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एएफटी का बड़ा फैसला: समलैंगिक संबंध स्वीकारने वाले IAF कर्मी की बर्खास्तगी 'डिस्चार्ज' में बदली

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एएफटी का बड़ा फैसला: समलैंगिक संबंध स्वीकारने वाले IAF कर्मी की बर्खास्तगी 'डिस्चार्ज' में बदली

सारांश

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने एक IAF कर्मी की बर्खास्तगी को 'रूटीन डिस्चार्ज' में बदल दिया, जिसने समलैंगिक संबंध और अनधिकृत विदेश यात्रा स्वीकार की थी। ट्रिब्यूनल ने पाया कि जाँच में राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ठोस खतरा नहीं दिखा। फैसला नज़ीर नहीं बनेगा।

मुख्य बातें

एएफटी की नई दिल्ली प्रिंसिपल बेंच ने IAF कर्मी की बर्खास्तगी को 'रूटीन डिस्चार्ज' में बदला।
आवेदक ने दिसंबर 2016 में IAF जॉइन किया था और लगभग साढ़े दस साल सेवा की।
जाँच में राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ठोस खतरा नहीं पाया गया — यह एएफटी की प्रमुख टिप्पणी रही।
आवेदक किसी भी आर्थिक लाभ, पेंशन या पूर्व-सैनिक दर्जे का हकदार नहीं होगा।
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि यह फैसला किसी अन्य मामले में नज़ीर के रूप में इस्तेमाल नहीं होगा।
बेंच की अध्यक्षता जस्टिस राजेंद्र मेनन और सदस्य जस्टिस रासिका चौबे ने की।

आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) की नई दिल्ली स्थित प्रिंसिपल बेंच ने भारतीय वायुसेना (IAF) के एक कर्मी — जिसने स्वयं को समलैंगिक बताया था और एक विदेशी नागरिक के साथ संबंध स्वीकार किए थे — की बर्खास्तगी को 'रूटीन डिस्चार्ज' में बदलने का आदेश दिया है। बेंच के चेयरमैन जस्टिस राजेंद्र मेनन और सदस्य जस्टिस रासिका चौबे ने यह निर्णय सुनाया। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी अन्य मामले में नज़ीर के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदक — जिसकी पहचान गोपनीय रखी गई है — ने दिसंबर 2016 में भारतीय वायुसेना जॉइन की थी। 2024 में उसने मानवीय आधार पर सेवामुक्ति (डिस्चार्ज) की माँग की और यह स्वीकार किया कि IAF परिसर के बाहर उसका एक विदेशी नागरिक के साथ समलैंगिक संबंध था। उसने यह भी माना कि उसने बिना अनुमति के अपने पार्टनर के साथ थाईलैंड और श्रीलंका की यात्रा दो बार की थी।

IAF की जाँच में पाया गया कि उसने अनुशासन का उल्लंघन किया और राष्ट्रीय सुरक्षा को संभावित खतरे में डाला। कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने अनधिकृत विदेश यात्रा को भी दोष के रूप में दर्ज किया। इस साल की शुरुआत में उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

आवेदक की माँग और ट्रिब्यूनल का रुख

आवेदक ने बर्खास्तगी को चुनौती नहीं दी, बल्कि केवल यह अनुरोध किया कि इसे 'डिस्चार्ज' में बदला जाए ताकि भविष्य में रोज़गार की संभावनाएँ प्रभावित न हों। उसके वकील ने स्पष्ट किया कि आवेदक किसी आर्थिक लाभ या पेंशन का दावेदार नहीं है — वह केवल सम्मानजनक सेवामुक्ति चाहता है ताकि वह अपने पार्टनर के साथ जीवन बसा सके और नागरिक क्षेत्र में काम कर सके।

ट्रिब्यूनल ने दर्ज किया कि आवेदक ने लगभग साढ़े दस वर्ष की सेवा की है, जो पेंशन या सेवानिवृत्ति लाभ के लिए निर्धारित सीमा से कम है।

