प्रीतम सिवाच: कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड की नायिका और द्रोणाचार्य अवॉर्ड पाने वाली पहली महिला हॉकी कोच
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय महिला हॉकी की दिग्गज प्रीतम सिवाच ने खिलाड़ी और कोच — दोनों भूमिकाओं में इतिहास रचा है। 2002 कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय महिला हॉकी टीम को ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिलाने में उनकी केंद्रीय भूमिका रही, और 2021 में उन्हें द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित किया गया — यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाली वह पहली महिला हॉकी कोच बनीं। गुरुग्राम के निकट एक छोटे से गाँव से निकलकर राष्ट्रीय खेल सम्मान की शिखर तक पहुँचने की उनकी यात्रा भारतीय महिला खेल इतिहास में एक प्रेरक अध्याय है।
संघर्षपूर्ण शुरुआत और हॉकी की ललक
प्रीतम सिवाच का जन्म 2 अक्टूबर 1974 को गुरुग्राम के निकट स्थित झाड़सा गाँव में हुआ। महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने हॉकी थामी, तब गाँव में एक लड़की का खेल के मैदान पर जाना असामान्य माना जाता था। परिवार और गाँव वालों के तानों के बावजूद उन्होंने खेल नहीं छोड़ा।
जब वे 10वीं कक्षा में थीं, तब परिवार ने विवाह की बात चलाई। प्रीतम ने खुद के लिए केवल दो वर्ष का समय माँगा और उस समय का पूरा उपयोग हॉकी साधना में किया। यह दृढ़ निश्चय आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पूँजी साबित हुआ।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान
1990 में प्रीतम ने पहली बार राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार जीता। 1992 में उन्होंने जूनियर एशिया कप में भारत का प्रतिनिधित्व किया — यह उनका पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट था, जिसमें उन्होंने अपनी छाप स्पष्ट रूप से छोड़ी। इसके बाद उन्होंने रेलवे ज्वॉइन किया और अपनी प्रतिभा को और धार दी।
लगातार बेहतरीन प्रदर्शन के चलते उन्हें भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी सौंपी गई। उनकी अगुवाई में टीम ने 1998 एशियन गेम्स में फाइनल तक का सफर तय किया और रजत पदक जीता। 2002 कॉमनवेल्थ गेम्स में उनकी भूमिका और भी यादगार रही, जब भारतीय महिला हॉकी टीम ने इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक हासिल किया।
कोच के रूप में नई पारी
खिलाड़ी के रूप में संन्यास के बाद प्रीतम ने कोचिंग में कदम रखा और यहाँ भी उन्होंने अपनी काबिलियत साबित की। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में वे भारतीय महिला हॉकी टीम की प्रशिक्षक रहीं। उन्होंने एशियन गेम्स और अर्जेंटीना में हुए विश्व कप के लिए भी टीम को तैयार किया।
सोनीपत में स्थापित अपनी हॉकी अकादमी के माध्यम से उन्होंने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को तराशा। उनकी अकादमी से तैयार कई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना परचम लहरा चुके हैं — जो उनकी कोचिंग विरासत का सबसे ठोस प्रमाण है।
राष्ट्रीय सम्मान और ऐतिहासिक उपलब्धि
भारतीय हॉकी में असाधारण योगदान के लिए प्रीतम को 1998 में प्रतिष्ठित अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके बाद 2021 में उन्हें द्रोणाचार्य अवॉर्ड प्रदान किया गया। गौरतलब है कि यह पुरस्कार पाने वाली वे पहली महिला हॉकी कोच बनीं — भारतीय खेल इतिहास में एक ऐसी उपलब्धि जो आने वाली पीढ़ियों की महिला कोचों के लिए मार्गदर्शक बनेगी।
यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब भारत महिला खेलों में निवेश बढ़ा रहा है और अधिक महिला कोचों को राष्ट्रीय टीमों की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। प्रीतम सिवाच की कहानी यह संदेश देती है कि सामाजिक बाधाएँ दृढ़ संकल्प के सामने टिक नहीं सकतीं।