अहमदाबाद में 'भारत जल विमर्श 2047': जल संरक्षकों ने चेताया — तीसरा विश्व युद्ध पानी पर होगा
सारांश
मुख्य बातें
अहमदाबाद में 24 अगस्त को आयोजित दो दिवसीय 'भारत जल विमर्श 2047' कार्यक्रम में देशभर के जल संरक्षकों, पद्मश्री विजेता पर्यावरणविदों और नीति विशेषज्ञों ने एकजुट होकर जल संकट की गंभीरता पर मंथन किया। उद्यम और सेंटर फॉर वाटर पीस संस्थाओं के संयुक्त आयोजन में वक्ताओं ने एकस्वर में कहा कि जल संरक्षण अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।
मुख्य घटनाक्रम
'ग्रीन मैन ऑफ इंडिया' के नाम से चर्चित विजय पाल बघेल ने कार्यक्रम में कहा कि जलवायु शब्द स्वयं जल और वायु — इन दो तत्वों से बना है, और इन दोनों को बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाया जा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो उसकी जड़ में पानी की लड़ाई होगी। बघेल ने भू-पृष्ठ जल के अंधाधुंध दोहन को ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण बताया।
उन्होंने कहा कि जब से 'बटन कल्चर' — यानी बोरवेल और पंपों के अनियंत्रित उपयोग — का चलन बढ़ा है, तब से धरती की कोख खाली होती जा रही है। कोविड-19 महामारी के लॉकडाउन काल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब मानवीय गतिविधियाँ थमीं, तो नदियाँ निर्मल हुईं और प्रकृति अपने मूल स्वरूप में लौट आई — यह इस बात का प्रमाण है कि समस्या की जड़ में मानवीय व्यवहार है।
पद्मश्री विजेताओं का संदेश
पद्मश्री से सम्मानित सेठ पाल सिंह, जो उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद से हैं, ने कहा कि भारत नदियों का देश है और यदि नदियाँ नहीं बचीं तो समूची सृष्टि संकट में पड़ेगी। उन्होंने वर्षा जल संचयन के व्यावहारिक उपाय सुझाए — खेतों की मेढ़ मजबूत करना और छोटे-छोटे चेकडैम बनाना। सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से इस जल-चिंतन को जोड़ते हुए कहा कि जल सुरक्षा के बिना विकसित राष्ट्र की कल्पना अधूरी है।
2019 में पद्मश्री से सम्मानित भरत भूषण त्यागी, जो उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद से हैं, ने कहा कि मिट्टी से लेकर वनस्पति और समस्त जीव-जगत के लिए पानी की उपयोगिता को समझना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। उन्होंने जोर दिया कि जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, संरक्षण के प्रयास बार-बार सवालों के घेरे में रहेंगे।
जागरूकता और नीति पर ज़ोर
वकील और जल अधिकार कार्यकर्ता महेश गोयल ने बताया कि वे पिछले 18 वर्षों से जल संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं और उन्होंने इस विषय पर एक पुस्तक लिखी है, जिसकी अब तक 80,000 से अधिक प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं और वह कई भाषाओं में अनुवादित भी हो चुकी है। गोयल ने दो सूत्री संकल्प का आह्वान किया — पानी की बर्बादी रोकना और वर्षा जल का संग्रहण करना।
कार्यक्रम का आयोजन डॉ. मोर जोशी के नेतृत्व में किया गया और इसमें जल नीति एवं कार्य योजना पर विस्तृत चर्चा हुई।
आम जनता पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार भूजल का अत्यधिक दोहन केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है — ग्रामीण कृषि भी इससे सीधे प्रभावित हो रही है। वर्षा जल के बह जाने से न केवल भूजल रिचार्ज रुकता है, बल्कि उपजाऊ मिट्टी का कटाव भी होता है, जिससे किसानों की आजीविका संकट में पड़ती है।
क्या होगा आगे
इस दो दिवसीय विमर्श के समापन पर जल संरक्षण की एक साझा कार्य योजना तैयार किए जाने की उम्मीद जताई गई। आयोजकों के अनुसार इस कार्यक्रम का संदेश वैश्विक स्तर पर प्रसारित किया जाएगा, ताकि जल संकट के प्रति व्यापक जनजागरण हो सके। विशेषज्ञों ने सरकार से आग्रह किया कि विकसित भारत 2047 के रोडमैप में जल सुरक्षा को केंद्रीय स्थान दिया जाए।