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पीओके में हत्याएं हो रही हैं, केंद्र चुप क्यों है — फारूक अब्दुल्ला का सवाल

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पीओके में हत्याएं हो रही हैं, केंद्र चुप क्यों है — फारूक अब्दुल्ला का सवाल

सारांश

फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र से सीधा सवाल किया — पीओके को अपना बताते हो, तो वहाँ की हत्याओं पर चुप क्यों? संयुक्त राष्ट्र और प्रधानमंत्री से बार-बार अपील के बाद भी कोई जवाब नहीं। साथ ही जम्मू-कश्मीर में छात्र आंदोलन, बेरोज़गारी और नशे की समस्या पर भी चिंता जताई।

मुख्य बातें

फारूक अब्दुल्ला ने 29 जुलाई 2026 को श्रीनगर में केंद्र सरकार से पीओके में कथित हत्याओं पर आवाज़ उठाने की माँग की।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग से पीओके का दौरा करने और प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री से हस्तक्षेप की बार-बार अपील की है।
एनसी अध्यक्ष ने चेतावनी दी कि छात्रों की माँगें न मानी गईं और एफआईआर-गिरफ्तारियाँ जारी रहीं तो जम्मू-कश्मीर में छात्र आंदोलन और तेज होगा।
बेरोज़गारी और नशीली दवाओं का दुरुपयोग क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में बताया गया।
20 जुलाई को एनसी का जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थान बदलकर पृथ्वीराज रोड, नई दिल्ली करना पड़ा था।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने 29 जुलाई 2026 को श्रीनगर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान केंद्र सरकार से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में जारी कथित हत्याओं और मानवाधिकार उल्लंघनों पर खुलकर बोलने की माँग की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि सरकार पीओके को भारत का अभिन्न अंग मानती है, तो वहाँ की घटनाओं पर चुप्पी साधना स्वीकार्य नहीं है।

केंद्र की चुप्पी पर सवाल

डॉ. अब्दुल्ला ने कहा कि केंद्र सरकार बार-बार पीओके को भारत का हिस्सा घोषित करती है, लेकिन जब वहाँ कथित हत्याओं और मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें आती हैं तो कोई आधिकारिक बयान नहीं आता। उन्होंने कहा, 'वे कहते रहते हैं कि पीओके हमारा हिस्सा है। अगर यह आपका हिस्सा है तो आप वहाँ हो रही घटनाओं के बारे में बात क्यों नहीं करते? आप यह क्यों नहीं कहते कि हत्याएं बंद होनी चाहिए? मैंने उनकी तरफ से कोई बयान नहीं सुना है।'

यह बयान ऐसे समय में आया है जब पीओके में अशांति की खबरें लगातार सामने आ रही हैं और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन वहाँ के हालात पर चिंता जता चुके हैं।

संयुक्त राष्ट्र और केंद्र से अपील

डॉ. अब्दुल्ला ने बताया कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग से अनुरोध किया है कि वे पीओके जाएँ, वहाँ के हालात का जायजा लें और समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करें। उन्होंने कहा, 'मैंने प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री से भी बार-बार अपील की है कि वे दखल दें।' आलोचकों का कहना है कि इस मुद्दे पर केंद्र की निष्क्रियता कूटनीतिक दृष्टि से भी कमज़ोर संकेत देती है।

छात्र आंदोलन और जम्मू-कश्मीर के हालात

पीओके के अलावा एनसी अध्यक्ष ने जम्मू-कश्मीर के भीतर भी कई मुद्दे उठाए। उन्होंने छात्रों के नेतृत्व में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों का समर्थन करते हुए चेतावनी दी कि यदि अधिकारियों ने छात्रों की माँगें पूरी नहीं कीं और उन पर एफआईआर दर्ज करना व गिरफ्तारियाँ जारी रखीं, तो आंदोलन और तेज होगा। उन्होंने कहा, 'छात्र जाग चुके हैं और, ईश्वर ने चाहा तो, वे इसे आगे बढ़ाएंगे।'

डॉ. अब्दुल्ला ने बेरोज़गारी और नशीली दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग को भी क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिनाया। उन्होंने कहा कि युवाओं में नशे की लत का सीधा संबंध रोज़गार के अवसरों की कमी से है।

जंतर-मंतर प्रदर्शन और राज्य दर्जे की माँग

गौरतलब है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों ने 20 जुलाई को जंतर-मंतर, नई दिल्ली पर जम्मू-कश्मीर का राज्य दर्जा बहाल करने की माँग को लेकर विरोध-प्रदर्शन की योजना बनाई थी। हालाँकि उसी दिन वहाँ एक अन्य संगठन का कार्यक्रम होने के कारण एनसी को अपना प्रदर्शन स्थान बदलकर पृथ्वीराज रोड, नई दिल्ली करना पड़ा। यह मुद्दा जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है।

आगे क्या

डॉ. अब्दुल्ला की यह माँग केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन पर दबाव बढ़ाती है। पीओके पर भारत की आधिकारिक नीति और ज़मीनी स्तर पर उसके क्रियान्वयन के बीच की खाई अब राजनीतिक विमर्श में और प्रमुख हो सकती है। छात्र आंदोलन और बेरोज़गारी के मुद्दे भी आने वाले दिनों में राजनीतिक दबाव का कारण बन सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

नेता 'अभिन्न अंग' की दुहाई देते हैं, लेकिन जब वहाँ कथित उल्लंघनों की खबरें आती हैं तो राजनयिक मोर्चे पर सन्नाटा छा जाता है। यह चुप्पी केवल कूटनीतिक संयम नहीं, बल्कि नीतिगत असंगति का संकेत भी है। जम्मू-कश्मीर के भीतर छात्र आंदोलन और बेरोज़गारी के मुद्दे बताते हैं कि राज्य दर्जे की बहाली और आर्थिक अवसरों का अभाव अब सड़क पर उतर आया है। केंद्र के लिए यह समय केवल बयानबाज़ी नहीं, ठोस जवाब देने का है।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फारूक अब्दुल्ला ने पीओके पर केंद्र से क्या माँग की है?
डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार से माँग की है कि वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कथित हत्याओं और मानवाधिकार उल्लंघनों पर सार्वजनिक रूप से आवाज़ उठाए। उनका तर्क है कि यदि सरकार पीओके को भारत का अभिन्न अंग मानती है, तो वहाँ की घटनाओं पर चुप्पी स्वीकार्य नहीं है।
फारूक अब्दुल्ला ने संयुक्त राष्ट्र से क्या अनुरोध किया है?
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग से अनुरोध किया है कि वह पीओके का दौरा करे, वहाँ के हालात का आकलन करे और समस्याओं को सुलझाने में मदद करे। इसके अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री से भी बार-बार हस्तक्षेप की अपील की है।
जम्मू-कश्मीर में छात्र आंदोलन को लेकर अब्दुल्ला ने क्या कहा?
डॉ. अब्दुल्ला ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारियों ने छात्रों की माँगें पूरी नहीं कीं और उन पर एफआईआर दर्ज करना व गिरफ्तारियाँ जारी रखीं, तो आंदोलन और तेज होगा। उन्होंने कहा कि छात्र जाग चुके हैं और अपनी लड़ाई आगे बढ़ाएंगे।
नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर के राज्य दर्जे की माँग क्यों कर रही है?
नेशनल कॉन्फ्रेंस का मानना है कि 2019 में जम्मू-कश्मीर का राज्य दर्जा छीनकर उसे केंद्र शासित प्रदेश बनाना वहाँ की जनता के साथ अन्याय है। एनसी विधायकों ने 20 जुलाई को इसी माँग को लेकर नई दिल्ली में प्रदर्शन किया था।
जम्मू-कश्मीर में बेरोज़गारी और नशे की समस्या पर अब्दुल्ला ने क्या कहा?
डॉ. अब्दुल्ला ने बेरोज़गारी को क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिनाया और कहा कि युवाओं में नशीली दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग का सीधा संबंध रोज़गार के अवसरों की कमी से है। उन्होंने इसे एक गंभीर सामाजिक संकट बताया जिस पर तत्काल ध्यान देने की ज़रूरत है।
राष्ट्र प्रेस
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