उषा नेगिसेटी: पिता की विरासत से विश्व मंच तक, 13 गोल्ड और ध्यानचंद पुरस्कार जीतने वाली पहली मुक्केबाज
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय महिला मुक्केबाजी की दिग्गज खिलाड़ी उषा नेगिसेटी ने सामाजिक बाधाओं को पार कर रिंग में ऐसी पहचान बनाई, जो आज भी नई पीढ़ी की महिला मुक्केबाजों के लिए प्रेरणास्रोत है। विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश में 13 अगस्त 1984 को जन्मी उषा ने अपने करियर में 13 गोल्ड, 5 सिल्वर और 5 ब्रॉन्ज मेडल जीते और साल 2020 में मुक्केबाजी में ध्यानचंद पुरस्कार पाने वाली भारत की पहली खिलाड़ी बनीं।
विरासत में मिला रिंग का जुनून
उषा के पिता एन. वी. रमना स्वयं एक राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज थे। पिता को रिंग में लड़ते देख उषा के मन में इस खेल के प्रति लगाव धीरे-धीरे पनपा और महज 16 साल की उम्र में उन्होंने पेशेवर मुक्केबाजी में कदम रख दिया। करियर की शुरुआत में उन्होंने द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित कोच आई. वेंकटेश्वर राव की देखरेख में मुक्केबाजी की बारीकियाँ सीखीं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर दबदबा
2004 से 2010 के बीच उषा ने लगातार छह बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता — यह उनकी तकनीकी श्रेष्ठता और अदम्य संकल्प का प्रमाण था। एशियाई चैंपियनशिप में भी उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया। विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में उन्होंने देश के लिए सिल्वर मेडल जीता। साल 2009 में डेनमार्क में आयोजित इंडो-यूरो इनविटेशनल कप में भी उनका प्रदर्शन यादगार रहा और वह गोल्ड मेडल जीतने में सफल रहीं।
चोट का झटका और कोचिंग में नई पारी
यह ऐसे समय में आया जब उषा का करियर अपने शिखर पर था — साल 2012 में घुटने और गर्दन की गंभीर चोट के कारण वह ओलंपिक में हिस्सा लेने से वंचित रह गईं। यह भारतीय महिला मुक्केबाजी के लिए भी एक बड़ा नुकसान था। हालाँकि, उषा ने निराशा को अवसर में बदला और खिलाड़ी के रूप में संन्यास के बाद 2013 से 2017 तक भारतीय सीनियर महिला मुक्केबाजी टीम की कोच के रूप में अपनी सेवाएँ दीं।
ध्यानचंद पुरस्कार: ऐतिहासिक सम्मान
मुक्केबाजी में उनके समग्र योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2020 में उन्हें प्रतिष्ठित ध्यानचंद पुरस्कार से नवाजा। गौरतलब है कि उषा इस खेल में यह सम्मान पाने वाली भारत की पहली मुक्केबाज हैं — एक ऐसी उपलब्धि जो उनकी विरासत को और भी अमर बनाती है।
महिला मुक्केबाजी पर स्थायी प्रभाव
उषा नेगिसेटी का सफर केवल पदकों तक सीमित नहीं है। खिलाड़ी और कोच — दोनों भूमिकाओं में उन्होंने महिलाओं को मुक्केबाजी की ओर प्रेरित किया और यह साबित किया कि सामाजिक अवरोध प्रतिभा और जुनून के आगे टिक नहीं सकते। उनकी यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत दस्तावेज़ बनी रहेगी।