एएफटी की मुख्य टिप्पणियाँ

बेंच ने अपने आदेश में कहा, "भले ही, जैसा कि प्रतिवादियों (IAF) का तर्क है, जब कोई कर्मचारी संघ के अनुशासित सशस्त्र बल में काम करता है, तो अनुशासन और नैतिकता के कुछ मानक लागू होते हैं... हालांकि, इस मामले में प्रतिवादियों ने कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया और उनके द्वारा की गई तथाकथित पूछताछ और जाँच में भी... राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की रक्षा या इंडियन एयरफोर्स के कामकाज से जुड़ी कोई चिंताजनक बात नहीं दिखी।"

ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि सामान्य परिस्थितियों में बर्खास्तगी को उचित ठहराया जा सकता था, लेकिन इस विशेष मामले में मानवीय दृष्टिकोण से अपवाद पर विचार किया जाना उचित था। बेंच ने कहा, "प्रतिवादी आवेदक को 'डिस्चार्ज' कर सकते थे, लेकिन अनुशासन बनाए रखने के नाम पर उन्होंने उसे 'बर्खास्त' कर दिया। दोनों का नतीजा एक ही है क्योंकि प्रतिवादी आवेदक की सेवा नहीं चाहते हैं।"

फैसले की सीमाएँ और आगे की राह

ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में बदलते हुए स्पष्ट किया कि आवेदक किसी भी प्रकार के आर्थिक लाभ, पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ या पूर्व-सैनिक का दर्जा पाने का हकदार नहीं होगा। साथ ही, AFT ने यह भी रेखांकित किया कि इस निर्णय को भविष्य के किसी अन्य मामले में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यह फैसला सशस्त्र बलों में व्यक्तिगत परिस्थितियों और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन की जटिल बहस को एक बार फिर सामने लाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

सशस्त्र बलों में अनुशासन के नाम पर की जाने वाली कार्रवाइयों की आनुपातिकता पर सवाल उठाता है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से इनकार किया था, और सशस्त्र बलों में यौन अभिविन्यास से जुड़ी नीति अभी भी अस्पष्ट है। बिना किसी स्पष्ट नीति ढाँचे के, ऐसे मामलों का निपटारा व्यक्तिगत न्यायिक विवेक पर निर्भर रहेगा — जो न संस्था के लिए उचित है, न व्यक्ति के लिए।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एएफटी ने IAF कर्मी की बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में क्यों बदला?
ट्रिब्यूनल ने पाया कि IAF की जाँच में राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ठोस खतरा नहीं दिखा और आवेदक ने केवल मानवीय आधार पर सम्मानजनक सेवामुक्ति माँगी थी। बेंच ने माना कि बर्खास्तगी का कलंक उसके भविष्य के करियर को अनावश्यक रूप से प्रभावित करेगा।
क्या इस फैसले से आवेदक को पेंशन या अन्य लाभ मिलेंगे?
नहीं। एएफटी ने स्पष्ट किया कि आवेदक किसी भी आर्थिक लाभ, पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ या पूर्व-सैनिक दर्जे का हकदार नहीं होगा। उसने लगभग साढ़े दस साल सेवा की, जो इन लाभों की पात्रता सीमा से कम है।
IAF ने आवेदक के खिलाफ क्या आरोप लगाए थे?
IAF की जाँच में पाया गया कि उसने एक विदेशी नागरिक के साथ संबंध बनाकर अनुशासन का उल्लंघन किया और बिना अनुमति थाईलैंड व श्रीलंका की यात्राएँ कीं। जाँच में राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे का भी उल्लेख था, जिसे एएफटी ने ठोस रूप से स्थापित नहीं माना।
क्या यह फैसला भविष्य के मामलों में नज़ीर बनेगा?
नहीं। एएफटी ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि इस निर्णय को किसी अन्य मामले में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यह फैसला इस विशेष मामले की परिस्थितियों तक ही सीमित है।
'बर्खास्तगी' और 'डिस्चार्ज' में क्या अंतर है?
'बर्खास्तगी' (Dismissal) एक दंडात्मक कार्रवाई है जो भविष्य में सरकारी या रक्षा नौकरियों के लिए अयोग्य बना सकती है और सामाजिक कलंक जोड़ती है। 'डिस्चार्ज' सामान्य सेवामुक्ति है, जो भविष्य के रोज़गार को उसी तरह प्रभावित नहीं करती।
राष्ट्र प्रेस
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