बेंगलुरु स्पेशल कोर्ट का PMLA में बड़ा फैसला: पूर्व आबकारी SI एम. रामचंद्र और बेटी दोषी, 5 संपत्तियाँ जब्त
सारांश
मुख्य बातें
बेंगलुरु की स्पेशल पीएमएलए कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को मनी लॉन्ड्रिंग के एक हाई-प्रोफाइल मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। 47वें अतिरिक्त सिटी सिविल एवं सेशन जज तथा सीबीआई मामलों के विशेष न्यायाधीश की अदालत ने पूर्व आबकारी प्रभारी सब-इंस्पेक्टर एम. रामचंद्र और उनकी बेटी आर. युरेखा को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 3 और 4 के तहत दोषी पाया। कोर्ट ने दोनों को सजा सुनाने के साथ-साथ 5 अचल संपत्तियाँ केंद्र सरकार के पक्ष में जब्त करने का आदेश दिया।
मुख्य घटनाक्रम
मामले की जड़ 7 जुलाई 2009 को कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज उस एफआईआर में है, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ई) के अंतर्गत दर्ज की गई थी। लोकायुक्त की चार्जशीट में 1 जुलाई 1977 से 8 जुलाई 2009 तक की अवधि को जाँच के दायरे में रखा गया था। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) की बेंगलुरु जोनल ऑफिस ने 26 अक्टूबर 2009 को एन्फोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ECIR) दर्ज की।
ईडी ने 23 मार्च 2016 को कुल ₹1,09,39,539 मूल्य की 8 संपत्तियाँ अस्थायी रूप से कुर्क कीं और जून 2016 में अभियोजन शिकायत दाखिल की। मूल भ्रष्टाचार मामले में ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि एम. रामचंद्र के पास उनकी आय से ₹42,48,188.50 यानी 97.75 प्रतिशत अधिक संपत्ति थी।
सजा का विवरण
कोर्ट ने एम. रामचंद्र (आरोपी संख्या 1) को 5 साल की कठोर कैद और ₹5 लाख का जुर्माना सुनाया। जुर्माना न चुकाने की स्थिति में उन्हें अतिरिक्त 2 साल की साधारण कैद भुगतनी होगी। उनकी बेटी आर. युरेखा (आरोपी संख्या 2) को 3 साल की कठोर कैद और ₹3 लाख जुर्माना दिया गया, तथा जुर्माना न भरने पर 1 साल की साधारण कैद का प्रावधान रखा गया।
सजा तय करते हुए कोर्ट ने एम. रामचंद्र की आयु (लगभग 72 वर्ष) और आर. युरेखा की पारिवारिक परिस्थितियों को भी संज्ञान में लिया — जो दर्शाता है कि अदालत ने दंड में संतुलन बनाए रखा।
कोर्ट की कानूनी टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PMLA की धारा 24 के तहत उपधारणा (Presumption) लागू होती है, जिसे आरोपी खारिज करने में नाकाम रहे। आर. युरेखा का यह तर्क — कि विजयनगर में निर्माण का खर्च उनकी माँ ने दिया और 'शारदा' ने साइटें खरीदीं — दस्तावेज़ों से सिद्ध नहीं हो सका।
कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ मामले के फैसले का हवाला देते हुए यह भी रेखांकित किया कि मनी लॉन्ड्रिंग एक 'निरंतर चलने वाला अपराध' है — जब तक अपराध की आय रखी जाती है या उसे वैध बताकर पेश किया जाता है, तब तक अपराध जारी माना जाएगा। इसलिए PMLA के लागू होने से पूर्व के कार्य भी आरोप को निष्प्रभावी नहीं करते।
ईडी की कार्रवाई का महत्त्व
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ED की बेंगलुरु जोनल ऑफिस सफेदपोश अपराधों पर अपना शिकंजा तेज़ कर रही है। कोर्ट ने इस मामले को 'गहरे सामाजिक प्रभाव वाला आर्थिक अपराध' करार दिया और कहा कि यह पूरे समाज के विरुद्ध है। गौरतलब है कि आय से अधिक संपत्ति के मामलों में PMLA की यह व्याख्या — कि 'सम्पूर्ण अतिरिक्त संपत्ति ही अपराध की आय है' — आगामी मामलों में एक मज़बूत मिसाल बन सकती है।