जीपीएस तकनीक क्या है और कैसे देती है सटीक लोकेशन — जानें पूरा सिस्टम
सारांश
Key Takeaways
- जीपीएस पृथ्वी की कक्षा में 20,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर घूम रहे 30 से अधिक सैटेलाइट्स के नेटवर्क पर आधारित है।
- जीपीएस रिसीवर ट्राइलेटरेशन विधि से कम से कम चार सैटेलाइट के सिग्नल का उपयोग करके सटीक लोकेशन निर्धारित करता है।
- सामान्य रिसीवर कुछ मीटर और उन्नत रिसीवर कुछ सेंटीमीटर तक की सटीकता प्रदान करते हैं।
- अमेरिकी रक्षा विभाग ने 1970 के दशक में जीपीएस विकसित किया; 1983 के बाद इसे नागरिक उपयोग के लिए खोला गया।
- भारत का NavIC सिस्टम (इसरो) दक्षिण एशिया में 20 मीटर से कम की सटीकता के साथ नेविगेशन सेवाएं देता है।
- रूस का GLONASS (24 सैटेलाइट), यूरोप का Galileo और चीन का BeiDou भी GNSS परिवार के हिस्से हैं।
नई दिल्ली, 23 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) एक अत्याधुनिक अंतरिक्ष-आधारित नेविगेशन तकनीक है, जो पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे 30 से अधिक सैटेलाइट्स के नेटवर्क की मदद से आपकी सटीक भौगोलिक स्थिति का पता लगाती है। आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और वाहनों के नेविगेशन सिस्टम में जीपीएस इतना सामान्य हो गया है कि रास्ता भटकना लगभग असंभव हो चुका है। यह तकनीक मूलतः अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा विकसित की गई थी, लेकिन आज इसका उपयोग दुनिया भर में नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।
जीपीएस के तीन मुख्य घटक
जीपीएस सिस्टम तीन प्रमुख हिस्सों से मिलकर बनता है — सैटेलाइट नेटवर्क, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और यूज़र रिसीवर। ये तीनों मिलकर एक ऐसा अटूट तंत्र बनाते हैं जो चौबीसों घंटे, सातों दिन काम करता रहता है।
सैटेलाइट पृथ्वी की सतह से लगभग 20,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित कक्षा में 12 घंटे में एक चक्कर पूरा करते हैं। इनकी स्थिति इस प्रकार व्यवस्थित है कि पृथ्वी के किसी भी कोने से हर समय कम से कम 6 सैटेलाइट की दृष्टि रेखा में होते हैं।
ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन पृथ्वी पर स्थापित वे केंद्र हैं जो सैटेलाइट्स की कक्षा, घड़ी की सटीकता और सिग्नल की गुणवत्ता की लगातार निगरानी करते हैं। जरूरत पड़ने पर ये स्टेशन सैटेलाइट को सही पथ पर बनाए रखने के लिए सुधारात्मक निर्देश भेजते हैं।
रिसीवर वह उपकरण है जिसे हम रोज़मर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं — चाहे वह मोबाइल फोन हो, जीपीएस ट्रैकर हो या कार का नेविगेशन सिस्टम। यह उपकरण सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल को पकड़कर उनसे अपनी दूरी की गणना करता है।
ट्राइलेटरेशन — लोकेशन जानने की विज्ञान
जब कोई जीपीएस रिसीवर कम से कम चार सैटेलाइट से सिग्नल प्राप्त करता है, तो वह ट्राइलेटरेशन (त्रिकोणमितीय गणना) की विधि से आपकी सटीक स्थिति निर्धारित करता है। हर सैटेलाइट एक विशेष रेडियो फ्रीक्वेंसी पर एन्क्रिप्टेड कोड सिग्नल भेजता है, जिसमें उस सैटेलाइट की स्थिति और सिग्नल भेजने का सटीक समय दर्ज होता है।
रिसीवर यह मापता है कि सिग्नल उस तक पहुंचने में कितना समय लगा। चूंकि रेडियो तरंगें प्रकाश की गति से यात्रा करती हैं, इसलिए समय के आधार पर दूरी की गणना अत्यंत सटीक होती है। चार सैटेलाइट से मिली दूरियों को मिलाकर रिसीवर आपकी अक्षांश (Latitude), देशांतर (Longitude) और ऊंचाई (Altitude) तीनों का पता लगा लेता है।
एक सामान्य रिसीवर कुछ मीटर की सटीकता देता है, जबकि उन्नत और व्यावसायिक रिसीवर कुछ सेंटीमीटर या इंच तक की सटीक लोकेशन बता सकते हैं। यही कारण है कि जीपीएस तकनीक सर्वेक्षण, निर्माण और कृषि जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी है।
जीपीएस के व्यापक उपयोग और वैश्विक विस्तार
जीपीएस केवल रास्ता दिखाने तक सीमित नहीं है। विमानन उद्योग में पायलट उड़ान मार्ग निर्धारण के लिए, समुद्री नेविगेशन में जहाज संचालन के लिए और सेना में मिसाइल मार्गदर्शन व सैनिकों की तैनाती के लिए इसका उपयोग होता है। कृषि क्षेत्र में किसान जीपीएस की मदद से खेतों की सटीक मैपिंग और सिंचाई प्रबंधन करते हैं।
इसके अलावा भूकंप निगरानी, सुनामी चेतावनी प्रणाली और पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की गति के अध्ययन में भी जीपीएस की भूमिका अहम है। दुनिया भर में स्थापित स्थायी जीपीएस रिसीवर स्टेशन वैज्ञानिकों को पृथ्वी के घूर्णन और भूगर्भीय बदलावों को समझने में सहायता करते हैं।
अमेरिकी जीपीएस के अलावा अब ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) के अंतर्गत कई देशों के अपने सिस्टम भी सक्रिय हैं। रूस का GLONASS (24 सैटेलाइट), यूरोपीय संघ का Galileo, चीन का BeiDou और भारत का NavIC (नाविक) इसी श्रेणी में आते हैं। भारत का NavIC सिस्टम विशेष रूप से दक्षिण एशिया क्षेत्र में सटीक नेविगेशन सेवाएं देने के लिए विकसित किया गया है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और भारत की भूमिका
पुराने समय में नाविक आकाश में तारों की स्थिति देखकर दिशा का अनुमान लगाते थे। आज उसी कार्य को सैटेलाइट तकनीक अत्यंत तेज गति और अद्भुत सटीकता से करती है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने जीपीएस की शुरुआत 1970 के दशक में सैन्य उद्देश्यों से की थी, लेकिन 1983 में एक कोरियाई विमान हादसे के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने इसे नागरिक उपयोग के लिए खोल दिया।
भारत के इसरो (ISRO) ने NavIC प्रणाली विकसित करके देश को नेविगेशन तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह प्रणाली भारतीय उपमहाद्वीप और उसके आसपास के क्षेत्र में 20 मीटर से कम की सटीकता प्रदान करती है।
आने वाले समय में 5G नेटवर्क और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ जीपीएस तकनीक का एकीकरण इसे और अधिक सटीक और तेज बनाएगा। स्वचालित वाहन (Self-Driving Cars), ड्रोन डिलीवरी और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में जीपीएस की भूमिका भविष्य में और अधिक विस्तृत होने वाली है।