इच्छाई घोषेर देउल: बंगाल का 7वीं सदी का भगवती मंदिर, जिसे ब्रिटिश काल में बना 'त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर'

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इच्छाई घोषेर देउल: बंगाल का 7वीं सदी का भगवती मंदिर, जिसे ब्रिटिश काल में बना 'त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर'

सारांश

दुर्गापुर के पास गौरांगपुर में खड़ा इच्छाई घोषेर देउल सिर्फ एक मंदिर नहीं — यह सदियों की परतों में लिपटा इतिहास है। भगवती को समर्पित यह रेखा-देउल शैली का टेराकोटा मंदिर ब्रिटिश काल में त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर बना, और आज ASI-संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक है।

Key Takeaways

इच्छाई घोषेर देउल , गौरांगपुर, दुर्गापुर के पास स्थित, देवी भगवती को समर्पित है और विद्वानों के अनुसार 7वीं से 11वीं शताब्दी के बीच निर्मित माना जाता है। मंदिर रेखा-देउल शैली में ईंटों से बना है और इसकी ऊँचाई लगभग 18 मीटर है; इसे 'ईंटा मंदिर' भी कहते हैं। दीवारें जटिल टेराकोटा पैनलों से सजी हैं जिनमें हिंदू और बौद्ध स्थापत्य शैली का अनूठा समन्वय है। ईस्ट इंडिया कंपनी के काल में इसे त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर के रूप में उपयोग किया गया, जिससे यह नाम प्रचलित हुआ। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है।

पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर के निकट गौरांगपुर में स्थित इच्छाई घोषेर देउल देवी भगवती को समर्पित एक दुर्लभ प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण विद्वानों के अनुसार 7वीं से 11वीं शताब्दी के बीच हुआ माना जाता है। अपनी अनूठी रेखा-देउल स्थापत्य शैली और टेराकोटा नक्काशी के लिए प्रसिद्ध यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और स्थापत्य कला की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान है।

मंदिर की स्थापत्य विशेषताएँ

इच्छाई घोषेर देउल को रेखा-देउल शैली में मुख्यतः ईंटों से निर्मित किया गया है, जिसके कारण इसे स्थानीय लोग 'ईंटा मंदिर' भी कहते हैं। मंदिर की ऊँचाई लगभग 18 मीटर है और इसका आधार लगभग 20 फीट चौड़ा है। गर्भगृह लगभग वर्गाकार है और उसमें खिड़कियाँ नहीं हैं।

मंदिर की दीवारें जटिल टेराकोटा पैनलों से सजी हैं, जिनमें पौराणिक दृश्य और आकृतियाँ उकेरी गई हैं। इसकी चिकनी और घुमावदार दीवारें इसे विशेष रूप से आकर्षक बनाती हैं। उल्लेखनीय है कि इस मंदिर में हिंदू और बौद्ध स्थापत्य शैली का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जो इसे क्षेत्र के अन्य मंदिरों से अलग करता है।

निर्माण काल और ऐतिहासिक विवाद

इतिहासकारों के बीच इस मंदिर के निर्माण काल को लेकर मतभेद है। अधिकांश विद्वान इसे 7वीं से 11वीं शताब्दी के बीच का मानते हैं, जबकि कुछ इतिहासकार इसे 16वीं से 18वीं शताब्दी का भी बताते हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसका निर्माण राजा चित्रसेन राय या रानी बिष्णुकुमारी ने करवाया होगा।

स्थानीय किंवदंती के अनुसार, इच्छाई घोष नामक व्यक्ति ने देवी भगवती के सम्मान में यह मंदिर बनवाया था और बाद में उनके वंशजों ने इसकी देखभाल की।

ब्रिटिश काल में 'त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर' की भूमिका

यह ऐसे समय में आया है जब प्राचीन भारतीय स्मारकों के बहुआयामी उपयोग पर शोध बढ़ रहा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में इस मंदिर को निगरानी मीनार और मानचित्रण टावर के रूप में उपयोग किया जाता था। इसी कारण स्थानीय लोग आज भी इसे 'त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर' के नाम से जानते हैं। यह संभवतः देश के उन विरले मंदिरों में से एक है जिन्हें औपनिवेशिक सर्वेक्षण के लिए भी प्रयुक्त किया गया।

संरक्षण और सांस्कृतिक महत्व

यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों में शामिल है। मंदिर के आसपास बहती नदी इसकी प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ाती है। त्योहारों और पर्वों के अवसर पर यहाँ जुलूस, अनुष्ठान, संगीत और नृत्य कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जो इस स्थल को सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध बनाते हैं।

गौरतलब है कि इच्छाई घोषेर देउल इतिहास प्रेमियों, पुरातत्वविदों और श्रद्धालुओं — तीनों के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र है। ASI के संरक्षण के बावजूद, इस मंदिर के व्यापक दस्तावेज़ीकरण और पर्यटन विकास की दिशा में अभी और प्रयासों की आवश्यकता है।

Point of View

बल्कि औपनिवेशिक शक्ति द्वारा भारतीय धरोहर के पुनर्उपयोग की भी है — एक ऐसा पहलू जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है। ASI-संरक्षित होने के बावजूद यह मंदिर व्यापक पर्यटन मानचित्र पर अब तक हाशिये पर है, जबकि इसकी हिंदू-बौद्ध मिश्रित स्थापत्य शैली और ब्रिटिश सर्वेक्षण इतिहास इसे शोध और पर्यटन दोनों के लिए असाधारण रूप से मूल्यवान बनाते हैं। निर्माण काल को लेकर इतिहासकारों के बीच जारी मतभेद भी दर्शाते हैं कि इस स्मारक का व्यवस्थित पुरातात्विक अध्ययन अभी अधूरा है।
NationPress
02/05/2026

Frequently Asked Questions

इच्छाई घोषेर देउल मंदिर कहाँ स्थित है?
यह मंदिर पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर के निकट गौरांगपुर में स्थित है। यह देवी भगवती को समर्पित है और ASI द्वारा राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित है।
इच्छाई घोषेर देउल को 'त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर' क्यों कहते हैं?
ब्रिटिश शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस मंदिर को निगरानी मीनार और मानचित्रण टावर के रूप में उपयोग किया था। इसी कारण स्थानीय लोग इसे 'त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण टावर' के नाम से जानते हैं।
इस मंदिर का निर्माण किसने और कब करवाया?
स्थानीय किंवदंती के अनुसार इच्छाई घोष नामक व्यक्ति ने देवी भगवती के सम्मान में यह मंदिर बनवाया था। विद्वान इसे 7वीं से 11वीं शताब्दी के बीच का मानते हैं, हालाँकि कुछ इतिहासकार इसे 16वीं-18वीं शताब्दी का भी बताते हैं; राजा चित्रसेन राय या रानी बिष्णुकुमारी के नाम भी लिए जाते हैं।
इच्छाई घोषेर देउल की स्थापत्य शैली क्या है?
यह मंदिर रेखा-देउल शैली में ईंटों से निर्मित है और इसकी दीवारें जटिल टेराकोटा पैनलों से सजी हैं। इसमें हिंदू और बौद्ध स्थापत्य शैली का दुर्लभ समन्वय देखने को मिलता है।
क्या इच्छाई घोषेर देउल ASI-संरक्षित स्मारक है?
हाँ, यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों में शामिल है। त्योहारों पर यहाँ धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं।
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