कोलकाता में बकरीद की नमाज पहली बार रेड रोड से हटकर ब्रिगेड परेड ग्राउंड में अदा हुई
सारांश
मुख्य बातें
कोलकाता में इस वर्ष ईद-उल-अजहा (बकरीद) की नमाज कई दशकों की परंपरा से हटकर रेड रोड के बजाय ब्रिगेड परेड ग्राउंड में अदा की गई। 28 मई को हुए इस बदलाव ने पश्चिम बंगाल की नई सरकार की नीति को व्यवहार में उतरते देखा, जिसके तहत सड़कों पर किसी भी धार्मिक आयोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस फैसले के चलते मध्य कोलकाता में पिछले वर्षों में होने वाली ट्रैफिक जाम की समस्या से भी इस बार राहत मिली।
दशकों पुरानी परंपरा में बड़ा बदलाव
रेड रोड पर ईद की नमाज की परंपरा लेफ्ट फ्रंट सरकार के दौर से चली आ रही थी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासनकाल में भी जारी रही। TMC सरकार में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हर वर्ष ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा दोनों अवसरों पर रेड रोड की सभाओं में शामिल होती थीं। इस आयोजन के दौरान मध्य कोलकाता में यातायात बाधित होना आम बात थी।
नई सरकार की नीति और सुवेंदु अधिकारी की घोषणा
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद सुवेंदु अधिकारी ने स्पष्ट किया था कि नई सरकार सड़कों पर किसी भी धार्मिक जमावड़े की अनुमति नहीं देगी, क्योंकि इससे यातायात बाधित होता है और आम जनता को असुविधा होती है। गुरुवार को बकरीद की नमाज का ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आयोजन इसी नीति का व्यावहारिक परिणाम था। शहर में कहीं भी खुली सड़कों पर नमाज का कोई आयोजन नहीं हुआ।
सेना की पूर्वी कमान की भूमिका
गौरतलब है कि पिछले वर्ष भी भारतीय सेना की पूर्वी कमान — जिसके पास रेड रोड का प्रशासनिक अधिकार है — ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए खिलाफत समिति से ईद की नमाज के लिए वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था करने को कहा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तब पूर्वी कमान के अधिकारियों को मनाने का प्रयास करने की बात कही थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में हार के बाद उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।
सुरक्षा के व्यापक इंतजाम
कोलकाता पुलिस ने पूरे शहर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए। ब्रिगेड परेड ग्राउंड और उसके आसपास के इलाकों के साथ-साथ मस्जिदों के निकटवर्ती क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। हवाई निगरानी के लिए ड्रोन का भी उपयोग किया गया।
आगे क्या
यह बदलाव पश्चिम बंगाल में सत्ता-परिवर्तन के बाद धार्मिक सार्वजनिक आयोजनों को लेकर नई प्रशासनिक सोच का संकेत है। आने वाले त्योहारों पर यह नीति किस रूप में लागू होती है, यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा।