एबीवीपी का त्रिभाषा फॉर्मूले को समर्थन, JNU सचिव बोले — भाषा विविधता का सम्मान, थोपना नहीं
सारांश
मुख्य बातें
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) सचिव प्रवीण पियूष ने 30 मई 2026 को स्पष्ट किया कि उनका संगठन त्रिभाषा फॉर्मूले का पूर्ण समर्थन करता है। उनके अनुसार, भारत जैसे भाषाई और सांस्कृतिक विविधता वाले देश में तीन भाषाओं का यह ढाँचा उस विविधता को सम्मान देने का व्यावहारिक प्रयास है — न कि किसी भाषा को थोपने की कोशिश।
भाषाई विविधता और संवैधानिक स्वीकृति
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में सैकड़ों भाषाएँ और हजारों बोलियाँ प्रचलित हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में कई भाषाओं को आधिकारिक दर्जा प्राप्त है। पियूष ने कहा कि ऐसे परिवेश में किसी एक भाषा को प्राथमिकता देना या शेष को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं होगा।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी समाज की संस्कृति, सोच और सभ्यता को समझने की खिड़की है। उनके शब्दों में, 'हर भाषा अपने साथ एक पूरी ज्ञान परंपरा, इतिहास और जीवन-दृष्टि लेकर चलती है।'
मातृभाषा में शिक्षा और बहुभाषी दक्षता
पियूष के अनुसार, शिक्षा की सबसे प्रभावी पद्धति वह है जिसमें बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़ें — इससे वे अवधारणाओं को गहराई से आत्मसात कर पाते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि केवल मातृभाषा तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है; अन्य भाषाओं का ज्ञान छात्रों को देश के विभिन्न क्षेत्रों और वैश्विक मंच से जोड़ता है।
उनका मानना है कि त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत छात्र अपनी स्थानीय भाषा, एक अन्य भारतीय भाषा और अंग्रेजी — तीनों में दक्षता हासिल कर सकते हैं, जिससे उनके रोजगार और वैश्विक अवसर दोनों विस्तृत होंगे।
उत्तर-दक्षिण विभाजन पर स्पष्ट रुख
पियूष ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति 'विविधता में एकता' है और भाषा इस एकता को और सुदृढ़ कर सकती है। उन्होंने उत्तर व दक्षिण भारत के बीच किसी भी प्रकार के भाषाई विभाजन को अनुचित बताते हुए कहा कि यदि कोई उत्तर भारतीय तमिल साहित्य पढ़ता है तो वह दक्षिण की संस्कृति को समझ सकता है, और यदि कोई दक्षिण भारतीय हिंदी सीखता है तो वह उत्तर भारत की ज्ञान परंपरा से जुड़ सकता है।
तमिलनाडु के विरोध पर प्रतिक्रिया
यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु में त्रिभाषा फॉर्मूले को हिंदी थोपने के रूप में देखा जा रहा है। इस पर पियूष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह भाषा थोपने का मामला नहीं है, क्योंकि इस फॉर्मूले में छात्र को यह चुनने का विकल्प मिलता है कि वह कौन-सी भाषाएँ सीखना चाहता है।
उन्होंने माना कि अलग-अलग राज्यों और वर्गों की अपनी राय हो सकती है, किंतु उनके अनुसार यह नीति छात्रों के बौद्धिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक विकास के लिए अनिवार्य है और इसे देशभर में शीघ्र लागू किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी त्रिभाषा फॉर्मूले की अनुशंसा करती है, जो इस बहस को नीतिगत ढाँचे में और प्रासंगिक बनाती है।