5 नवंबर 2026
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उमर खालिद और शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की एसएलपी, दिल्ली HC के जमानत-अस्वीकृति आदेश को दी चुनौती

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उमर खालिद और शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की एसएलपी, दिल्ली HC के जमानत-अस्वीकृति आदेश को दी चुनौती

सारांश

2020 दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश में यूएपीए के तहत वर्षों से जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम ने दिल्ली हाईकोर्ट के जमानत-अस्वीकृति आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। उनकी एसएलपी फिलहाल 'डिफेक्ट लिस्ट' में है, जबकि यूएपीए में लंबी हिरासत को जमानत का आधार मानने का सवाल बड़ी पीठ के पास विचाराधीन है।

मुख्य बातें

उमर खालिद (डायरी नं.
70020/2026 ) और शरजील इमाम (डायरी नं.
70106/2026 ) ने 4 नवंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में अलग-अलग एसएलपी दाखिल कीं।
दोनों ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 30 सितंबर 2026 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें नई जमानत अपीलें खारिज की गई थीं।
हाईकोर्ट ने माना था कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 5 जनवरी 2026 को तय की गई विशेष शर्तों में कोई अधीनस्थ अदालत बदलाव नहीं कर सकती।
यह मामला फरवरी 2020 की उत्तर-पूर्वी दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा — जिसमें 53 लोगों की मौत हुई — की कथित साजिश से जुड़ा है।
सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ यूएपीए धारा 43डी(5) के तहत लंबी हिरासत को जमानत का आधार मानने के सवाल की अलग से सुनवाई कर रही है।
दोनों याचिकाएँ अभी 90 दिनों के लिए 'केस अंडर डिफेक्ट लिस्ट' में हैं।

दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े यूएपीए मामले में वर्षों से न्यायिक हिरासत में बंद छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम ने 4 नवंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में अलग-अलग विशेष अनुमति याचिकाएँ (एसएलपी) दाखिल की हैं। ये याचिकाएँ दिल्ली उच्च न्यायालय के 30 सितंबर 2026 के उस साझा आदेश को चुनौती देती हैं, जिसमें दोनों की नई नियमित जमानत अपीलें खारिज कर दी गई थीं।

याचिकाओं का ब्यौरा

सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उमर खालिद की याचिका डायरी नंबर 70020/2026 और शरजील इमाम की याचिका डायरी नंबर 70106/2026 के तहत दर्ज है। फिलहाल दोनों याचिकाएँ 90 दिनों के लिए 'केस अंडर डिफेक्ट लिस्ट' में दिखाई जा रही हैं।

खालिद की ओर से अधिवक्ता एन. साई विनोद और इमाम की ओर से अधिवक्ता फौजिया शकील ने याचिकाएँ दाखिल की हैं। दोनों याचिकाएँ ट्रायल कोर्ट के 4 जुलाई 2026 के उन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती देने के बाद की अगली कड़ी हैं, जिनमें नियमित जमानत देने से इनकार किया गया था।

दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख और तर्क

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि 5 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने पिछली जमानत याचिकाएँ खारिज करते हुए जो विशेष शर्तें तय की थीं, उनमें कोई भी अधीनस्थ अदालत बदलाव नहीं कर सकती। उच्च न्यायालय ने कहा कि शीर्ष अदालत के पहले के फैसले में खालिद और इमाम की कथित भूमिका को साजिश का 'मास्टरमाइंड' और 'मुख्य साजिशकर्ता' बताया गया था, इसलिए उन्हें जमानत पा चुके सह-आरोपियों के बराबर नहीं रखा जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा जानबूझकर मुकदमे में देरी का कोई आरोप नहीं लगाया गया। जो भी देरी हुई, वह सह-आरोपियों की ओर से शुरू की गई कार्यवाहियों और पक्षकारों के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण बताई गई।

आवेदकों की दलीलें

दोनों ने जून 2026 में ट्रायल कोर्ट में नई जमानत याचिका दाखिल करते समय कई नई परिस्थितियों का हवाला दिया था। इनमें एक अन्य यूएपीए मामले में लंबी हिरासत और मुकदमे में देरी पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ, सह-आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को मिली अंतरिम जमानत, तथा हिरासत की अवधि और बढ़ने का उल्लेख था।

दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष उनकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि मुकदमे का जल्द पूरा होना संभव नहीं दिखता और ठोस प्रगति के बिना निरंतर हिरासत, जमानत पर पुनर्विचार का उचित आधार है। हाईकोर्ट ने, हालाँकि, यह दलील भी नहीं मानी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा की कथित बड़ी साजिश से जुड़ा है, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे। उमर खालिद, शरजील इमाम समेत अनेक आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, यूएपीए, और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा है।

गौरतलब है कि 5 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले के पाँच सह-आरोपियों — गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद — को जमानत दे दी थी, जबकि खालिद और इमाम को राहत नहीं मिली थी। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सह-आरोपी तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम जमानत दी थी और यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत लंबी हिरासत को जमानत का आधार माने जाने के सवाल को बड़ी पीठ के पास भेजा था।

आगे क्या होगा

दोनों याचिकाएँ अभी 'डिफेक्ट लिस्ट' में हैं, जिसका अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री द्वारा तकनीकी कमियाँ दूर होने के बाद ही इन्हें सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। बड़ी पीठ का फैसला — कि क्या यूएपीए के तहत लंबी हिरासत जमानत का आधार बन सकती है — इस मामले पर भी व्यापक असर डाल सकता है। यह मामला भारत में यूएपीए के उपयोग और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमाओं पर चल रही बहस का केंद्रबिंदु बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन कथित 'मास्टरमाइंड' वर्षों तक हिरासत में रहते हैं। विडंबना यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने खुद बड़ी पीठ को यह सवाल सौंपा है कि लंबी हिरासत और मुकदमे में देरी जमानत का आधार बन सकती है या नहीं — यानी जिस सिद्धांत की आड़ में राहत रोकी जा रही है, उसी की संवैधानिक वैधता अभी तय नहीं है। यह मामला यूएपीए के तहत 'कठोर' जमानत प्रावधानों और संविधान के अनुच्छेद 21 के बीच तनाव को उजागर करता है, जिस पर न्यायिक स्पष्टता अभी भी बाकी है।
RashtraPress
5 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उमर खालिद और शरजील इमाम ने सुप्रीम कोर्ट में कौन-सी याचिका दाखिल की है?
दोनों ने 4 नवंबर 2026 को अलग-अलग विशेष अनुमति याचिकाएँ (एसएलपी) दाखिल की हैं, जो दिल्ली उच्च न्यायालय के 30 सितंबर 2026 के उस आदेश को चुनौती देती हैं जिसमें उनकी नई जमानत अपीलें खारिज की गई थीं। खालिद की याचिका डायरी नंबर 70020/2026 और इमाम की 70106/2026 के तहत दर्ज है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाएँ क्यों खारिज कीं?
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जनवरी 2026 को पिछली जमानत अर्जियाँ खारिज करते हुए जो विशेष शर्तें और सीमाएँ तय की थीं, उनमें कोई अधीनस्थ अदालत बदलाव नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि शीर्ष अदालत ने खालिद और इमाम की कथित भूमिका को साजिश का 'मास्टरमाइंड' बताया था, जो जमानत पाने वाले सह-आरोपियों से अलग है।
2020 दिल्ली दंगा साजिश मामला क्या है?
यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा — जिसमें 53 लोगों की मौत हुई — की कथित पूर्व-नियोजित साजिश से संबंधित है। उमर खालिद, शरजील इमाम समेत कई आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम ( यूएपीए ) सहित अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा है।
इसी मामले में अन्य सह-आरोपियों को जमानत क्यों मिल गई?
सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जनवरी 2026 को पाँच सह-आरोपियों — गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद — को जमानत दी थी। हाईकोर्ट के अनुसार शीर्ष अदालत ने खालिद और इमाम की कथित भूमिका को 'मुख्य साजिशकर्ता' के रूप में अलग श्रेणी में रखा था, इसलिए उनके मामले समान नहीं माने जा सकते।
इन याचिकाओं पर सुनवाई कब होगी?
दोनों याचिकाएँ अभी 90 दिनों के लिए 'केस अंडर डिफेक्ट लिस्ट' में हैं। सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री द्वारा तकनीकी कमियाँ दूर होने के बाद ही इन्हें सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, यूएपीए धारा 43डी(5) के तहत लंबी हिरासत और जमानत के सवाल पर बड़ी पीठ का फैसला भी इस मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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