फारूक अब्दुल्ला ने पीओके हिंसा पर पाकिस्तान को घेरा, संयुक्त राष्ट्र से जाँच की माँग
सारांश
मुख्य बातें
नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने 11 जून 2026 को श्रीनगर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) में जारी हिंसा और विरोध-प्रदर्शनों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से अपील की कि वह वहाँ की जमीनी स्थिति का खुद जाकर आकलन करे।
पीओके में हिंसा पर क्या बोले अब्दुल्ला
अब्दुल्ला ने कहा, 'पीओके कठिन स्थिति से गुजर रहा है और वहाँ लोगों पर जुल्म हो रहा है। जो हिस्सा पाकिस्तान के पास है, वहाँ आज जुल्म हो रहा है। वहाँ कई लोग शहीद हो चुके हैं।' उन्होंने स्वीकार किया कि पूरी जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन स्थिति को बेहद गंभीर बताया।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मानवाधिकारों की स्थिति पर तत्काल ध्यान देने की माँग करते हुए कहा कि यूएन की टीम को वहाँ का दौरा करना चाहिए और खुद देखना चाहिए कि स्थानीय लोगों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य का दर्जा और प्रशासनिक शक्तियों का सवाल
राज्य का दर्जा बहाल किए जाने के सवाल पर अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में स्थिरता तभी आएगी, जब भारत के साथ विलय की शर्तों की समीक्षा की जाएगी और कश्मीरियों का सम्मान बहाल किया जाएगा। उनके शब्दों में, 'स्थिति स्थिर नहीं है। स्थिरता तब आएगी, जब उन्हें यह एहसास होगा कि हम भी इंसान हैं।'
उन्होंने वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए और कहा कि अधिकांश शक्तियाँ उपराज्यपाल के पास हैं, जबकि ये शक्तियाँ दिल्ली से नामित व्यक्ति के पास नहीं होनी चाहिए। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जनता ने एक सरकार चुनी है, इसलिए उसे उसकी पूरी शक्तियाँ मिलनी चाहिए।
नेहरू-मोदी कार्यकाल की तुलना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे लंबे कार्यकाल पूरा करने के दावे पर अब्दुल्ला ने असहमति जताई। उन्होंने कहा, 'नहीं, पंडित जवाहरलाल नेहरू 17 साल तक इस पद पर रहे थे, जबकि वे अभी सिर्फ 12 साल से प्रधानमंत्री हैं।'
व्यापक संदर्भ और आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब पीओके में कथित तौर पर विरोध-प्रदर्शन और हिंसक झड़पें लगातार जारी हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस क्षेत्र की स्थिति को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि पीओके में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप नए नहीं हैं, लेकिन किसी प्रमुख कश्मीरी नेता द्वारा सीधे संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की माँग करना इस बहस को नई धार देता है। अब्दुल्ला की यह अपील भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत मानी जा रही है।