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एसआईआर पर निर्वाचन आयोग में 10 महीनों में 14 बार आपत्ति, अखिलेश ने बताया लोकतंत्र के लिए घातक

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एसआईआर पर निर्वाचन आयोग में 10 महीनों में 14 बार आपत्ति, अखिलेश ने बताया लोकतंत्र के लिए घातक

सारांश

निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेद अब सड़क से सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार आपत्ति दर्ज कराई — और अखिलेश यादव ने इसे लोकतंत्र के लिए घातक करार देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की माँग कर दी।

मुख्य बातें

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में निर्वाचन आयोग के फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई।
आपत्तियों में मतदाता सूची से नाम जोड़ने-हटाने, डेटा कस्टडी और एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं।
एक ही दिन चार बार आपत्ति दर्ज किए जाने का उल्लेख रिपोर्टों में है; प्रतियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त को भी भेजी गईं।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक्स पर इसे 'लोकतंत्र के लिए घातक' बताया और सर्वोच्च न्यायालय से स्वत: संज्ञान की अपील की।
अब तक निर्वाचन आयोग की ओर से इन रिपोर्टों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 23 सितंबर को मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर निर्वाचन आयोग के भीतर सामने आए कथित मतभेदों पर तीखी प्रतिक्रिया दी और सर्वोच्च न्यायालय से स्वत: संज्ञान लेने की अपील की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई।

मुख्य घटनाक्रम

रिपोर्टों के अनुसार, तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों ने आयोग के कई अहम फैसलों और आदेशों को उनकी जानकारी अथवा सहमति के बिना लिए जाने पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। उल्लेखनीय है कि एक ही दिन चार बार आपत्ति दर्ज किए जाने का भी उल्लेख इन रिपोर्टों में किया गया है। इन आपत्तियों की प्रतियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त को भी भेजी गई थीं।

रिपोर्टों के मुताबिक, आपत्तियों का दायरा उन महत्त्वपूर्ण कार्यों से जुड़ा है जो सीधे मतदाता के अधिकार और मतदाता सूची की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। इनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाना और दोबारा बहाल करना, अपील प्रक्रिया तथा पूरी मतदाता सूची के डेटा की कस्टडी और सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं।

अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'ये एक बेहद गंभीर समाचार है कि पिछले 10 महीनों में 2 चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के गलत निर्णयों पर 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। इसका सीधा मतलब ये है कि सभी चुनाव आयुक्त अपना सही काम नहीं कर पा रहे हैं।' उन्होंने आगे कहा, 'एक स्वतंत्र निकाय के सदस्यों को अगर न्यायपूर्ण कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं है या उनकी कोई सुनवाई नहीं है तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं।'

यादव ने इसे 'लोकतंत्र को मिटाने के षड्यंत्र' की संज्ञा देते हुए सर्वोच्च न्यायालय से स्वत: संज्ञान लेने की माँग की। उन्होंने कहा, 'कुछ लोगों द्वारा सत्ता की कठपुतली बनकर लोकतंत्र को धोखा देना घोर सांविधानिक अपराध है।'

एसआईआर क्या है और विवाद क्यों

मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) एक देशव्यापी प्रक्रिया है जो तीनों चुनाव आयुक्तों की सामूहिक निगरानी में संचालित होती है। आलोचकों का कहना है कि यदि इस प्रक्रिया से जुड़े निर्णय बहुमत की सहमति के बिना लिए जा रहे हैं, तो इससे मतदाता सूची की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों ने पहले से ही आपत्तियाँ जताई हुई हैं।

गौरतलब है कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके भीतर सदस्यों के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आना असाधारण माना जाता है। अब तक निर्वाचन आयोग की ओर से इन रिपोर्टों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

आम जनता पर असर

मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया सीधे करोड़ों मतदाताओं के मताधिकार को प्रभावित करती है। यदि इन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का अभाव है, तो आगामी चुनावों में मतदाता सूची की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप या संसदीय जाँच ही स्थिति को स्पष्ट कर सकती है।

क्या होगा आगे

अखिलेश यादव की सर्वोच्च न्यायालय से स्वत: संज्ञान की अपील के बाद यह देखना होगा कि न्यायपालिका इस मामले में कोई कदम उठाती है या नहीं। साथ ही, विपक्षी दलों के दबाव में निर्वाचन आयोग को अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली पर सफाई देनी पड़ सकती है। यह विवाद आने वाले समय में संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

न कि महज राजनीतिक बयानबाज़ी का विषय। असली सवाल यह है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने इन आपत्तियों का संज्ञान लिया और यदि नहीं, तो क्यों — यह जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं है। मुख्यधारा की कवरेज अखिलेश यादव के बयान पर केंद्रित है, लेकिन असली जाँच का विषय निर्वाचन आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया है। बिना आयोग की आधिकारिक प्रतिक्रिया के, एकतरफा रिपोर्टों के आधार पर संस्था की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा करना उतना ही जोखिमभरा है जितना इन आपत्तियों को नज़रअंदाज़ करना।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) क्या है और इस पर विवाद क्यों है?
एसआईआर मतदाता सूचियों की देशव्यापी समीक्षा प्रक्रिया है जो तीनों चुनाव आयुक्तों की निगरानी में होती है। विवाद इसलिए है क्योंकि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दो आयुक्तों ने इससे जुड़े फैसलों पर 10 महीनों में 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, यह आरोप लगाते हुए कि कुछ निर्णय उनकी सहमति के बिना लिए गए।
अखिलेश यादव ने सर्वोच्च न्यायालय से क्या माँग की है?
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में स्वत: संज्ञान लेने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यदि एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के सदस्यों की सुनवाई नहीं हो रही, तो यह लोकतंत्र के लिए घातक स्थिति है।
किन चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज कराई और किस विषय पर?
रिपोर्टों के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्तियाँ दर्ज कराईं। ये आपत्तियाँ नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने-बहाल करने, अपील प्रक्रिया और मतदाता डेटा की कस्टडी व सुरक्षा जैसे विषयों से संबंधित थीं।
निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों पर क्या कहा है?
23 सितंबर तक निर्वाचन आयोग की ओर से इन रिपोर्टों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई है। आयोग का पक्ष स्पष्ट न होने के कारण रिपोर्टों के दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
इस विवाद का आम मतदाताओं पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव साबित होता है, तो मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं, जो करोड़ों मतदाताओं के मताधिकार को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक या संसदीय जाँच ही इस मामले में स्थिति को स्पष्ट कर सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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