9 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

सुप्रीम कोर्ट का जाली आदेश दिखाकर 8 साल पहले जेल से फरार हुआ आजीवन कारावास का कैदी, बेंगलुरु में FIR दर्ज

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
सुप्रीम कोर्ट का जाली आदेश दिखाकर 8 साल पहले जेल से फरार हुआ आजीवन कारावास का कैदी, बेंगलुरु में FIR दर्ज

सारांश

आजीवन कारावास का कैदी शंकर अरमुगम कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय का जाली आदेश और ₹10,000 का जुर्माना चुकाकर 2018 में बेंगलुरु जेल से फरार हो गया। आठ साल बाद एक गुमनाम शिकायत ने इस धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया — और अब जेल तंत्र के भीतर मिलीभगत की जाँच शुरू हो गई है।

मुख्य बातें

शंकर अरमुगम , जो 2001 के अपहरण-फिरौती मामले में आजीवन कारावास काट रहा था, कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय का जाली आदेश पेश कर 13 नवंबर 2018 को परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल से रिहा हो गया।
रिहाई के समय उसने कथित जाली आदेश में उल्लिखित ₹10,000 का जुर्माना भी जमा किया था।
सर्वोच्च न्यायालय के सहायक रजिस्ट्रार के कार्यालय ने पुष्टि की कि पेश किया गया आदेश जाली था और न्यायालय के आधिकारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता।
मामला आठ साल बाद जेल महानिदेशक को मिले एक गुमनाम पत्र के बाद उजागर हुआ।
परप्पना अग्रहारा पुलिस ने जालसाजी, नकली दस्तावेज बनाने-इस्तेमाल करने और धोखाधड़ी की धाराओं के तहत FIR दर्ज की है; आरोपी अभी भी फरार है।

बेंगलुरु की परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल से जुड़ा एक चौंकाने वाला धोखाधड़ी मामला सामने आया है, जिसमें आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी शंकर अरमुगम ने कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय का जाली आदेश पेश करके 13 नवंबर 2018 को जेल से रिहाई हासिल कर ली। यह मामला करीब आठ साल बाद तब उजागर हुआ, जब जेल महानिदेशक के कार्यालय में एक गुमनाम शिकायत पत्र प्राप्त हुआ। परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में अब जालसाजी, नकली दस्तावेज बनाने और इस्तेमाल करने तथा धोखाधड़ी से संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज कर ली गई है।

मुख्य घटनाक्रम

शंकर अरमुगम को बेंगलुरु की फास्ट ट्रैक कोर्ट-I ने 2001 के फिरौती के लिए अपहरण के मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364A (फिरौती के लिए अपहरण) और धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने निर्देश दिया था कि दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी।

13 नवंबर 2018 को अरमुगम ने जेल अधिकारियों के समक्ष कुछ दस्तावेज पेश किए, जिनमें कथित तौर पर दर्शाया गया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने उसे राहत दे दी है। अधिकारियों ने कथित तौर पर उन दस्तावेजों की जाँच की और आदेश में उल्लिखित ₹10,000 का जुर्माना जमा कराने के बाद उसे रिहा कर दिया।

मामला कैसे उजागर हुआ

यह धोखाधड़ी करीब आठ साल तक पकड़ में नहीं आई। हाल ही में जेल महानिदेशक के कार्यालय को एक गुमनाम पत्र मिला, जिसमें आरोप लगाया गया कि शंकर ने सर्वोच्च न्यायालय का जाली आदेश पेश कर धोखाधड़ी से रिहाई प्राप्त की थी। इस शिकायत के आधार पर जेल विभाग ने आंतरिक जाँच शुरू की।

जाँच के दौरान अधिकारियों ने दस्तावेजों के सत्यापन के लिए नई दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय के सहायक रजिस्ट्रार के कार्यालय से संपर्क किया। वहाँ से पुष्टि हुई कि अरमुगम द्वारा पेश किया गया आदेश कथित तौर पर जाली था और उसका सर्वोच्च न्यायालय से आधिकारिक तौर पर कोई संबंध नहीं था।

