उस्ती नाद लाबेम ग्रां प्री 2025: भारत ने 8 गोल्ड सहित 12 मेडल जीते, लवलीना-प्रीति चमकीं
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय मुक्केबाज़ों ने चेक गणराज्य के उस्ती नाद लाबेम में आयोजित 56वें ग्रां प्री उस्ती नाद लाबेम यूरोपियन बॉक्सिंग गोल्ड टूर्नामेंट में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए कुल 12 मेडल — 8 गोल्ड, 3 सिल्वर और 1 ब्रॉन्ज — अपने नाम किए। महिला और पुरुष दोनों टीमों ने बराबरी से 4-4 गोल्ड जीते, जो भारतीय मुक्केबाज़ी की गहरी होती बेंच स्ट्रेंथ का प्रमाण है।
महिला टीम का दमदार प्रदर्शन
भारतीय महिला टीम ने 5 में से 4 गोल्ड जीतकर टूर्नामेंट में अपना दबदबा कायम किया। ओलंपिक मेडलिस्ट लवलीना बोरगोहेन ने 75 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में इटली की मेलिसा जेमिनी को 5-0 से हराकर गोल्ड पर कब्ज़ा जमाया। मौजूदा एशियन चैंपियन प्रीति पवार ने 54 किलोग्राम टाइटल मुकाबले में फ्रांस की जेसा मार्सेल को भी 5-0 से शिकस्त दी।
साक्षी (51 किलोग्राम) ने फ्रांस की मेसून बौरेगा के खिलाफ 5-0 की सर्वसम्मत जीत दर्ज की, जबकि प्रिया (60 किलोग्राम) ने मेज़बान देश की बारबोरा मैक्सोवा को 5-0 से पराजित कर गोल्ड अपने नाम किया। 65 किलोग्राम वर्ग में परवीन को फाइनल में हार के बाद सिल्वर से संतोष करना पड़ा।
पुरुष टीम ने भी लहराया परचम
पुरुष वर्ग में जादुमणि सिंह मंडेन्गबाम (55 किलोग्राम) ने इंग्लैंड के अब्दुल बर्टन को 4-1 से हराकर गोल्ड जीता। सचिन (60 किलोग्राम) और अंकुश (80 किलोग्राम) ने क्रमशः हंगरी के वेरेस रोहलैंड और चेक गणराज्य के फ्लोरियन डैनियल पर 5-0 से एकतरफा जीत दर्ज की।
नरेंद्र (90+ किलोग्राम) ने हैवीवेट फाइनल में आर्मेनिया के डेविड चालोयन के खिलाफ कड़े मुकाबले में 3-2 से जीत दर्ज कर भारत के लिए चौथा पुरुष गोल्ड सुनिश्चित किया।
सिल्वर और ब्रॉन्ज विजेता
65 किलोग्राम वर्ग में आदित्य प्रताप यादव और 90 किलोग्राम वर्ग में कपिल पोखरिया अपने-अपने फाइनल में करीबी हार के कारण सिल्वर मेडल तक सीमित रहे। 70 किलोग्राम वर्ग में सुमित कुंडू ने भारत के लिए एकमात्र ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया।
भारतीय मुक्केबाज़ी के लिए क्या मायने रखता है यह प्रदर्शन
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय मुक्केबाज़ी अगले बड़े अंतरराष्ट्रीय चक्र की तैयारी में जुटी है। लवलीना बोरगोहेन का निरंतर शीर्ष स्तर पर प्रदर्शन उन्हें भविष्य की प्रतियोगिताओं में मज़बूत दावेदार बनाता है। गौरतलब है कि प्रीति पवार का एशियन चैंपियनशिप के बाद यूरोपीय मंच पर भी दबदबा उनकी विश्वस्तरीय निरंतरता को रेखांकित करता है। यह टूर्नामेंट भारतीय मुक्केबाज़ों के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुभव और रैंकिंग सुधारने का अहम मौका था।