यह तकनीक ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) के व्यापक ढांचे का हिस्सा है, जिसमें कई देशों के सैटेलाइट नेटवर्क शामिल हैं।

रूस का जीएलओएनएएसएस (GLONASS) सिस्टम भी इसी श्रेणी में आता है, जिसमें 24 सैटेलाइट सक्रिय हैं। इसके अलावा यूरोपीय संघ का गैलीलियो और भारत का NavIC (नाविक) सिस्टम भी इसी तकनीकी परिवार का हिस्सा हैं। यानी अब यह क्षेत्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा।

जीपीएस के तीन मुख्य घटक

जीपीएस सिस्टम तीन परस्पर जुड़े हिस्सों से मिलकर काम करता है — सैटेलाइट, ग्राउंड स्टेशन और रिसीवर। इन तीनों के समन्वय से ही सटीक लोकेशन संभव हो पाती है।

सैटेलाइट: ये पृथ्वी से करीब 20,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर 12 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करते हैं। इनकी कक्षाएं इस तरह निर्धारित हैं कि पृथ्वी की किसी भी सतह से किसी भी समय कम से कम 6 सैटेलाइट दृष्टि में रहते हैं। ये सैटेलाइट लगातार विशेष रेडियो फ्रीक्वेंसी पर कोडेड सिग्नल प्रसारित करते रहते हैं।

ग्राउंड स्टेशन: पृथ्वी पर स्थापित ये नियंत्रण केंद्र सैटेलाइट की कक्षा, गति और समय की निरंतर निगरानी करते हैं। यदि किसी सैटेलाइट की स्थिति में विचलन आता है, तो ग्राउंड स्टेशन उसे सुधारने के लिए निर्देश भेजते हैं।

रिसीवर: यह वह उपकरण है जो हम रोजमर्रा में इस्तेमाल करते हैं — जैसे स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच या कार का नेविगेशन सिस्टम। रिसीवर सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल को पकड़कर उसे डिकोड करता है।

ट्राइलेटरेशन: सटीक लोकेशन की गणितीय विधि

जब कोई जीपीएस रिसीवर कम से कम चार सैटेलाइट से सिग्नल प्राप्त करता है, तो वह प्रत्येक सैटेलाइट से अपनी दूरी की गणना करता है। यह दूरी इस आधार पर मापी जाती है कि सिग्नल को सैटेलाइट से रिसीवर तक पहुंचने में कितना समय लगा।

इन चारों दूरियों के आधार पर रिसीवर त्रिकोणमितीय विधि यानी ट्राइलेटरेशन (Trilateration) का प्रयोग करके आपकी सटीक अक्षांश-देशांतर स्थिति और ऊंचाई निर्धारित करता है। सामान्य रिसीवर कुछ मीटर की सटीकता देते हैं, जबकि हाई-प्रिसिजन रिसीवर कुछ इंच तक की सटीकता प्रदान कर सकते हैं।

जीपीएस के व्यापक उपयोग और वैज्ञानिक महत्व

जीपीएस केवल रास्ता दिखाने तक सीमित नहीं है। नागरिक उड्डयन में विमानों की सटीक उड़ान, समुद्री नेविगेशन में जहाजों की दिशा, कृषि क्षेत्र में सटीक खेती (Precision Farming), डिलीवरी सेवाओं में रियल-टाइम ट्रैकिंग और सेना में मिसाइल मार्गदर्शन जैसे अनेक क्षेत्रों में इसका उपयोग होता है।

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि दुनिया भर में स्थापित सैकड़ों स्थायी जीपीएस रिसीवर वैज्ञानिकों को पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल, भूकंप की पूर्व चेतावनी और पृथ्वी के घूर्णन में आने वाले बदलावों का अध्ययन करने में सहायता करते हैं। यह तकनीक प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में भी एक अहम भूमिका निभाती है।

भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम: NavIC

यह उल्लेखनीय है कि भारत ने भी अमेरिकी जीपीएस पर निर्भरता कम करने के लिए अपना स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC (Navigation with Indian Constellation) विकसित किया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा संचालित यह सिस्टम विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप और उसके आसपास के क्षेत्र में अत्यंत सटीक नेविगेशन सेवाएं प्रदान करता है। NavIC का महत्व इस संदर्भ में और बढ़ जाता है कि युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में कोई विदेशी देश जीपीएस सेवा बाधित कर सकता है।

जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वायत्त वाहन (Self-Driving Cars) और ड्रोन तकनीक का विस्तार हो रहा है, जीपीएस और उन्नत नेविगेशन सिस्टम की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती जाएगी। आने वाले वर्षों में इन सिस्टम की सटीकता और सुरक्षा को और बेहतर बनाने पर वैश्विक स्तर पर काम जारी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह संकट के समय किसी भी राष्ट्र की सैन्य और नागरिक व्यवस्था को बाधित कर सकता है। भारत का NavIC इसी रणनीतिक सोच का परिणाम है, लेकिन इसके व्यापक नागरिक उपयोग को अभी और बढ़ावा देने की जरूरत है। यह महज तकनीकी आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जीपीएस क्या है और यह कैसे काम करता है?
जीपीएस यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम एक उपग्रह-आधारित नेविगेशन तकनीक है जो पृथ्वी से 20,000 किमी ऊपर घूमते 30 से अधिक सैटेलाइट के नेटवर्क पर काम करती है। रिसीवर कम से कम चार सैटेलाइट से सिग्नल पकड़कर ट्राइलेटरेशन विधि से सटीक लोकेशन निर्धारित करता है।
जीपीएस में कितने सैटेलाइट होते हैं?
जीपीएस नेटवर्क में 30 से अधिक नेविगेशन सैटेलाइट हैं जो पृथ्वी की कक्षा में घूमते हैं। इनकी व्यवस्था ऐसी है कि पृथ्वी पर किसी भी स्थान से किसी भी समय कम से कम 6 सैटेलाइट दृष्टि में रहते हैं।
क्या भारत का अपना जीपीएस सिस्टम है?
हां, भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC (नाविक) है जिसे इसरो ने विकसित किया है। यह विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के क्षेत्र में सटीक नेविगेशन सेवाएं प्रदान करता है और अमेरिकी जीपीएस पर निर्भरता कम करने के लिए बनाया गया है।
जीपीएस की सटीकता कितनी होती है?
सामान्य जीपीएस रिसीवर कुछ मीटर की सटीकता के साथ लोकेशन बताते हैं। हाई-प्रिसिजन रिसीवर कुछ इंच तक की सटीकता प्रदान कर सकते हैं, जिनका उपयोग सर्वेक्षण, सेना और वैज्ञानिक शोध में होता है।
जीपीएस का उपयोग किन-किन क्षेत्रों में होता है?
जीपीएस का उपयोग नेविगेशन के अलावा विमानन, समुद्री परिवहन, सेना, कृषि, डिलीवरी सेवाओं और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में होता है। वैज्ञानिक इसकी मदद से पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल का भी अध्ययन करते हैं।
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