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गुरजीत कौर: टोक्यो ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ गोल दागकर इतिहास रचने वाली ड्रैग-फ्लिक क्वीन

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गुरजीत कौर: टोक्यो ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ गोल दागकर इतिहास रचने वाली ड्रैग-फ्लिक क्वीन

सारांश

एक किसान की बेटी, जो 70 किलोमीटर दूर बोर्डिंग स्कूल में पढ़ी और हॉकी की दुनिया में ऐसा गोल दागा जिसने इतिहास बदल दिया। गुरजीत कौर का टोक्यो ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वह एकमात्र गोल — भारतीय महिला हॉकी का सबसे बड़ा मोड़।

मुख्य बातें

गुरजीत कौर का जन्म 25 अक्टूबर 1995 को मियादी कलां, अमृतसर, पंजाब में एक किसान परिवार में हुआ।
उन्होंने 2020 टोक्यो ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एकमात्र गोल दागकर भारत को महिला हॉकी में पहली बार ओलंपिक सेमीफाइनल में पहुँचाया।
भारत के लिए 137 मैचों में 86 गोल — डिफेंडर के रूप में असाधारण उपलब्धि।
वह 2018 एशियन गेम्स (रजत), कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 (कांस्य), 2018 एशिया कप (स्वर्ण), 2022 एफआईएच नेशन्स कप (स्वर्ण) सहित कई पदक विजेता टीमों की सदस्य रहीं।
2014 में राष्ट्रीय टीम में चुनी गईं; तरनतारन के कैरों की हॉकी नर्सरी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी के शीर्ष पर पहुँचीं।
31 वर्षीय गुरजीत अभी भी सक्रिय खिलाड़ी हैं और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं।

भारतीय महिला हॉकी टीम की स्टार डिफेंडर और ड्रैग-फ्लिकर गुरजीत कौर ने 2020 टोक्यो ओलंपिक में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एकमात्र गोल दागकर भारत को महिला हॉकी के इतिहास में पहली बार ओलंपिक सेमीफाइनल में पहुँचाया था — एक ऐसी उपलब्धि जो भारतीय महिला खेलों के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। 25 अक्टूबर 1995 को पंजाब के अमृतसर जिले के मियादी कलां गाँव में जन्मी गुरजीत की यात्रा एक साधारण किसान परिवार से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी के सर्वोच्च मंच तक पहुँची है।

जड़ें: किसान परिवार से हॉकी नर्सरी तक

गुरजीत के पिता सतनाम सिंह एक किसान हैं, जिन्होंने अपनी बेटियों को बेहतर शिक्षा और अवसर दिलाने के लिए उन्हें घर से 70 किलोमीटर दूर तरनतारन जिले के कैरों स्थित एक बोर्डिंग स्कूल में भेजने का साहसी फैसला किया। गुरजीत की बड़ी बहन प्रदीप कौर भी उनके साथ इस सफर में शामिल रहीं।

कैरों भारत की सबसे पुरानी और सुप्रसिद्ध महिला हॉकी नर्सरियों में से एक है। यहीं पर दोनों बहनों ने इस खेल के प्रति अपने जुनून को पहचाना। हॉकी में बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत दोनों को स्कूल के सरकारी विंग में जगह मिली, जहाँ मुफ्त शिक्षा और भोजन की सुविधा ने आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार का बोझ कुछ हद तक हल्का किया।

ड्रैग-फ्लिकिंग का हुनर और करियर की शुरुआत

2011 तक कैरों में पढ़ाई-ट्रेनिंग के बाद गुरजीत जालंधर के लायलपुर खालसा कॉलेज फॉर विमेन चली गईं, जहाँ उन्होंने ड्रैग-फ्लिकिंग को गंभीरता से सीखा और निखारा। इसके बाद उन्हें इलाहाबाद में भारतीय रेलवे में जूनियर क्लर्क के रूप में नौकरी मिली — जो उस दौर में परिवार के लिए एक बड़ी राहत थी।

घरेलू स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन के बाद 2014 में गुरजीत को भारतीय सीनियर महिला हॉकी टीम में शामिल किया गया। तब से वह टीम का अभिन्न हिस्सा रही हैं। डिफेंडर की भूमिका के साथ-साथ वह टीम की प्रमुख ड्रैग-फ्लिकर भी हैं। अब तक वह भारत के लिए 137 मैचों में 86 गोल दर्ज कर चुकी हैं — एक रक्षक के लिए यह आँकड़ा असाधारण है।

पदकों की झड़ी: एशियाई से राष्ट्रमंडल तक

गुरजीत कौर के नाम कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ दर्ज हैं। वह 2018 जकार्ता एशियन गेम्स में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहीं। कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में उन्होंने कांस्य पदक जीता।

एशिया कप में भी उनका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा — 2018 एशिया कप में स्वर्ण और 2022 एशिया कप में कांस्य पदक। इसके अलावा, वह 2018 एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में रजत, 2022 एफआईएच नेशन्स कप (स्पेन) में स्वर्ण, और 2016 दक्षिण एशियाई गेम्स (गुवाहाटी) में स्वर्ण जीतने वाली भारतीय टीम का भी हिस्सा रहीं।

