उदय चंद: विश्व कुश्ती चैंपियनशिप जीतने वाले आज़ाद भारत के पहले पहलवान, 13 साल तक राष्ट्रीय चैंपियन
सारांश
मुख्य बातें
उदय चंद — यह नाम भारतीय कुश्ती के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। 1961 में जापान में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप का खिताब जीतकर उदय चंद आज़ाद भारत के पहले पहलवान बने जिन्होंने यह गौरव हासिल किया। इससे भी बड़ी उपलब्धि यह रही कि वे 1958 से 1970 तक लगातार 13 वर्षों तक राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियन रहे — एक ऐसा रिकॉर्ड जिसे आज तक कोई पहलवान नहीं तोड़ सका।
प्रारंभिक जीवन और कुश्ती की शुरुआत
उदय चंद का जन्म 25 जून 1935 को हरियाणा के हिसार जिले (वर्तमान फतेहाबाद) के जांडली गाँव में हुआ। उनके बड़े भाई हरिराम भी एक कुशल पहलवान थे, और उदय ने उन्हीं के साथ अखाड़े में कुश्ती की बारीकियाँ सीखीं। अपने पैने दाँव-पेंच और अटूट शारीरिक बल के बूते उन्होंने शीघ्र ही कुश्ती जगत में अपनी पहचान बनानी शुरू की।
ऐतिहासिक विश्व चैंपियनशिप खिताब
1961 में जापान में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में उदय चंद ने इतिहास रचा। स्वतंत्र भारत के लिए यह पहली बार था जब किसी पहलवान ने यह सर्वोच्च खिताब अपने नाम किया। उल्लेखनीय है कि इस प्रतियोगिता में उनके भाई हरिराम ने भी भाग लिया था। यह जीत केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि नवस्वतंत्र भारत की कुश्ती शक्ति का वैश्विक मंच पर पहला बड़ा ऐलान थी।
एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल में पदक
1962 के एशियाई खेलों में उदय चंद ने दो रजत पदक जीतकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण दिया। इसके बाद 1966 के एशियाई खेलों में उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया। 1970 में उनका स्वर्ण पदक जीतने का सपना भी साकार हुआ, जब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ गेम्स) में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
अर्जुन पुरस्कार और सेना में सेवा
भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों को 1961 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया — और उदय चंद कुश्ती में यह प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले देश के पहले पहलवान बने। खेल के साथ-साथ उन्होंने भारतीय सेना में भी सेवाएँ दीं। वे 1953 से 1970 तक सूबेदार के पद पर कार्यरत रहे।
कोचिंग विरासत और भविष्य की पीढ़ी
मैदान से संन्यास लेने के बाद उदय चंद ने कोचिंग के ज़रिये कुश्ती को अगली पीढ़ी तक पहुँचाया। 1970 से 1995 तक उन्होंने हरियाणा के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय (कृषि विश्वविद्यालय) में बतौर प्रशिक्षक सेवाएँ दीं और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक पहलवान तैयार किए। उनकी विरासत आज भी भारतीय कुश्ती की नींव में जीवित है।