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भगवतीचरण वर्मा पुण्यतिथि: 'चित्रलेखा' से हिंदी साहित्य को नई दिशा देने वाले कालजयी उपन्यासकार

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भगवतीचरण वर्मा पुण्यतिथि: 'चित्रलेखा' से हिंदी साहित्य को नई दिशा देने वाले कालजयी उपन्यासकार

सारांश

वकालत की दहलीज़ छोड़कर कलम थामने वाले भगवतीचरण वर्मा ने 'चित्रलेखा' से हिंदी साहित्य को एक ऐसा दार्शनिक आख्यान दिया जो नौ दशक बाद भी उतना ही प्रासंगिक है। पद्म भूषण, साहित्य अकादमी और राज्यसभा सदस्यता — उनकी विरासत आज भी हिंदी के पाठकों को बेचैन और जिज्ञासु बनाती है।

मुख्य बातें

भगवतीचरण वर्मा का निधन 5 अक्टूबर 1981 को हुआ था; उनकी पुण्यतिथि पर हिंदी साहित्य जगत उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है।
जन्म 30 अगस्त 1903 को उन्नाव, उत्तर प्रदेश के शफीपुर (सफीपुर) में; पिता के निधन के बाद आर्थिक संघर्ष के बीच साहित्य-साधना जारी रखी।
1926 में इलाहाबाद से स्नातक और एलएलबी; 1928 में वकालत शुरू की पर मन न लगने पर साहित्य को समर्पित हो गए।
उपन्यास 'चित्रलेखा' उनकी सर्वाधिक चर्चित कृति; 'भूले-बिसरे चित्र' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया; राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।
बॉम्बे टॉकीज में पटकथा लेखन और आकाशवाणी लखनऊ व दिल्ली से दीर्घकालिक जुड़ाव रहा।

भगवतीचरण वर्मा की 5 अक्टूबर को पुण्यतिथि पर हिंदी साहित्य जगत उन्हें याद कर रहा है — वह कथाकार जिन्होंने वकालत छोड़कर कलम थामी और 'चित्रलेखा' जैसा कालजयी उपन्यास रचकर प्रेमचंद के बाद हिंदी उपन्यास को सर्वथा नया मोड़ दिया। 5 अक्टूबर 1981 को उनके निधन के चार दशक से अधिक समय बाद भी उनकी रचनाएँ पाठकों के बीच उतनी ही प्रासंगिक हैं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

भगवतीचरण वर्मा का जन्म 30 अगस्त 1903 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर (सफीपुर) कस्बे में एक बिखरते हुए जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता देवीचरण वर्मा पेशे से वकील थे, परंतु 1908 में प्लेग महामारी में उनके असामयिक निधन के बाद परिवार की आर्थिक नींव डगमगा गई। इस विपत्ति का सीधा प्रभाव वर्मा की शिक्षा पर पड़ा और उन्हें हाईस्कूल तथा इंटरमीडिएट दोनों परीक्षाएँ दूसरे प्रयास में उत्तीर्ण करनी पड़ीं।

यह ऐसे समय में आया जब कानपुर का साहित्यिक परिवेश उन्हें पहले ही अपनी ओर खींच चुका था। महज 15 वर्ष की आयु में वे कानपुर के साहित्यिक गुट में शामिल हो गए, जहाँ विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक' और बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जैसे दिग्गज लेखकों से उनका परिचय हुआ। स्कूल की हस्तलिखित पत्रिका में नियमित लेखन से शुरू हुआ सफर 'प्रताप' और 'शारदा' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं तक जा पहुँचा।

बाद में इलाहाबाद जाकर उन्होंने 1926 में हिंदी, अंग्रेजी और इतिहास विषयों से स्नातक की उपाधि ली और तत्पश्चात एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।

वकालत छोड़कर साहित्य की राह

1928 में वर्मा ने वकालत शुरू की, किंतु उनका मन इस पेशे में नहीं रमा। हमीरपुर में वकालत के दौरान भद्री के राजा बजरंग बहादुर सिंह से उनकी भेंट हुई, जो उनके जीवन की दिशा बदलने वाला क्षण साबित हुआ। इसी दौर में उन्होंने अपने सर्वाधिक चर्चित उपन्यास 'चित्रलेखा' पर काम आरंभ किया। 'चित्रलेखा' के प्रकाशन और उसकी अपार लोकप्रियता ने सिद्ध कर दिया कि कलम तलवार से भी धारदार हो सकती है। पाप और पुण्य की दार्शनिक व्याख्या करने वाला यह उपन्यास आज भी हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यासों में अग्रणी माना जाता है।

