अंबोली दोहरे हत्याकांड: बॉम्बे हाई कोर्ट ने जितेंद्र राणा की उम्रकैद घटाकर 20 साल की, दो सह-आरोपी बरी
सारांश
मुख्य बातें
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 5 नवंबर 2026 को वर्ष 2011 के चर्चित अंबोली दोहरे हत्याकांड में अहम फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी जितेंद्र राणा की हत्या के मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि, अदालत ने उसकी आयु को दृष्टिगत रखते हुए आजीवन कारावास की सजा को संशोधित कर बिना किसी वैधानिक छूट के 20 वर्ष के सश्रम कारावास में परिवर्तित कर दिया। वहीं, सह-आरोपी सुनील भोट और दीपक तिवाल को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अक्टूबर 2011 में मुंबई के अंधेरी पश्चिम स्थित अंबोली इलाके में हुई दोहरी हत्या से जुड़ा है। 24 वर्षीय कीनन सैंटोस और 29 वर्षीय रूबेन फर्नांडिस अपनी तीन महिला मित्रों के साथ एक रेस्तरां गए थे। आरोप है कि वहाँ कुछ लोगों ने महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की, जिसका विरोध करने पर विवाद बढ़ गया। बाद में एक पान की दुकान के निकट दोनों पर चाकू से हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल कीनन की मौत 20 अक्टूबर 2011 को हुई, जबकि रूबेन ने 30 अक्टूबर 2011 को अस्पताल में उपचार के दौरान दम तोड़ा।
हाई कोर्ट का निर्णय
न्यायमूर्ति एमएस कार्णिक और न्यायमूर्ति संदीप पाटिल की खंडपीठ ने वर्ष 2016 में विशेष अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले के विरुद्ध दायर अपीलों पर गुरुवार को यह निर्णय सुनाया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें जितेंद्र राणा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराया गया था। आयु संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए उम्रकैद की सजा घटाकर 20 वर्ष का कठोर कारावास किया गया।
अदालत ने पाया कि सुनील भोट और दीपक तिवाल के विरुद्ध हत्या का आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, अतः दोनों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया। हालांकि, उनकी अन्य सजाएँ यथावत बनाए रखी गई हैं। उल्लेखनीय है कि अपील लंबित रहने के दौरान चौथे आरोपी सतीश दुल्हाज की पिछले वर्ष मृत्यु हो गई थी।
बचाव और अभियोजन पक्ष के तर्क
दोषियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि कथित छेड़छाड़ की घटना अदालत में साबित नहीं हो सकी और अभियोजन पक्ष हमले के पीछे का मकसद सिद्ध करने में विफल रहा। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटना अचानक हुए विवाद और उकसावे का परिणाम थी, इसलिए इसे पूर्वनियोजित हत्या नहीं माना जाना चाहिए।
इसके विपरीत, विशेष सरकारी वकील आबाद पोंडा ने अदालत को बताया कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, फॉरेंसिक साक्ष्य और अन्य सबूत स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि हमला गंभीर और जानलेवा था। उन्होंने कहा कि आरोपियों में से एक विवाद के बाद जान से मारने की धमकी देकर वहाँ से गया और बाद में हथियार लेकर लौटा। अभियोजन पक्ष के अनुसार, कीनन के शरीर पर धारदार हथियार से किए गए कई गंभीर घाव पाए गए थे और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उसकी मृत्यु हुई।
आम जनता पर असर और सामाजिक महत्व
गौरतलब है कि वर्ष 2011 में यह मामला सामने आने के बाद पूरे देश में सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा और छेड़छाड़ के विरुद्ध साहसपूर्ण प्रतिरोध की व्यापक चर्चा हुई थी। कीनन और रूबेन के नाम उन युवाओं के प्रतीक बन गए थे, जिन्होंने असहाय महिलाओं की रक्षा के लिए अपनी जान गँवाई। यह ऐसे समय में आया है जब सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया की गति को लेकर बहस जारी है।
आगे क्या
फैसले के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जितेंद्र राणा सर्वोच्च न्यायालय में अपील करता है या नहीं। बरी किए गए आरोपियों की अन्य सजाओं के संदर्भ में भी आगे की कानूनी कार्यवाही की संभावना बनी हुई है। यह फैसला यह भी रेखांकित करता है कि सह-आरोपियों के मामले में साक्ष्यों की गुणवत्ता निर्धारक भूमिका निभाती है।