अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट: सुप्रीम कोर्ट ने अहमद बावा अबूबकर बरेलवी की फाँसी पर लगाई रोक, गुजरात सरकार को नोटिस
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 1 अक्टूबर 2026 को 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम विस्फोट मामले में मौत की सजा पाए दोषी अहमद बावा अब्बू अबूबकर बरेलवी की फाँसी पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायालय ने गुजरात हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली बरेलवी की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर गुजरात सरकार समेत अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है, जिसमें उसकी दोषसिद्धि और मृत्युदंड को बरकरार रखा गया था।
पीठ की संरचना और आदेश
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की विशेष तीन-सदस्यीय पीठ ने यह अंतरिम आदेश पारित किया। पीठ ने एसएलपी पर सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार और अन्य प्रतिवादियों से जवाब माँगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक याचिका पर अंतिम सुनवाई नहीं होती, तब तक बरेलवी की सजा पर रोक बनी रहेगी।
बचाव पक्ष के तर्क
बरेलवी की ओर से पेश अधिवक्ता आशुतोष ठाकुर ने दोषसिद्धि और मृत्युदंड को बरकरार रखने वाले निष्कर्षों को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को पूरी तरह कथित साजिश के आधार पर दोषी ठहराया गया था और प्रत्यक्ष साक्ष्य अपर्याप्त थे। यह याचिका गुजरात हाई कोर्ट के उस निर्णय के विरुद्ध दायर की गई है जिसने सत्र न्यायालय के फैसले को अपरिवर्तित रखा था।
मामले की पृष्ठभूमि
26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद के कई इलाकों में एक के बाद एक हुए बम विस्फोटों में 56 लोगों की मौत हो गई थी और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस मामले में 35 एफआईआर दर्ज हुईं और 548 आरोपपत्र दाखिल किए गए। यह देश के सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक था।
ट्रायल इतना जटिल था कि 1,163 गवाहों और हजारों साक्ष्यों की जाँच के बाद सत्र न्यायालय का फैसला लगभग 7,000 पन्नों का रहा, जबकि पूरी मामले की फाइल में करीब 7.88 लाख पन्ने थे। आरोपी देश के 9 राज्यों — गुजरात, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और झारखंड — से थे।
सजा का विवरण
18 फरवरी 2022 को अहमदाबाद सत्र न्यायालय ने मामले के 78 आरोपियों में से 49 को दोषी ठहराया। इनमें से 38 दोषियों को — बरेलवी सहित — मौत की सजा सुनाई गई, जबकि शेष 11 को आजीवन कारावास दिया गया। 29 आरोपी बरी हुए। इसके बाद गुजरात सरकार ने सजा के क्रियान्वयन की माँग के साथ हाई कोर्ट का रुख किया था। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (IPC), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, सार्वजनिक संपत्ति क्षति अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और शस्त्र अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया गया था।
आगे की कार्यवाही
गौरतलब है कि यह मामला उन दुर्लभ मामलों में है जहाँ एक साथ इतने बड़े पैमाने पर मौत की सजाएँ सुनाई गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय में अब इस याचिका की सुनवाई न्यायिक प्रक्रिया के अंतिम चरण का प्रतीक है। न्यायालय का अंतिम निर्णय न केवल बरेलवी, बल्कि उन शेष 37 दोषियों के भविष्य पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है जिनकी फाँसी की सजा अभी भी लंबित है।