सूरज की रोशनी से बिजली कैसे बनती है? जानें सोलर पावर की कार्यप्रणाली
सारांश
Key Takeaways
- सोलर पावर एक स्वच्छ और अनलिमिटेड ऊर्जा स्रोत है।
- इसकी तकनीक का आधार फोटोवोल्टिक प्रभाव है।
- सोलर पैनल में सिलिकॉन की परतें होती हैं।
- यह पर्यावरण की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- सोलर पावर का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है।
नई दिल्ली, 29 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। इंसान ने हजारों वर्षों से सूरज की रोशनी और गर्मी का उपयोग किया है, लेकिन सूरज की ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित करने की तकनीक, जिसे हम सोलर पावर कहते हैं, केवल 200 साल से भी कम पुरानी है। फिर भी, इस छोटे से समय में सोलर पावर ने विश्वभर में अनलिमिटेड बिजली उपलब्ध कराने की क्षमता हासिल कर ली है। आज, घरों से लेकर अंतरिक्ष तक, सोलर पावर का व्यापक उपयोग हो रहा है।
सोलर पावर एक सस्ती, स्वच्छ और अनलिमिटेड ऊर्जा का स्रोत है। यह न केवल बिजली जनरेट करता है, बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, सोलर पावर का अर्थ है सूरज की रोशनी को बिजली में परिवर्तित करना। यह प्रक्रिया 'फोटोवोल्टिक प्रभाव' पर आधारित है। वर्ष 1839 में, फ्रांसीसी वैज्ञानिक अलेक्जेंडर एडमंड बेकरेल ने इस प्रभाव की खोज की थी, जब वे अपने पिता की प्रयोगशाला में कार्यरत थे। उन्होंने देखा कि जब रोशनी उनके द्वारा बनाए गए उपकरणों पर पड़ी, तो उसमें से बिजली का करंट उत्पन्न हुआ। यही घटना सोलर पावर की नींव बनी।
अब बात करते हैं सोलर पैनल के काम करने की। वैज्ञानिकों का कहना है कि सोलर पैनल मुख्य रूप से सिलिकॉन नामक सामग्री से निर्मित होते हैं। सिलिकॉन एक सेमीकंडक्टर है, जिससे बिजली को नियंत्रित करना आसान होता है। एक सामान्य सोलर सेल में सिलिकॉन की तीन पतली परतें होती हैं। बीच की परत प्योर सिलिकॉन से बनी होती है, जबकि ऊपरी और निचली परतों में थोड़े भिन्न तत्व जैसे फास्फोरस और बोरॉन मिलाए जाते हैं। जब सूरज की रोशनी इन परतों पर पड़ती है, तो सिलिकॉन के अंदर के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर घूमने लगते हैं। इससे एक तरफ नेगेटिव चार्ज और दूसरी तरफ पॉजिटिव चार्ज जमा होता है। तारों को जोड़कर एक सर्किट तैयार किया जाता है और इलेक्ट्रॉन इसके माध्यम से बहते हैं, जिससे हम बिजली का उपयोग कर सकते हैं।
इस प्रक्रिया में कोई धुआं, प्रदूषण या शोर नहीं होता, केवल सूरज की रोशनी की आवश्यकता होती है और बिजली उत्पन्न हो जाती है। सोलर पैनल इतने उपयोगी हैं कि अंतरिक्ष एजेंसियां इन्हें अंतरिक्ष यानों में भी लगाती हैं। नासा के अनुसार, जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप भी सोलर पैनल से ही ऊर्जा प्राप्त करता है। नासा लगातार सोलर तकनीक को बेहतर बनाने में जुटा है।
यदि हम अंतरिक्ष में सोलर पावर के प्रारंभ की चर्चा करें, तो सोलर सेल का पहला सफल प्रयोग 1958 में हुआ था। अमेरिका ने मार्च 1958 में वैंगार्ड-1 नाम का पहला सोलर पावर से चलने वाला उपग्रह लॉन्च किया। इससे पहले, स्पुतनिक और एक्सप्लोरर-1 जैसे उपग्रह केवल बैटरी पर चलते थे और कुछ हफ्तों में बंद हो जाते थे, लेकिन वैंगार्ड-1 ने छह साल तक डेटा भेजा। आज, सोलर पावर का उपयोग घरेलू बिजली, स्ट्रीट लाइट, पानी के पंप और बड़े सोलर पार्क में हो रहा है।