दिव्या काकरान: कुश्ती की विरासत से कॉमनवेल्थ गेम्स तक, दो ब्रॉन्ज और अर्जुन पुरस्कार
सारांश
मुख्य बातें
दिव्या काकरान भारत की उन चुनिंदा महिला पहलवानों में शामिल हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बार-बार तिरंगे की शान बढ़ाई है। एशियन गेम्स 2018 और कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली दिव्या का सफर संघर्ष, समर्पण और पारिवारिक बलिदान की कहानी है।
कुश्ती की विरासत और परिवार का योगदान
8 अक्टूबर 1998 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जन्मी दिव्या को कुश्ती का खेल अपने परिवार से विरासत में मिला। उनके पिता और बड़े भाई दोनों पहलवान थे, लेकिन घर की आर्थिक तंगी के चलते उन्हें यह खेल बीच में ही छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद परिवार का संकल्प टूटा नहीं — बड़े भाई देव काकरान ने अपना स्वयं का कुश्ती करियर दाँव पर लगाकर दिव्या को आगे बढ़ाने का फैसला किया।
यह परिवार का त्याग ही था जिसने दिव्या की नींव को और मजबूत किया। मुजफ्फरनगर के अखाड़े से अंतरराष्ट्रीय मैट तक का उनका यह सफर भारतीय महिला कुश्ती के लिए प्रेरणास्रोत बन गया।
शुरुआती करियर और अंतरराष्ट्रीय पहचान
साल 2017 में एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में दिव्या ने 69 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीता और अपनी क्षमता का अहसास दुनिया को कराया। उसी वर्ष कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में भी उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया।
अगले ही साल यानी 2018 में दिव्या ने एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश को गौरवान्वित किया। उसी वर्ष कॉमनवेल्थ गेम्स में भी उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल हासिल करते हुए यह साबित किया कि वे महज एक प्रतियोगिता की खिलाड़ी नहीं, बल्कि निरंतर प्रदर्शन करने वाली पहलवान हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 और राष्ट्रीय सम्मान
कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में दिव्या ने 68 किलोग्राम वर्ग में एक बार फिर ब्रॉन्ज मेडल जीतकर यह साबित किया कि उनका अनुभव और कौशल उन्हें शीर्ष स्तर पर बनाए रखता है। इस तरह दिव्या कॉमनवेल्थ गेम्स में देश को दो बार ब्रॉन्ज दिलाने वाली पहलवान बन गईं।
कुश्ती में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2020 में उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके अलावा दिव्या ने आठ बार भारत केसरी का खिताब भी अपने नाम किया — जो घरेलू कुश्ती में उनकी अपराजेय साख का प्रमाण है।
विवाद और व्यक्तिगत जीवन
दिव्या का करियर केवल पदकों तक सीमित नहीं रहा — उनका नाम विवादों में भी आया। साल 2023 में जब पहलवान विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और अन्य महिला पहलवानों ने तत्कालीन भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण सिंह पर यौन शोषण के आरोप लगाते हुए जंतर-मंतर पर धरना दिया, तब दिव्या कथित तौर पर बृजभूषण सिंह के समर्थन में नजर आईं और उन्होंने आरोपों को निराधार बताया। इस रुख ने उन्हें आलोचनाओं के घेरे में ला दिया।
व्यक्तिगत जीवन में भी उन्हें झटका लगा — साल 2025 में दिव्या ने अपने पति सचिन प्रताप सिंह से तलाक ले लिया। दोनों का लगभग ढाई साल का विवाहित जीवन इस निर्णय के साथ समाप्त हो गया।
आगे का सफर
मुजफ्फरनगर की इस पहलवान ने जो मुकाम हासिल किया है, वह न केवल उनकी मेहनत का नतीजा है बल्कि उनके परिवार के बलिदान का भी प्रतिफल है। अर्जुन पुरस्कार विजेता दिव्या काकरान का सफर यह दर्शाता है कि भारतीय महिला कुश्ती आने वाले वर्षों में और ऊँचाइयाँ छू सकती है।