एएफटी का बड़ा फैसला: समलैंगिक संबंध स्वीकारने वाले IAF कर्मी की बर्खास्तगी 'डिस्चार्ज' में बदली
सारांश
मुख्य बातें
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) की नई दिल्ली स्थित प्रिंसिपल बेंच ने भारतीय वायुसेना (IAF) के एक कर्मी — जिसने स्वयं को समलैंगिक बताया था और एक विदेशी नागरिक के साथ संबंध स्वीकार किए थे — की बर्खास्तगी को 'रूटीन डिस्चार्ज' में बदलने का आदेश दिया है। बेंच के चेयरमैन जस्टिस राजेंद्र मेनन और सदस्य जस्टिस रासिका चौबे ने यह निर्णय सुनाया। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी अन्य मामले में नज़ीर के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक — जिसकी पहचान गोपनीय रखी गई है — ने दिसंबर 2016 में भारतीय वायुसेना जॉइन की थी। 2024 में उसने मानवीय आधार पर सेवामुक्ति (डिस्चार्ज) की माँग की और यह स्वीकार किया कि IAF परिसर के बाहर उसका एक विदेशी नागरिक के साथ समलैंगिक संबंध था। उसने यह भी माना कि उसने बिना अनुमति के अपने पार्टनर के साथ थाईलैंड और श्रीलंका की यात्रा दो बार की थी।
IAF की जाँच में पाया गया कि उसने अनुशासन का उल्लंघन किया और राष्ट्रीय सुरक्षा को संभावित खतरे में डाला। कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने अनधिकृत विदेश यात्रा को भी दोष के रूप में दर्ज किया। इस साल की शुरुआत में उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
आवेदक की माँग और ट्रिब्यूनल का रुख
आवेदक ने बर्खास्तगी को चुनौती नहीं दी, बल्कि केवल यह अनुरोध किया कि इसे 'डिस्चार्ज' में बदला जाए ताकि भविष्य में रोज़गार की संभावनाएँ प्रभावित न हों। उसके वकील ने स्पष्ट किया कि आवेदक किसी आर्थिक लाभ या पेंशन का दावेदार नहीं है — वह केवल सम्मानजनक सेवामुक्ति चाहता है ताकि वह अपने पार्टनर के साथ जीवन बसा सके और नागरिक क्षेत्र में काम कर सके।
ट्रिब्यूनल ने दर्ज किया कि आवेदक ने लगभग साढ़े दस वर्ष की सेवा की है, जो पेंशन या सेवानिवृत्ति लाभ के लिए निर्धारित सीमा से कम है।
एएफटी की मुख्य टिप्पणियाँ
बेंच ने अपने आदेश में कहा, "भले ही, जैसा कि प्रतिवादियों (IAF) का तर्क है, जब कोई कर्मचारी संघ के अनुशासित सशस्त्र बल में काम करता है, तो अनुशासन और नैतिकता के कुछ मानक लागू होते हैं... हालांकि, इस मामले में प्रतिवादियों ने कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया और उनके द्वारा की गई तथाकथित पूछताछ और जाँच में भी... राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की रक्षा या इंडियन एयरफोर्स के कामकाज से जुड़ी कोई चिंताजनक बात नहीं दिखी।"
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि सामान्य परिस्थितियों में बर्खास्तगी को उचित ठहराया जा सकता था, लेकिन इस विशेष मामले में मानवीय दृष्टिकोण से अपवाद पर विचार किया जाना उचित था। बेंच ने कहा, "प्रतिवादी आवेदक को 'डिस्चार्ज' कर सकते थे, लेकिन अनुशासन बनाए रखने के नाम पर उन्होंने उसे 'बर्खास्त' कर दिया। दोनों का नतीजा एक ही है क्योंकि प्रतिवादी आवेदक की सेवा नहीं चाहते हैं।"
फैसले की सीमाएँ और आगे की राह
ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी को डिस्चार्ज में बदलते हुए स्पष्ट किया कि आवेदक किसी भी प्रकार के आर्थिक लाभ, पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ या पूर्व-सैनिक का दर्जा पाने का हकदार नहीं होगा। साथ ही, AFT ने यह भी रेखांकित किया कि इस निर्णय को भविष्य के किसी अन्य मामले में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यह फैसला सशस्त्र बलों में व्यक्तिगत परिस्थितियों और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन की जटिल बहस को एक बार फिर सामने लाता है।