संजीव कुमार: 'शोले' में गब्बर बनने की चाहत, रमेश सिप्पी के सामने बिखेरे बाल और काले किए थे दांत
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता संजीव कुमार की पुण्यतिथि पर आज उनकी यादें ताज़ा हो रही हैं। 6 नवंबर 1985 को महज 47 साल की उम्र में दुनिया छोड़ जाने वाले इस दिग्गज कलाकार के बारे में एक दिलचस्प किस्सा आज भी फिल्म-प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बना रहता है — वह 1975 की महाकाव्य फिल्म 'शोले' में ठाकुर बलदेव सिंह नहीं, बल्कि खूंखार डाकू गब्बर सिंह का किरदार निभाना चाहते थे।
गब्बर बनने की जिद और अनोखी तैयारी
निर्देशक रमेश सिप्पी के अनुसार, जब संजीव कुमार से गब्बर सिंह के किरदार को लेकर बातचीत हुई, तो उन्होंने अपने बाल बिखेर लिए, दांतों पर काला रंग लगा लिया और गब्बर के अंदाज़ में हाव-भाव दिखाने लगे। बताया जाता है कि उन्होंने सिर मुंडवाने तक की पेशकश की थी। यह दिखाता है कि संजीव कुमार किसी भी किरदार में पूरी तरह डूब जाने के लिए कितने समर्पित थे।
हालांकि, 'शोले' की निर्माण टीम का मानना था कि संजीव कुमार पहले से ऐसे किरदार निभाते आए हैं जिनके प्रति दर्शकों के मन में सहानुभूति होती है। गब्बर को एक ऐसे खलनायक के रूप में गढ़ना था जिससे दर्शक नफरत और भय महसूस करें — इसलिए यह भूमिका उन्हें नहीं दी गई। अंततः गब्बर सिंह का यादगार किरदार अमजद खान को मिला, और इतिहास ने बाकी कहानी खुद लिख दी।
ठाकुर बनकर भी जीत लिया दर्शकों का दिल
संजीव कुमार को ठाकुर बलदेव सिंह का किरदार दिया गया — एक ऐसा सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी जिसकी भुजाएं काट दी गई हों और जिसके भीतर बदले की आग धधकती हो। उन्होंने इस भूमिका को इतने गहरे दर्द और संयम के साथ निभाया कि दशकों बाद भी वे 'ठाकुर' के नाम से पहचाने जाते हैं। यह किरदार प्रमाण है कि उनकी अभिनय प्रतिभा किसी भी भूमिका को अमर कर सकती थी।
प्रारंभिक जीवन और थिएटर से शुरुआत
संजीव कुमार का जन्म 9 जुलाई 1938 को गुजरात के सूरत में हुआ था। उनका असली नाम हरिहर जेठालाल जरीवाला था। बचपन में ही परिवार मुंबई आ गया। फिल्मों और मंच-अभिनय की ओर रुझान ने उन्हें इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) और बाद में इंडियन नेशनल थिएटर से जोड़ा, जहाँ उन्होंने अभिनय की बारीकियाँ सीखीं। महज 22 साल की उम्र में उन्होंने नाटक 'ऑल माई सन्स' में एक बुजुर्ग का किरदार निभाया — यह उनकी उम्र से परे परिपक्वता का पहला संकेत था।
फिल्मों में उनकी शुरुआत 1960 में 'हम हिंदुस्तानी' से एक छोटी भूमिका से हुई। 1964 में 'निशान' में उन्हें पहली बार मुख्य भूमिका मिली।
राष्ट्रीय पुरस्कार और यादगार फिल्में
1970 में 'खिलौना' से उन्हें व्यापक पहचान मिली। फिल्म 'दस्तक' में एक पीड़ित पति की भूमिका के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1972 में 'कोशिश' में उन्होंने मूक-बधिर व्यक्ति हरिचरण का किरदार बिना एक भी संवाद बोले केवल चेहरे और इशारों से जीवंत किया — इस असाधारण प्रदर्शन के लिए उन्हें दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
इसके अलावा उन्होंने 'आंधी', 'मौसम', 'अनामिका', 'अंगूर' (जिसमें उन्होंने डबल रोल किया), 'नमकीन', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'त्रिशूल', 'पति पत्नी और वो' और 'आपकी कसम' जैसी विविध फिल्मों में काम किया। रोमांटिक, कॉमेडी, गंभीर और पारिवारिक — हर रंग को उन्होंने समान सहजता से निभाया।
विरासत जो आज भी जीवित है
6 नवंबर 1985 को दिल का दौरा पड़ने से उनका असमय निधन हो गया। उनके जाने के बाद भी उनकी कई फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज़ हुईं। दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार उनके विविध और गहरे अभिनय की स्थायी स्वीकृति हैं। गौरतलब है कि जिस 'शोले' में वे गब्बर बनना चाहते थे, उसी फिल्म में ठाकुर की भूमिका ने उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया।