चिली के बहाई मंदिर ने मनाई 10वीं वर्षगांठ, भारतीय राजदूत अभिलाषा जोशी हुईं शामिल
सारांश
मुख्य बातें
चिली की राजधानी सैंटियागो के पेनालोलेन में स्थित बहाई हाउस ऑफ वर्शिप ने 27 अक्टूबर 2026 को अपनी 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में भव्य आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन किया। चिली में भारत की राजदूत अभिलाषा जोशी इस समारोह में विशेष रूप से उपस्थित रहीं, जो शांति, समावेशिता और साझा मानवता के संदेश को समर्पित था।
वर्षगांठ समारोह का स्वरूप
एंडीज पर्वत की तलहटी में बसे इस मंदिर परिसर में प्रार्थना सभाएँ, प्रेरणादायक गायन प्रस्तुतियाँ और स्थानीय युवा ऑर्केस्ट्रा के साथ सामुदायिक सभाओं का आयोजन हुआ। समारोह की एक विशेष झलक मंदिर के वास्तुकार सियामक हरीरी के विचारों की प्रस्तुति रही, जिन्होंने इस अनूठी संरचना की परिकल्पना को साझा किया।
भारतीय दूतावास ने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा, 'एंडीज पर्वत की तलहटी में बसा यह शानदार वास्तुशिल्प स्थल और भी अधिक चमकता हुआ प्रतीत हो रहा था, क्योंकि इसने प्रार्थना, चिंतन और सामुदायिक एकता के लिए एक खुले आश्रय स्थल के रूप में अपनी सेवा के पूरे 10 साल पूरे कर लिए हैं।'
मंदिर की वास्तुकला और विशिष्टता
कनाडाई वास्तुकार सियामक हरिरी द्वारा अभिकल्पित यह मंदिर काँच और संगमरमर से निर्मित है और नौ मुड़े हुए पंखुड़ीनुमा गुंबद की आकृति में बना है। यह दक्षिण अमेरिका का बहाई उपासना मंदिर है, जिसका उद्घाटन अक्टूबर 2016 में हुआ था। उल्लेखनीय है कि यह दुनिया के 8 महाद्वीपीय बहाई मंदिरों में से सबसे अंतिम निर्मित है।
बहाई धर्म की पृष्ठभूमि
बहाई धर्म 19वीं शताब्दी में ईरान (फारस) में उद्भूत एक स्वतंत्र, एकेश्वरवादी विश्व धर्म है। बहाई धर्म की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इस धर्म की नींव बहाउल्लाह ने रखी थी। यह धर्म समस्त मानवजाति की एकता और सार्वभौमिक शांति पर बल देता है।
शांति और समावेशिता का संदेश
दूतावास ने जानकारी देते हुए कहा कि यह वर्षगांठ केवल एक भवन के दशक पूरे होने का जश्न नहीं थी, बल्कि इसने उस स्थान की निरंतर भूमिका को भी रेखांकित किया जो 'सभी लोगों के लिए है।' गौरतलब है कि यह मंदिर विभिन्न धर्मों और पृष्ठभूमियों के लोगों के लिए प्रार्थना और चिंतन हेतु खुला रहता है।
यह आयोजन ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब विश्व के कई भागों में सांप्रदायिक तनाव के बीच साझा मानवीय मूल्यों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आने वाले वर्षों में यह मंदिर अंतर-धार्मिक संवाद और सामुदायिक एकता का केंद्र बना रहेगा।