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मुरलीकांत पेटकर: 1965 युद्ध में 9 गोलियाँ खाकर भी झुके नहीं, 1972 पैरालंपिक में भारत को दिलाया पहला गोल्ड

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मुरलीकांत पेटकर: 1965 युद्ध में 9 गोलियाँ खाकर भी झुके नहीं, 1972 पैरालंपिक में भारत को दिलाया पहला गोल्ड

सारांश

9 गोलियाँ, एक टूटी रीढ़ और एक अटूट इरादा — मुरलीकांत पेटकर ने 1965 के युद्ध की तबाही के बाद 1972 के हाइडेलबर्ग पैरालंपिक में 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में स्वर्ण जीतकर भारतीय पैरा-खेलों की नींव रखी। यह सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं — एक सैनिक-एथलीट की असाधारण जिजीविषा की दास्तान है।

मुख्य बातें

मुरलीकांत पेटकर का जन्म 1 नवंबर 1944 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के पेठ इस्लामपुर गाँव में हुआ था।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में हवाई हमले के दौरान उन्हें 9 गोलियाँ लगीं और रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण वह स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए।
1972 के हाइडेलबर्ग पैरालंपिक में 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में स्वर्ण जीतकर वह भारत के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता बने।
सरकार ने 2018 में उन्हें पद्मश्री और 2025 में लाइफटाइम अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया।
बॉक्सर से पैरा-तैराक तक का उनका सफर भारतीय पैरा-एथलेटिक्स के इतिहास में एक मील का पत्थर है।

भारत के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर की कहानी केवल एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि एक ऐसे योद्धा की है जिसने युद्ध की विभीषिका और शारीरिक अक्षमता को अपने हौसले के सामने घुटने टेकने पर मजबूर किया। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 9 गोलियाँ खाने के बावजूद उन्होंने 1972 के हाइडेलबर्ग पैरालंपिक में 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। उनकी यह यात्रा आज भी लाखों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

प्रारंभिक जीवन और सेना में प्रवेश

मुरलीकांत पेटकर का जन्म 1 नवंबर 1944 को महाराष्ट्र के सांगली जिले के पेठ इस्लामपुर गाँव में हुआ था। बचपन से ही खेलों के प्रति उनकी गहरी रुचि थी। अपनी दृढ़ शारीरिक बनावट और जुझारू स्वभाव के बल पर वह भारतीय सेना में शामिल हुए। सेना में रहते हुए उन्होंने बॉक्सिंग में अपना करियर गढ़ने का निश्चय किया और उनके पंचों का दम शीघ्र ही सबकी नज़रों में आ गया।

1964 में इंटरनेशनल सर्विसेज स्पोर्ट्स मीट में सेना की ओर से भाग लेकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उनका बॉक्सिंग करियर तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था और सफलता की सीढ़ियाँ एक के बाद एक चढ़ते जा रहे थे।

1965 का युद्ध और जीवन को बदलने वाला हादसा

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध ने मुरलीकांत की ज़िंदगी का रुख पूरी तरह पलट दिया। पाकिस्तान की तरफ से हुए अचानक हवाई हमले में उन्हें 9 गोलियाँ लगीं और एक टैंकर भी उनके ऊपर से गुज़र गया। इस भीषण हादसे के बाद वह कई महीनों तक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते रहे।

रीढ़ की हड्डी में गोली लगने के कारण वह दोबारा अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सके। जिस खिलाड़ी का बॉक्सिंग रिंग में भविष्य चमक रहा था, वह अचानक व्हीलचेयर पर आ गया। यह किसी के लिए भी टूटने के लिए काफी था — लेकिन मुरलीकांत पेटकर ने हार मानने से इनकार किया।

तैराकी में नई शुरुआत और राष्ट्रीय पहचान

बॉक्सिंग छूट जाने के बाद मुरलीकांत ने पैरा तैराकी में अपना नया सफर शुरू किया। धीरे-धीरे इस खेल में भी उनकी लगन रंग लाई और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर सफलताएँ अर्जित कीं। नेशनल पैरा स्पोर्ट्स प्रतियोगिताओं में जीत के बाद उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भी भाग लिया।

