ईरान-पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर तस्करी: शासन विफलता और सैन्य तत्वों की मिलीभगत का खुलासा
सारांश
मुख्य बातें
ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तीन-देशीय सीमा पर फल-फूल रही तस्करी को महज एक आपराधिक समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी शासन विफलता का प्रतिबिंब बताया जा रहा है। 'यूरेशिया रिव्यू' की एक विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, इस अवैध व्यापार को ताकतवर और प्रभावशाली तत्वों का संरक्षण प्राप्त है, और सीमावर्ती समुदायों के पास आजीविका के वैकल्पिक साधनों के अभाव में यह सिलसिला लगातार जारी है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि सुरक्षा बलों और खुफिया तंत्र के कुछ हिस्से इसी व्यवस्था से लाभान्वित होते हैं।
शैडो पॉलिटिकल इकॉनमी का जाल
रिपोर्ट में कहा गया है कि दशकों से नीति-निर्माताओं ने इस समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के नज़रिए से देखा, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। रिपोर्ट के अनुसार, 'यह एक शैडो पॉलिटिकल इकॉनमी है, जो सुरक्षा ढाँचे, स्थानीय शासन प्रणालियों और सीमावर्ती समुदायों के जीवन-यापन के तरीकों में गहराई तक समा गई है।' इसके बने रहने का कारण केवल कमज़ोर सीमाएँ नहीं, बल्कि उन सैन्य तत्वों के निहित स्वार्थ भी हैं जिन्हें इस व्यवस्था के कायम रहने से फायदा होता है।
तस्करी के प्रमुख केंद्र और सामान
बलूचिस्तान के रेगिस्तान से लेकर ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को जोड़ने वाले दुर्गम रास्तों तक फैले ये नेटवर्क ईंधन, नशीले पदार्थों, हथियारों, लकड़ी, कीमती पत्थरों, सोने, संगमरमर और अन्य सामानों की तस्करी में सक्रिय हैं। रिपोर्ट के अनुसार, हेलमंद प्रांत में 'बहरामचा' और अफगानिस्तान के अर्घिस्तान ज़िले में 'शिन नारी' कॉरिडोर जैसे रणनीतिक केंद्र, स्थानीय तस्करों को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों से जोड़ने वाले अहम लॉजिस्टिक हब बन चुके हैं।
सरकारी दबाव के बाद भी नेटवर्क की लचीली रणनीति
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि ये नेटवर्क अलग-थलग आपराधिक गतिविधियाँ नहीं हैं — बल्कि एक बहुआयामी, अनुकूलनशील व्यवस्था है। जब अधिकारी किसी एक स्रोत पर सख्ती करते हैं, तो तस्कर दूसरी ओर मुड़ जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ईंधन तस्करी में कमी आने पर कीमती पत्थरों की अवैध आवाजाही बढ़ जाती है; नशीले पदार्थों की जब्ती के साथ-साथ सोने और संगमरमर की तस्करी बढ़ने के उदाहरण मिलते हैं। इसी विविधतापूर्ण रणनीति के चलते ये नेटवर्क दीर्घकालिक रूप से टिके रहते हैं।
सरकारी तंत्र की मिलीभगत पर गंभीर सवाल
रिपोर्ट का सबसे तीखा निष्कर्ष यह है कि कड़ी निगरानी वाली सीमाओं से ईंधन टैंकर, लकड़ी की खेप और कीमती पत्थर तब तक नहीं गुज़र सकते, जब तक किसी न किसी स्तर पर सरकारी तंत्र की मिलीभगत या छूट न हो। रिपोर्ट के अनुसार, 'चाहे वह भ्रष्टाचार के ज़रिए हो, चुनिंदा कानून प्रवर्तन से हो, अनौपचारिक वसूली से हो, या राजनीतिक संरक्षण से — सरकारी तंत्र के कुछ हिस्से अक्सर उन्हीं गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं जिन्हें रोकना उनकी जिम्मेदारी है।' इसमें स्थानीय प्रशासन, सीमा सुरक्षा बलों, खुफिया एजेंसियों, सीमा शुल्क अधिकारियों और सेना से जुड़े कुछ तत्वों का नाम लिया गया है।
बलूचिस्तान: सबसे गंभीर मामला
रिपोर्ट में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत को सबसे स्पष्ट उदाहरण के रूप में पेश किया गया है, जो दशकों से आर्थिक पिछड़ेपन, सशस्त्र विद्रोह और कमज़ोर सरकारी मौजूदगी से जूझ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिकूल माहौल में अवैध व्यापार लोगों की आजीविका का ज़रिया बनता है और उन संरक्षण-नेटवर्कों को जीवित रखता है जिनकी मदद से ताकतवर स्थानीय लोग अपना प्रभाव बनाए रखते हैं। पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान के कुछ हिस्सों के लिए ये नेटवर्क जनजातीय संबंधों को साधने और अस्थिर इलाकों में एक प्रकार की कृत्रिम स्थिरता बनाए रखने का उपकरण भी बताए गए हैं। यह स्थिति तब तक नहीं बदलेगी जब तक सीमावर्ती समुदायों के लिए वैध आर्थिक अवसर और जवाबदेह शासन सुनिश्चित नहीं किया जाता।