टोक्यो ओलंपिक: ऐतिहासिक गोल, ऐतिहासिक क्षण

2020 टोक्यो ओलंपिक गुरजीत के करियर का सबसे यादगार पड़ाव साबित हुआ। क्वार्टरफाइनल में दुनिया की नंबर एक टीम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्होंने एकमात्र गोल दागकर भारत को 1-0 से जीत दिलाई और देश को महिला हॉकी में पहली बार ओलंपिक सेमीफाइनल में पहुँचाया। यह उस मैच का इकलौता गोल था, और उस एक पल ने भारतीय महिला हॉकी को नई ऊँचाई पर पहुँचा दिया।

गौरतलब है कि भारतीय महिला हॉकी टीम इससे पहले कभी ओलंपिक सेमीफाइनल में नहीं पहुँची थी, और यह उपलब्धि टोक्यो में तब आई जब भारतीय खेलों में महिला एथलीटों की भागीदारी और सफलता एक नए शिखर को छू रही थी।

युवाओं की रोल मॉडल: आगे का सफर

25 अक्टूबर 2026 को 31 वर्ष की होने जा रही गुरजीत कौर अभी भी सक्रिय अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी हैं और देशभर की युवा खिलाड़ियों के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन चुकी हैं। पंजाब के एक छोटे से गाँव से निकलकर ओलंपिक इतिहास रचने तक का उनका सफर यह साबित करता है कि प्रतिभा और समर्पण के आगे संसाधनों की सीमाएँ नहीं टिकतीं। भारतीय महिला हॉकी का भविष्य उनके जैसी खिलाड़ियों की विरासत पर टिका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस ढाँचे की सफलता की कहानी है जो पंजाब की हॉकी नर्सरियों ने दशकों में खड़ा किया है — लेकिन जिसे अब भी नीतिगत उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। टोक्यो का वह गोल एक पल में नहीं आया, उसके पीछे एक पिता का त्याग, एक बोर्डिंग स्कूल की मुफ्त रोटी, और वर्षों की अनाम मेहनत थी। सवाल यह है कि ऐसी प्रतिभाओं को पहचानने और सहेजने की प्रणाली कितनी मज़बूत है — क्योंकि हर गुरजीत को सतनाम सिंह जैसा पिता और कैरों जैसी नर्सरी नहीं मिलती।
RashtraPress
24 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गुरजीत कौर ने टोक्यो ओलंपिक में क्या उपलब्धि हासिल की?
गुरजीत कौर ने 2020 टोक्यो ओलंपिक के क्वार्टरफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एकमात्र गोल दागकर भारत को 1-0 से जीत दिलाई और महिला हॉकी में पहली बार ओलंपिक सेमीफाइनल में पहुँचाया। यह भारतीय महिला हॉकी के इतिहास का सबसे बड़ा क्षण माना जाता है।
गुरजीत कौर का प्रारंभिक जीवन और परिवार कैसा था?
गुरजीत कौर का जन्म 25 अक्टूबर 1995 को अमृतसर, पंजाब के मियादी कलां गाँव में एक किसान परिवार में हुआ। उनके पिता सतनाम सिंह ने उन्हें और उनकी बड़ी बहन प्रदीप कौर को 70 किलोमीटर दूर तरनतारन जिले के कैरों में बोर्डिंग स्कूल भेजा, जहाँ मुफ्त शिक्षा और भोजन की सुविधा मिली।
गुरजीत कौर ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में कितने गोल किए हैं?
गुरजीत कौर भारत के लिए 137 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 86 गोल दर्ज कर चुकी हैं। डिफेंडर और ड्रैग-फ्लिकर की दोहरी भूमिका में यह आँकड़ा उन्हें भारतीय महिला हॉकी की सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में शुमार करता है।
गुरजीत कौर ने अपने करियर में कौन-कौन से अंतरराष्ट्रीय पदक जीते हैं?
गुरजीत कौर 2018 एशियन गेम्स (रजत), 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स (कांस्य), 2018 एशिया कप (स्वर्ण), 2022 एशिया कप (कांस्य), 2018 एशियन चैंपियंस ट्रॉफी (रजत), 2022 एफआईएच नेशन्स कप स्पेन (स्वर्ण), और 2016 दक्षिण एशियाई गेम्स गुवाहाटी (स्वर्ण) जीतने वाली भारतीय टीमों का हिस्सा रही हैं।
गुरजीत कौर ने ड्रैग-फ्लिकिंग कहाँ से सीखी?
गुरजीत कौर ने जालंधर के लायलपुर खालसा कॉलेज फॉर विमेन में पढ़ाई के दौरान ड्रैग-फ्लिकिंग को गंभीरता से सीखा और निखारा। इससे पहले तरनतारन के कैरों की हॉकी नर्सरी में उनकी बुनियाद तैयार हुई थी।
राष्ट्र प्रेस
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