सुप्रीम कोर्ट का जाली आदेश दिखाकर 8 साल पहले जेल से फरार हुआ आजीवन कारावास का कैदी, बेंगलुरु में FIR दर्ज
सारांश
मुख्य बातें
बेंगलुरु की परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल से जुड़ा एक चौंकाने वाला धोखाधड़ी मामला सामने आया है, जिसमें आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी शंकर अरमुगम ने कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय का जाली आदेश पेश करके 13 नवंबर 2018 को जेल से रिहाई हासिल कर ली। यह मामला करीब आठ साल बाद तब उजागर हुआ, जब जेल महानिदेशक के कार्यालय में एक गुमनाम शिकायत पत्र प्राप्त हुआ। परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में अब जालसाजी, नकली दस्तावेज बनाने और इस्तेमाल करने तथा धोखाधड़ी से संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज कर ली गई है।
मुख्य घटनाक्रम
शंकर अरमुगम को बेंगलुरु की फास्ट ट्रैक कोर्ट-I ने 2001 के फिरौती के लिए अपहरण के मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364A (फिरौती के लिए अपहरण) और धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने निर्देश दिया था कि दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी।
13 नवंबर 2018 को अरमुगम ने जेल अधिकारियों के समक्ष कुछ दस्तावेज पेश किए, जिनमें कथित तौर पर दर्शाया गया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने उसे राहत दे दी है। अधिकारियों ने कथित तौर पर उन दस्तावेजों की जाँच की और आदेश में उल्लिखित ₹10,000 का जुर्माना जमा कराने के बाद उसे रिहा कर दिया।
मामला कैसे उजागर हुआ
यह धोखाधड़ी करीब आठ साल तक पकड़ में नहीं आई। हाल ही में जेल महानिदेशक के कार्यालय को एक गुमनाम पत्र मिला, जिसमें आरोप लगाया गया कि शंकर ने सर्वोच्च न्यायालय का जाली आदेश पेश कर धोखाधड़ी से रिहाई प्राप्त की थी। इस शिकायत के आधार पर जेल विभाग ने आंतरिक जाँच शुरू की।
जाँच के दौरान अधिकारियों ने दस्तावेजों के सत्यापन के लिए नई दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय के सहायक रजिस्ट्रार के कार्यालय से संपर्क किया। वहाँ से पुष्टि हुई कि अरमुगम द्वारा पेश किया गया आदेश कथित तौर पर जाली था और उसका सर्वोच्च न्यायालय से आधिकारिक तौर पर कोई संबंध नहीं था।
जेल विभाग की प्रतिक्रिया
जेल विभाग के डीजीपी आलोक कुमार ने कहा, "परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी शंकर अरुमुगम द्वारा धोखाधड़ी और दस्तावेजों में हेराफेरी के मामले में एक FIR दर्ज की गई है।" उन्होंने आगे स्पष्ट किया, "यह FIR लगभग आठ साल बाद दर्ज की गई है, जो मेरे दफ्तर में मिले एक गुमनाम पत्र पर आधारित है। डीआईजी (दक्षिण) द्वारा की गई जाँच की रिपोर्ट के आधार पर ही यह FIR दर्ज की गई है।"
प्रक्रियागत चूक पर सवाल
यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है — नकली कानूनी दस्तावेज बिना पकड़े जेल की सरकारी प्रक्रिया से कैसे गुजर गए? क्या जेल तंत्र के भीतर किसी ने इस धोखाधड़ी में सक्रिय भूमिका निभाई या जानबूझकर लापरवाही बरती? गौरतलब है कि यह ऐसे समय में उजागर हुआ है जब देशभर में जेल प्रशासन की जवाबदेही पर बहस तेज हो रही है।
आगे की जाँच
अधिकारियों के अनुसार, शंकर अरमुगम का पता लगाने और उसे दोबारा गिरफ्तार करने के प्रयास फिलहाल जारी हैं। जाँचकर्ता उन लोगों की संभावित संलिप्तता की भी पड़ताल कर रहे हैं, जिन्होंने जाली दस्तावेज तैयार करने और जेल से अवैध रिहाई में मदद की हो सकती है। इस पूरे प्रकरण में जेल विभाग के भीतर मिलीभगत की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा।