ऐतिहासिक जलवायु समझौता: भारत-दक्षिण कोरिया ने पेरिस आर्टिकल 6.2 के तहत बनाया सीमा-पार कार्बन बाजार
सारांश
Key Takeaways
- भारत और दक्षिण कोरिया ने 24 अप्रैल 2026 को पेरिस समझौते के आर्टिकल 6.2 के तहत ऐतिहासिक जलवायु करार किया।
- यह समझौता दोनों देशों के बीच सीमा-पार कार्बन बाजार और कार्बन क्रेडिट (आईटीएमओ) के लेन-देन का रास्ता खोलता है।
- भारत का नेट-जीरो लक्ष्य 2070 और दक्षिण कोरिया का 2050 है — यह अंतर साझेदारी को रणनीतिक रूप से लाभकारी बनाता है।
- 'कॉरेस्पोंडिंग एडजस्टमेंट' नियम सुनिश्चित करता है कि एक उत्सर्जन कटौती को दो बार न गिना जाए।
- करार के साथ स्वच्छ ऊर्जा, व्यापार और उद्योग से जुड़े कई अन्य द्विपक्षीय समझौते भी हुए।
- COP30 से पहले यह करार भारत को वैश्विक कार्बन बाजार में एक प्रमुख गंतव्य के रूप में स्थापित करता है।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत और दक्षिण कोरिया ने 24 अप्रैल 2026 को पेरिस समझौते के आर्टिकल 6.2 के तहत एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय जलवायु करार पर हस्ताक्षर किए, जो दोनों एशियाई महाशक्तियों के बीच सीमा-पार कार्बन बाजार की नींव रखेगा। यह समझौता दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान संपन्न हुआ और इसे वैश्विक जलवायु कूटनीति में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
समझौते की मुख्य बातें
यह करार केवल जलवायु तक सीमित नहीं है — इसके साथ स्वच्छ ऊर्जा, व्यापार और औद्योगिक साझेदारी से जुड़े कई अन्य समझौते भी हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दोनों देश आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ साधना चाहते हैं।
आर्टिकल 6.2 का तंत्र देशों को मिलकर उत्सर्जन घटाने वाली परियोजनाओं पर काम करने और कार्बन क्रेडिट्स का आदान-प्रदान करने की सुविधा देता है। इससे कम लागत में जलवायु लक्ष्य हासिल करना संभव होता है।
आईटीएमओ और पारदर्शिता का ढांचा
इस प्रणाली के अंतर्गत उत्सर्जन में की गई कटौती को आईटीएमओ (Internationally Transferred Mitigation Outcome) कहा जाता है। एक आईटीएमओ का अर्थ है एक टन कार्बन डाइऑक्साइड या उसके समतुल्य गैस की कमी। इस व्यवस्था से देश किसी अन्य देश में परियोजनाओं में निवेश कर उस कटौती को अपने राष्ट्रीय लक्ष्य में जोड़ सकते हैं।
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 'कॉरेस्पोंडिंग एडजस्टमेंट' का नियम लागू होगा, जिसके तहत किसी एक उत्सर्जन कटौती को दो देश एक साथ नहीं गिन सकते। यह नियम पूरे कार्बन बाजार को विश्वसनीय और जवाबदेह बनाता है।
दोनों देशों के जलवायु लक्ष्य और रणनीतिक फायदा
भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, जबकि दक्षिण कोरिया यही लक्ष्य 2050 तक हासिल करना चाहता है। टाइमलाइन में यह अंतर ही इस साझेदारी को विशेष रूप से लाभकारी बनाता है।
दक्षिण कोरिया के पास अपने देश में उत्सर्जन घटाने के सीमित विकल्प हैं, इसलिए वह भारत में सस्ती हरित परियोजनाओं में निवेश कर सकता है। दूसरी ओर, भारत को स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए विदेशी वित्तपोषण मिलेगा, जिससे वह अपने ऊर्जा परिवर्तन को तेज कर सकता है।
वैश्विक कार्बन बाजार में भारत की बढ़ती भूमिका
दुनिया भर में कार्बन बाजार को लेकर रुचि तेजी से बढ़ रही है। कई देश पहले ही ऐसे द्विपक्षीय करार कर चुके हैं और दर्जनों परियोजनाएं सक्रिय हैं। विशेषज्ञ इन्हें अब जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अनिवार्य उपकरण मानते हैं।
गौरतलब है कि भारत पहले ही जापान, सिंगापुर और स्विट्जरलैंड जैसे देशों के साथ कार्बन क्रेडिट से जुड़ी वार्ताओं में सक्रिय रहा है। दक्षिण कोरिया के साथ यह करार भारत को वैश्विक कार्बन बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करता है।
यह समझौता ऐसे समय में आया है जब COP30 की तैयारियां जोरों पर हैं और देशों पर अपने NDC (राष्ट्रीय निर्धारित योगदान) को और महत्वाकांक्षी बनाने का अंतरराष्ट्रीय दबाव है। आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच पहली संयुक्त परियोजनाओं की रूपरेखा तय होने की उम्मीद है।