क्या बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी की बढ़त के बावजूद चीन और पाकिस्तान जमात का समर्थन कर रहे हैं?
सारांश
Key Takeaways
- बीएनपी की जीत लगभग सुनिश्चित है।
- चीन और पाकिस्तान का जमात के साथ समर्थन जारी है।
- राजनीतिक अस्थिरता भारत के लिए चुनौती बन सकती है।
- जमात की सामाजिक प्रासंगिकता बनी रहेगी।
- यह घटनाक्रम भारत और बीएनपी के रिश्तों पर असर डाल सकता है।
नई दिल्ली, 13 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। बांग्लादेश में आम चुनाव अब केवल एक महीने दूर हैं और वर्तमान ओपिनियन पोल्स के अनुसार, तारीक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है। फिर भी, चीन और पाकिस्तान का झुकाव जमात-ए-इस्लामी की ओर बना हुआ है, जिससे क्षेत्रीय राजनीति में कई प्रश्न उठ रहे हैं।
चीन और पाकिस्तान दोनों यह जानते हैं कि चुनाव में बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है, जबकि जमात-ए-इस्लामी दूसरे स्थान पर रहकर विपक्ष की भूमिका अदा करेगी। इसके बावजूद, दोनों देश जमात के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखे हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और पाकिस्तान जमात को भारत के प्रभाव के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संतुलन शक्ति के रूप में देखते हैं।
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तानी अधिकारी विभिन्न स्तरों पर जमात के नेताओं के संपर्क में हैं। इसी बीच, भारतीय एजेंसियां उस बैठक पर ध्यान दे रही हैं जिसमें बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन ने जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान से मुलाकात की थी।
बांग्लादेश के मामलों के जानकार कहते हैं कि चीन यह भली-भांति समझता है कि सत्ता में न आने के बावजूद जमात की राजनीतिक और सामाजिक प्रासंगिकता बनी रहेगी। पार्टी के पास एक मजबूत कैडर, व्यापक संगठनात्मक ढांचा और कई संस्थानों में प्रभाव है। जमात में सड़कों पर बड़ी संख्या में लोगों को उतारने की क्षमता है, जिसका इस्तेमाल भारत के हितों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भारत बीएनपी नेतृत्व के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। हाल ही में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बीएनपी के संस्थापक खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भाग लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शोक संदेश भेजा था। अधिकारियों का मानना है कि भारत और बीएनपी के बीच रिश्तों में संभावित सुधार चीन और पाकिस्तान को पसंद नहीं आ रहा।
सूत्रों के अनुसार, दोनों देश चुनाव के बाद भी जमात के माध्यम से विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देने की योजना बना सकते हैं। भारत के लिए एक अस्थिर बांग्लादेश गंभीर चुनौती बन सकता है, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा की दृष्टि से। इससे घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों का खतरा बढ़ सकता है, जिससे सुरक्षा एजेंसियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
खुफिया एजेंसियों का मानना है कि जब भी भारत बांग्लादेश में निवेश करेगा या द्विपक्षीय संबंधों में सुधार करने की कोशिश करेगा, तब जमात को अशांति फैलाने के लिए आगे किया जा सकता है। जमात का छात्र संगठनों पर प्रभाव और सेना एवं पुलिस में उसके समर्थकों की उपस्थिति, भारतविरोधी ताकतों के लिए सहायक सिद्ध हो सकती है।
चीन और पाकिस्तान दोनों ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के अंतर्गत बांग्लादेश में बड़े निवेश किए हैं। ऐसे में बीजिंग चाहता है कि किसी भी प्रकार की हिंसा उसके आर्थिक हितों को नुकसान न पहुंचाए। सूत्रों के अनुसार, जमात ने आश्वासन दिया है कि संभावित हिंसा उनके निवेशों को प्रभावित नहीं करेगी।
अधिकारियों का कहना है कि जमात उन सभी ताकतों के साथ खड़ा रहने को तैयार है जो भारत के हितों के खिलाफ काम करती हैं। जमात नेतृत्व से मुलाकात कर चीन और पाकिस्तान बीएनपी को यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि उन्होंने उनकी नीतियों से भटकने की कोशिश की, तो देश में अस्थिरता पैदा हो सकती है।
एक अधिकारी का कहना है कि मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में भारतबांग्लादेश संबंध पहले ही काफी कमजोर हुए हैं और चीन और पाकिस्तान चाहते हैं कि चुनावों के बाद भी यह स्थिति बनी रहे।