यह ऐसे समय में आया जब भारत में पैरा-खेलों की अवधारणा लगभग अनजान थी। मुरलीकांत के प्रदर्शन ने न केवल उनके लिए, बल्कि देश में पैरा-एथलेटिक्स के भविष्य के लिए भी एक नई राह खोली।

1972 पैरालंपिक में ऐतिहासिक स्वर्ण

उनके करियर की सबसे चमकदार उपलब्धि 1972 में जर्मनी के हाइडेलबर्ग में आयोजित पैरालंपिक खेलों में आई। 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी स्पर्धा में मुरलीकांत ने स्वर्ण पदक जीतकर भारत के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता बनने का गौरव हासिल किया। गौरतलब है कि यह उपलब्धि उस दौर में आई जब भारत में पैरा-खेलों के लिए न संसाधन थे, न पर्याप्त सरकारी समर्थन।

यह भारतीय पैरालंपिक इतिहास की नींव का पत्थर साबित हुआ — एक ऐसी विरासत जिस पर आगे चलकर देवेंद्र झाझड़िया, मरियप्पन थंगावेलु और अन्य पैरा-चैंपियन खड़े हुए।

सम्मान और विरासत

दशकों तक उचित पहचान से वंचित रहने के बाद सरकार ने 2018 में मुरलीकांत पेटकर को पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके बाद 2025 में उन्हें लाइफटाइम अर्जुन पुरस्कार से भी नवाज़ा गया। आलोचकों का कहना है कि यह सम्मान कई दशक देर से मिला, फिर भी इसने पेटकर की विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।

आज मुरलीकांत पेटकर भारत के हर उस खिलाड़ी के लिए प्रेरणा हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना सर्वश्रेष्ठ देने का संकल्प रखता है। उनकी कहानी यह सिद्ध करती है कि इरादे में दम हो तो कोई भी बाधा अंतिम नहीं होती।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसे मुख्यधारा की मान्यता दशकों बाद मिली। यह उस व्यापक पैटर्न की ओर इशारा करता है जिसमें भारतीय पैरा-चैंपियनों की उपलब्धियाँ तब तक अनदेखी रहती हैं जब तक कोई बड़ा आयोजन या मीडिया दबाव नहीं बनता। पेटकर की विरासत का सम्मान तब पूरा होगा जब उनसे प्रेरित पीढ़ी को वह संसाधन और पहचान समय पर मिले जो उन्हें नहीं मिली।
RashtraPress
31 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मुरलीकांत पेटकर कौन हैं?
मुरलीकांत पेटकर भारत के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता हैं, जिन्होंने 1972 के हाइडेलबर्ग पैरालंपिक में 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी में गोल्ड जीता था। 1 नवंबर 1944 को महाराष्ट्र के सांगली जिले में जन्मे पेटकर पहले भारतीय सेना के बॉक्सर थे।
मुरलीकांत पेटकर दिव्यांग कैसे हुए?
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान के हवाई हमले में उन्हें 9 गोलियाँ लगीं और एक टैंकर भी उनके ऊपर से गुज़रा। रीढ़ की हड्डी में गोली लगने के कारण वह दोबारा अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सके।
1972 पैरालंपिक में मुरलीकांत पेटकर ने किस स्पर्धा में गोल्ड जीता था?
उन्होंने जर्मनी के हाइडेलबर्ग में आयोजित 1972 पैरालंपिक में 50 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था। इसके साथ वह पैरालंपिक में गोल्ड जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी बने।
मुरलीकांत पेटकर को कौन-से सरकारी सम्मान मिले हैं?
सरकार ने 2018 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया और 2025 में लाइफटाइम अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया। आलोचकों का मानना है कि यह पहचान उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि के मुकाबले कई दशक देर से आई।
मुरलीकांत पेटकर ने बॉक्सिंग छोड़कर तैराकी क्यों अपनाई?
1965 के युद्ध में रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के बाद वह बॉक्सिंग जारी नहीं रख सके। इसके बाद उन्होंने पैरा तैराकी में करियर बनाने का निश्चय किया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
राष्ट्र प्रेस
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