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मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें 83 डॉलर प्रति बैरल के पार, सप्लाई को लेकर चिंताएँ

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मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें 83 डॉलर प्रति बैरल के पार, सप्लाई को लेकर चिंताएँ

सारांश

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है। ईरान के होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से सप्लाई प्रभावित हुई है। जानिए इससे भारत के आयात पर क्या असर पड़ेगा।

मुख्य बातें

मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं।
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा अपेक्षाकृत सुरक्षित है।
भारत कच्चे तेल का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है।
कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है।

नई दिल्ली, 5 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। मिडिल ईस्ट में चल रहे बढ़ते तनाव के कारण गुरुवार को कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में 2 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गई। सप्लाई में कमी के चलते कीमतों में यह उछाल आया है, क्योंकि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) को बंद कर दिया है।

सुबह के शुरुआती कारोबार में इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर बेंचमार्क क्रूड का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट 2.43 प्रतिशत बढ़कर 83.26 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

वहीं, न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज (एनवाईमेक्स) पर वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) का अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट 2.63 प्रतिशत बढ़कर 76.63 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

रिपोर्टों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में एक कंटेनर जहाज पर प्रोजेक्टाइल से हमला किया गया, जिससे जहाज को नुकसान हुआ है।

तेल की कीमतों में इस निरंतर वृद्धि का असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमत साल भर में प्रति बैरल 1 डॉलर बढ़ती है, तो भारत का आयात बिल लगभग 16,000 करोड़ रुपए तक बढ़ सकता है।

इस बीच, सरकारी सूत्रों के मुताबिक, कच्चे तेल, एलपीजी, और एलएनजी के मामले में भारत वर्तमान में अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में है। देश के पास लगभग 25 दिनों का कच्चे तेल का भंडार और 25 दिनों के पेट्रोलियम उत्पादों का स्टॉक है, जिसमें वो तेल भी शामिल है जो जहाजों के जरिए भारत के बंदरगाहों की ओर आ रहा है।

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है, जिसमें से लगभग 50 प्रतिशत तेल मिडिल ईस्ट के देशों से आता है, जो मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है। ईरान युद्ध के बाद इस मार्ग से सप्लाई प्रभावित हुई है।

हालांकि, भारत ने अफ्रीका, रूस, और अमेरिका से तेल आयात बढ़ाकर अपने स्रोतों में विविधता लाई है और रणनीतिक भंडार बनाकर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है।

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने खाड़ी देशों के अलावा अन्य देशों से भी तेल आयात बढ़ाया है, जिसके चलते अब बड़ी मात्रा में तेल की सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते नहीं आती।

भारत ने 31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष में कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे। वहीं चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) के दौरान 206.3 मिलियन टन कच्चे तेल के आयात पर 100.4 अरब डॉलर खर्च किए गए।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसका सीधा असर भारत के आयात पर पड़ सकता है। सरकार को इस स्थिति का ध्यान रखते हुए रणनीतिक कदम उठाने की आवश्यकता है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का कारण क्या है?
कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का मुख्य कारण मिडिल ईस्ट में तनाव और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना है।
भारत कच्चे तेल की कितनी मात्रा का आयात करता है?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है।
क्या भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुरक्षित है?
हां, वर्तमान में भारत के पास कच्चे तेल का लगभग 25 दिनों का भंडार है, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा अपेक्षाकृत सुरक्षित है।
कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर भारत के आयात बिल पर क्या पड़ेगा?
यदि कच्चे तेल की कीमत साल भर में प्रति बैरल 1 डॉलर बढ़ती है, तो भारत का आयात बिल लगभग 16,000 करोड़ रुपए तक बढ़ सकता है।
भारत ने तेल आयात के लिए अन्य स्रोतों में क्या विविधता लाई है?
भारत ने अफ्रीका, रूस और अमेरिका से तेल आयात बढ़ाकर अपने स्रोतों में विविधता लाई है।
राष्ट्र प्रेस
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