जेल विभाग की प्रतिक्रिया

जेल विभाग के डीजीपी आलोक कुमार ने कहा, "परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी शंकर अरुमुगम द्वारा धोखाधड़ी और दस्तावेजों में हेराफेरी के मामले में एक FIR दर्ज की गई है।" उन्होंने आगे स्पष्ट किया, "यह FIR लगभग आठ साल बाद दर्ज की गई है, जो मेरे दफ्तर में मिले एक गुमनाम पत्र पर आधारित है। डीआईजी (दक्षिण) द्वारा की गई जाँच की रिपोर्ट के आधार पर ही यह FIR दर्ज की गई है।"

प्रक्रियागत चूक पर सवाल

यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है — नकली कानूनी दस्तावेज बिना पकड़े जेल की सरकारी प्रक्रिया से कैसे गुजर गए? क्या जेल तंत्र के भीतर किसी ने इस धोखाधड़ी में सक्रिय भूमिका निभाई या जानबूझकर लापरवाही बरती? गौरतलब है कि यह ऐसे समय में उजागर हुआ है जब देशभर में जेल प्रशासन की जवाबदेही पर बहस तेज हो रही है।

आगे की जाँच

अधिकारियों के अनुसार, शंकर अरमुगम का पता लगाने और उसे दोबारा गिरफ्तार करने के प्रयास फिलहाल जारी हैं। जाँचकर्ता उन लोगों की संभावित संलिप्तता की भी पड़ताल कर रहे हैं, जिन्होंने जाली दस्तावेज तैयार करने और जेल से अवैध रिहाई में मदद की हो सकती है। इस पूरे प्रकरण में जेल विभाग के भीतर मिलीभगत की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह घटना उन कमज़ोरियों की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगी जिन्हें 'प्रक्रियागत सुधार' के वादों से ढक दिया जाता है।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शंकर अरमुगम कौन है और उसे किस मामले में सज़ा हुई थी?
शंकर अरमुगम को बेंगलुरु की फास्ट ट्रैक कोर्ट-I ने 2001 के फिरौती के लिए अपहरण के मामले में IPC की धारा 364A और 120B के तहत आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। वह परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल में सज़ा काट रहा था।
कैदी ने जेल से रिहाई कैसे हासिल की?
13 नवंबर 2018 को शंकर अरमुगम ने जेल अधिकारियों के सामने कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय का जाली आदेश पेश किया, जिसमें दर्शाया गया था कि उसे राहत मिल गई है। अधिकारियों ने दस्तावेज की जाँच की और आदेश में उल्लिखित ₹10,000 का जुर्माना जमा होने के बाद उसे रिहा कर दिया।
यह धोखाधड़ी आठ साल बाद कैसे पकड़ में आई?
जेल महानिदेशक के कार्यालय को एक गुमनाम शिकायत पत्र मिला, जिसमें आरोप लगाया गया कि शंकर ने जाली दस्तावेजों से रिहाई ली थी। इसके बाद अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय के सहायक रजिस्ट्रार कार्यालय से संपर्क किया, जिसने पुष्टि की कि पेश किया गया आदेश जाली था।
इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है?
परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में जालसाजी, नकली दस्तावेज बनाने-इस्तेमाल करने और धोखाधड़ी की धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई है। जेल विभाग के DGP आलोक कुमार ने बताया कि DIG (दक्षिण) की जाँच रिपोर्ट के आधार पर यह FIR दर्ज की गई। आरोपी की तलाश जारी है।
क्या इस मामले में जेल कर्मियों की संलिप्तता की भी जाँच हो रही है?
जाँचकर्ता उन लोगों की संभावित संलिप्तता की भी पड़ताल कर रहे हैं जिन्होंने जाली दस्तावेज तैयार करने और अवैध रिहाई में मदद की हो सकती है। जेल विभाग के भीतर मिलीभगत, लापरवाही और प्रक्रियागत चूकों की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 3 महीने पहले
  5. 6 महीने पहले
  6. 8 महीने पहले
  7. 10 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले