सूरज की रोशनी से बिजली कैसे उत्पन्न होती है? जानें सोलर पावर के काम करने का तरीका
सारांश
Key Takeaways
- सोलर पावर सूरज की रोशनी को बिजली में परिवर्तित करता है।
- यह एक स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा का स्रोत है।
- सोलर पैनल सिलिकॉन से बने होते हैं।
- इसका पहला सफल उपयोग 1958 में हुआ था।
- सोलर पैनल का उपयोग अंतरिक्ष में भी किया जाता है।
नई दिल्ली, 29 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। मानवता ने हजारों सालों से सूरज की रोशनी और गर्मी का उपयोग किया है, लेकिन सूरज की ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित करने की प्रक्रिया, जिसे हम सोलर पावर कहते हैं, केवल 200 वर्षों से भी कम पुरानी है। इसके बावजूद, इस छोटे से समय में सोलर पावर ने पूरी दुनिया को अनलिमिटेड बिजली प्रदान की है। आज, घरों से लेकर अंतरिक्ष तक, सोलर पावर का व्यापक उपयोग हो रहा है।
सोलर पावर सस्ती, स्वच्छ और असीमित ऊर्जा का स्रोत है। यह न केवल बिजली उत्पन्न करती है, बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसार, सोलर पावर का अर्थ है सूरज की रोशनी को बिजली में परिवर्तित करना। यह प्रक्रिया 'फोटोवोल्टिक प्रभाव' पर आधारित है। 1839 में, फ्रांसीसी वैज्ञानिक अलेक्जेंडर एडमंड बेकरेल ने इस प्रभाव की खोज की। उस समय वे केवल 19 वर्ष के थे और अपने पिता की प्रयोगशाला में काम कर रहे थे। जब उन्होंने रोशनी पर प्रयोग किया, तो बिजली का करंट उत्पन्न हुआ। यही घटना सोलर पावर के विकास की नींव बनी।
सोलर पैनल कैसे कार्य करता है? वैज्ञानिक बताते हैं कि सोलर पैनल मुख्य रूप से सिलिकॉन नामक सामग्री से निर्मित होते हैं। सिलिकॉन एक सेमीकंडक्टर है, जिसका अर्थ है कि यह बिजली को आसानी से नियंत्रित कर सकता है। एक सामान्य सोलर सेल में सिलिकॉन की तीन पतली परतें होती हैं। मध्य परत प्योर सिलिकॉन की होती है, जबकि ऊपरी और निचली परतों में कुछ अन्य तत्व मिलाए जाते हैं, जैसे एक तरफ फास्फोरस और दूसरी तरफ बोरॉन। जब सूरज की रोशनी इन परतों पर पड़ती है, तो सिलिकॉन के अंदर के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हो जाते हैं और घूमने लगते हैं। इससे एक तरफ नकारात्मक चार्ज और दूसरी तरफ सकारात्मक चार्ज जमा होता है। तारों को जोड़कर सर्किट बनाया जाता है और इलेक्ट्रॉन इस सर्किट से बहते हुए बिजली उत्पन्न करते हैं, जिसे हम उपयोग कर सकते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में कोई धुआं, प्रदूषण या शोर नहीं होता। केवल सूरज की रोशनी की आवश्यकता होती है, जिससे बिजली उत्पन्न होती है। सोलर पैनल इतने प्रभावी हैं कि अंतरिक्ष एजेंसियाँ इन्हें अंतरिक्ष यानों में भी उपयोग करती हैं। नासा के अनुसार, जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप भी सोलर पैनल से ही बिजली प्राप्त करता है। नासा निरंतर सोलर तकनीक को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा है।
अंतरिक्ष में सोलर पावर का पहला सफल उपयोग 1958 में हुआ था। अमेरिका ने मार्च 1958 में वैंगार्ड-1 नाम का पहला सोलर पावर से संचालित सैटेलाइट लॉन्च किया। इसके पहले, स्पुतनिक और एक्सप्लोरर-1 जैसे सैटेलाइट केवल बैटरी पर चलते थे और कुछ हफ्तों में बंद हो जाते थे, लेकिन वैंगार्ड-1 ने छह साल तक डेटा भेजा। आज सोलर पावर घरेलू बिजली, स्ट्रीट लाइट, पानी के पंप और बड़े सोलर पार्क में उपयोग किया जा रहा है।