सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की जमानत रद्द की, आरोपी पति को एक सप्ताह में आत्मसमर्पण का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 6 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के एक दहेज हत्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत रद्द कर दी और उसे एक सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने इस राहत को "कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं" करार देते हुए अदालतों को महिलाओं के विरुद्ध अपराधों को "बहुत हल्के में" लेने के विरुद्ध कड़ी चेतावनी दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला गाजियाबाद निवासी एक महिला की मौत से जुड़ा है, जो 11 जुलाई 2024 को अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी। मृतका का विवाह फरवरी 2019 में हुआ था, अर्थात् उसकी मृत्यु शादी के सात साल के भीतर हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृत्यु का कारण "मृत्यु से पहले फांसी के परिणामस्वरूप दम घुटना" बताया गया था।
एफआईआर में लगाए गए आरोप
मृतका के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि विवाह के समय ₹30 लाख से अधिक खर्च करने के बावजूद, आरोपी पति और उसके परिवार ने एक एसयूवी और अतिरिक्त ₹10 लाख नकद दहेज की माँग जारी रखी। शिकायत के अनुसार, दहेज की माँग पूरी न होने पर महिला को शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनाया गया, उसके साथ मारपीट की गई, गाली-गलौज की गई और जान से मारने की धमकी दी गई। एफआईआर में यह भी उल्लेख है कि अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले मृतका ने फोन पर अपने पिता को बताया था कि ससुरालवाले उसके साथ मारपीट कर रहे हैं और जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। जाँच के बाद पति और उसके माता-पिता के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 तथा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप पत्र दायर किया गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का जमानत आदेश और सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अगस्त 2025 में आरोपी पति को जमानत दे दी थी, जिसमें मृत्यु के कारण और एफआईआर दर्ज करने में कथित देरी का हवाला दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने इतने गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में विवेक का प्रयोग करते हुए "घोर त्रुटि" की है। पीठ ने स्पष्ट किया कि जमानत अर्जी पर विचार करते समय उच्च न्यायालय से अपेक्षित है कि वह अपराध की प्रकृति और प्रथमदृष्टया मामले का गहनता से मूल्यांकन करे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ और कानूनी आधार
पीठ ने कहा कि मृतका की मृत्यु विवाह के सात साल के भीतर ससुराल में हुई और दहेज उत्पीड़न के गंभीर आरोप हैं, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 118 के तहत वैधानिक अनुमान को आकर्षित करते हैं। पिता द्वारा एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया मामले से कहीं अधिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। मृतका के पिता द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए पीठ ने आरोपी को एक सप्ताह में आत्मसमर्पण का निर्देश दिया, अन्यथा दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी।
दहेज हत्याओं पर सर्वोच्च न्यायालय की चिंता
दहेज हत्याओं में वृद्धि पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "एक युवती का विवाह दहेज की मांग को लेकर ससुराल में बेरहमी से मारे जाने के लिए नहीं होता। यह देश के कुछ राज्यों में — विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में — एक गंभीर समस्या है।" पीठ ने यह भी कहा कि शैक्षिक प्रगति और महिला सशक्तीकरण के प्रयासों के बावजूद विवाहित महिलाएँ दहेज की माँग के कारण लगातार उत्पीड़न झेल रही हैं। यह फैसला न्यायपालिका को महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में संवेदनशीलता बरतने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण संकेत है।