विल्सन जोन्स: बिलियर्ड्स विश्व चैंपियन बनने वाले पहले भारतीय, 12 बार जीता राष्ट्रीय खिताब
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय बिलियर्ड्स के इतिहास में विल्सन जोन्स का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। वह इस खेल में विश्व चैंपियन बनने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी थे और उन्होंने अपनी उपलब्धियों से भारतीय बिलियर्ड्स को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। आज भले ही पंकज आडवाणी इस खेल का सबसे जाना-पहचाना नाम हों, लेकिन वह ज़मीन विल्सन जोन्स ने तैयार की थी।
खेल से प्रेम की शुरुआत
विल्सन जोन्स को बचपन से ही खेलों का गहरा शौक था। हॉकी और क्रिकेट के अलावा वह कंचे खेलने में भी निपुण थे। बिलियर्ड्स से उनका पहला परिचय तब हुआ जब वह खिड़की से अपने अंकल को यह खेल खेलते हुए देखा करते थे। धीरे-धीरे इस खेल की बारीकियों ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया।
17 वर्ष की आयु में उन्होंने बिलियर्ड्स खेलना शुरू किया। उन दिनों वह दिन में फैक्ट्री में काम करते और शाम को क्यू-बॉल थामते — यह अनुशासन और लगन ही उनकी सफलता की नींव बनी।
राष्ट्रीय स्तर पर उभरना
1949 में विल्सन पहली बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप में उतरे, जहाँ टी.जे. सेल्वाराज ने उन्हें हराया। लेकिन यह हार उन्हें तोड़ नहीं सकी। ठीक अगले वर्ष 1950 में उन्होंने वही मुकाबला पलटा और सेल्वाराज को हराकर राष्ट्रीय चैंपियन का ताज पहना। अपने करियर में उन्होंने कुल 12 बार राष्ट्रीय खिताब अपने नाम किया — एक ऐसा कीर्तिमान जो उनकी निरंतरता और वर्चस्व की गवाही देता है।
विश्व चैंपियनशिप का सफर
अंतरराष्ट्रीय मंच पर राह आसान नहीं थी। 1951, 1952 और 1954 में विश्व चैंपियनशिप में असफलता मिली। परंतु 1958 में विल्सन ने इतिहास रच दिया — शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने विश्व चैंपियनशिप जीती और बिलियर्ड्स में विश्व खिताब हासिल करने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए।
1962 में वह फिर फाइनल तक पहुँचे, लेकिन इस बार खिताब हाथ से फिसल गया। दो वर्ष बाद 1964 में उन्होंने एक बार और विश्व चैंपियनशिप जीती और अपने नाम दो विश्व खिताब दर्ज किए।
संन्यास और कोचिंग की विरासत
1967 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीतने के बाद विल्सन जोन्स ने बतौर खिलाड़ी बिलियर्ड्स को अलविदा कह दिया। संन्यास के बाद उन्होंने कोचिंग की राह पकड़ी और अपनी विशेषज्ञता अगली पीढ़ी को सौंपी। ओम अग्रवाल, सुभाष अग्रवाल और अशोक शांडिल्य जैसे खिलाड़ी उनके मार्गदर्शन में ही निखरे।
पुरस्कार और सम्मान
भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने उनके योगदान को कई बार सराहा। उन्हें 1962 में अर्जुन पुरस्कार, 1965 में पद्म श्री, 1990 में महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार और 1996 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाज़ा गया — यह सम्मानों की वह सूची है जो खिलाड़ी और गुरु दोनों रूपों में उनकी महानता को रेखांकित करती है।
5 अक्टूबर 2003 को विल्सन जोन्स का निधन हो गया, लेकिन भारतीय बिलियर्ड्स में उनकी विरासत आज भी जीवंत है।