24 अक्टूबर 2026
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फारूक अब्दुल्ला का बड़ा बयान: 'दिल्ली से न्याय की उम्मीद नहीं, हक के लिए खुद लड़ना होगा'

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फारूक अब्दुल्ला का बड़ा बयान: 'दिल्ली से न्याय की उम्मीद नहीं, हक के लिए खुद लड़ना होगा'

सारांश

फारूक अब्दुल्ला ने बारामुला में केंद्र पर खुलकर निशाना साधा — 'दिल्ली से न्याय नहीं, पहचान बचानी है तो हिम्मत से लड़ो।' पाकिस्तान वाले बयान और मेडिकल बॉन्ड विवाद ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है।

मुख्य बातें

फारूक अब्दुल्ला ने 24 अक्टूबर 2026 को बारामुला कार्यकर्ता सम्मेलन में कहा कि दिल्ली से न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती।
उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाने से ही जम्मू-कश्मीर के लोग 'बच' रहे हैं — एक विवादास्पद बयान।
मेडिकल छात्रों के लिए दो वर्षीय बॉन्ड सेवा और उल्लंघन पर ₹40 लाख की फाइल एक वर्ष से उपराज्यपाल के पास लंबित है।
अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि मौजूदा प्रशासन ने मेडिकल संस्थानों की स्वायत्तता समाप्त कर दी है।
उन्होंने जनता से आह्वान किया कि वे हिम्मत रखें और अपनी पहचान बचाने के लिए आवाज़ उठाएँ।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने 24 अक्टूबर 2026 को बारामुला में एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार किया और कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को अपने अधिकारों के लिए स्वयं आवाज़ उठानी होगी। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली से न्याय की उम्मीद रखना व्यर्थ है और यदि लोगों ने हिम्मत नहीं दिखाई तो उनकी पहचान मिट जाएगी।

पाकिस्तान और कश्मीर का मुद्दा

अब्दुल्ला ने एक विवादास्पद दावा करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि पाकिस्तान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों का मुद्दा उठाता रहा है। उन्होंने कहा, 'पाकिस्तान कई जगहों पर जा रहा है और कश्मीरियों के बारे में बात कर रहा है। इसी वजह से जम्मू-कश्मीर के लोग बच रहे हैं। नहीं तो कश्मीरियों के प्रति भारत के इरादे सही नहीं हैं।' यह टिप्पणी राजनीतिक हलकों में तीखी बहस का विषय बन सकती है, खासकर तब जब जम्मू-कश्मीर में नई निर्वाचित सरकार सत्ता में है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रशासनिक अड़चनें

फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के मौजूदा प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि राज्य में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों को दो वर्षों तक अस्पतालों में सेवा देनी अनिवार्य है, और यदि वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें ₹40 लाख की राशि सरकार को चुकानी होती है।

उन्होंने कहा कि इस विषय में फाइल पिछले एक वर्ष से उपराज्यपाल के पास लंबित है और अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। उन्होंने इसे प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बताया।

चिकित्सा संस्थानों की स्वायत्तता पर चिंता

मेडिकल संस्थानों की स्वायत्तता का मुद्दा उठाते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि पहले इन संस्थानों के निदेशक और समितियाँ स्वयं तय करती थीं कि कौन-से उपकरण मँगाने हैं और किन डॉक्टरों को नियुक्त करना है। उनके अनुसार वर्तमान व्यवस्था ने यह सारी शक्तियाँ छीन ली हैं। उन्होंने बताया, 'मैंने उनसे पूछा कि आपने स्वायत्तता खत्म कर दी है, तो उन्होंने मेरे सामने ही इस बात को मान लिया।'

लोगों से आह्वान: हिम्मत रखो, आवाज़ उठाओ

फारूक अब्दुल्ला ने अपने भाषण के अंत में जनता से सीधा आह्वान किया। उन्होंने कहा, 'उनका सामना करने की हिम्मत रखो, अगर नहीं करोगे तो आप खत्म हो जाओगे।' साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे देश के साथ मिलकर चलने और देश के लिए बलिदान देने को तैयार हैं, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को खुद को सुधारना होगा।

गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस नीत सरकार केंद्र के साथ कई मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने में जुटी है। अब्दुल्ला का यह आक्रामक तेवर दर्शाता है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस अब केंद्र-राज्य संबंधों पर सार्वजनिक रूप से टकराव का रास्ता अपनाने को तैयार है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक संवेदनशील कूटनीतिक दावा है जो उनकी अपनी पार्टी की सत्ता में वापसी के बाद और भी तीखा लगता है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस विरोधाभास को नज़रअंदाज़ करती है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस, जो राज्य सरकार चला रही है, उसी केंद्र को सार्वजनिक रूप से चुनौती दे रही है जिसके सहयोग के बिना उसका शासन नहीं चल सकता। स्वास्थ्य सेवा जैसे ज़मीनी मुद्दों पर उपराज्यपाल की लंबित फाइल केंद्र-राज्य शक्ति संघर्ष का ठोस उदाहरण है, जिसे राजनीतिक बयानबाज़ी से अलग देखा जाना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या यह तेवर चुनावी गणित है या जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की रणनीतिक ज़मीन तैयार करना।
RashtraPress
24 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फारूक अब्दुल्ला ने दिल्ली से न्याय न मिलने की बात क्यों कही?
फारूक अब्दुल्ला ने बारामुला कार्यकर्ता सम्मेलन में कहा कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ न्याय नहीं कर रही, इसलिए उन्हें खुद अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। उन्होंने प्रशासनिक उदासीनता और मेडिकल संस्थानों की स्वायत्तता छीने जाने को उदाहरण के तौर पर पेश किया।
फारूक अब्दुल्ला ने पाकिस्तान के बारे में क्या विवादास्पद बात कही?
उन्होंने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर के लोग इसलिए 'बचे' हुए हैं क्योंकि पाकिस्तान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरियों का मुद्दा उठाता रहा है। यह बयान राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील है और इस पर विवाद अपेक्षित है।
जम्मू-कश्मीर में मेडिकल बॉन्ड को लेकर क्या विवाद है?
जम्मू-कश्मीर में मेडिकल छात्रों को पढ़ाई के बाद दो वर्षों तक सरकारी अस्पतालों में सेवा देनी अनिवार्य है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें ₹40 लाख की राशि सरकार को देनी होती है — और इस विषय की फाइल पिछले एक वर्ष से उपराज्यपाल के पास लंबित है।
फारूक अब्दुल्ला ने मेडिकल संस्थानों की स्वायत्तता पर क्या आरोप लगाया?
उन्होंने कहा कि पहले मेडिकल संस्थानों के निदेशक और समितियाँ खुद उपकरण और डॉक्टरों की नियुक्ति तय करती थीं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था ने यह सारी शक्तियाँ छीन ली हैं। उन्होंने दावा किया कि सरकारी प्रतिनिधि ने भी उनके सामने यह स्वीकार किया।
नेशनल कॉन्फ्रेंस सत्ता में होते हुए केंद्र की आलोचना क्यों कर रही है?
नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर में सरकार चला रही है, लेकिन केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण कई अहम शक्तियाँ उपराज्यपाल के पास हैं। अब्दुल्ला की यह आलोचना केंद्र-राज्य शक्ति संघर्ष और पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की माँग से जुड़ी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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