गौरतलब है कि वर्मा ने अपनी साहित्यिक यात्रा एक छायावादी कवि के रूप में शुरू की थी। उनकी कविताओं में 'अस्मिता की खोज' और आत्म-दर्शन की गहरी छाप थी। बाद में कहानियों, निबंधों और नाटकों के माध्यम से उन्होंने हास्य-व्यंग्य के साथ सामाजिक यथार्थ पर तीखी चोट की।

फिल्म जगत और आकाशवाणी से जुड़ाव

'चित्रलेखा' की सफलता के बाद वर्मा कलकत्ता फिल्म कॉर्पोरेशन और 'विचार' पत्रिका से जुड़े। जब फिल्मकार केदार शर्मा ने 'चित्रलेखा' पर फिल्म बनाने की ठानी, तो वर्मा बॉम्बे टॉकीज में पटकथा लेखक के रूप में शामिल हो गए। इस प्रकार उनकी कलम ने परदे पर भी अपनी छाप छोड़ी। 1950 तक 'पतन', 'तीन वर्ष' और 'चित्रलेखा' के साथ वे हिंदी के प्रतिष्ठित उपन्यासकारों की पंक्ति में स्थापित हो चुके थे। आकाशवाणी लखनऊ और दिल्ली से भी उनका दीर्घकालिक संबंध रहा।

प्रमुख कृतियाँ और सम्मान

वर्मा की असली पहचान उपन्यासकार के रूप में है। 'टेढ़े-मेढ़े रास्ते', 'आखिरी दांव', 'अपने खिलौने' और 'भूले-बिसरे चित्र' जैसी बृहद रचनाओं में उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन, जमींदारी के पतन और बदलते सामाजिक मूल्यों का जीवंत चित्रण किया। इनमें से 'भूले-बिसरे चित्र' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया और वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।

विरासत और प्रासंगिकता

भगवतीचरण वर्मा की रचनाएँ केवल साहित्यिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि अपने युग का सामाजिक-सांस्कृतिक आईना हैं। यह उल्लेखनीय है कि 'चित्रलेखा' की दार्शनिक प्रश्न-शृंखला — पाप क्या है और पुण्य क्या? — आज के पाठक को भी उतनी ही बेचैन करती है जितनी नौ दशक पहले के पाठक को करती थी। उनके निधन के बाद भी हिंदी साहित्य में उनकी विरासत जीवित है, और आने वाली पीढ़ियाँ उनसे प्रेरणा लेती रहेंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

संकल्प की ज़रूरत थी। 'चित्रलेखा' की दार्शनिक बहस — पाप-पुण्य की सापेक्षता — आज के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में भी उतनी ही तीखी लगती है, जो इस उपन्यास की कालातीत शक्ति को रेखांकित करती है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उन्हें केवल 'चित्रलेखा के लेखक' तक सीमित कर देती है, जबकि 'भूले-बिसरे चित्र' में जमींदारी के पतन और स्वाधीनता आंदोलन का जो बहुस्तरीय विश्लेषण है, वह आज के सामाजिक-आर्थिक बदलावों को समझने की भी कुंजी दे सकता है। वर्मा की विरासत इस बात का प्रमाण है कि साहित्यिक पुरस्कार और संसदीय पहचान से परे, असली अमरता पाठक के मन में बसती है।
RashtraPress
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवतीचरण वर्मा कौन थे और उनकी पुण्यतिथि कब है?
भगवतीचरण वर्मा हिंदी साहित्य के प्रख्यात उपन्यासकार थे, जिन्हें 'चित्रलेखा' जैसी कालजयी कृति के लिए जाना जाता है। उनकी पुण्यतिथि 5 अक्टूबर को मनाई जाती है; उनका निधन 5 अक्टूबर 1981 को हुआ था।
'चित्रलेखा' उपन्यास किस विषय पर है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
'चित्रलेखा' पाप और पुण्य की दार्शनिक व्याख्या पर केंद्रित उपन्यास है, जो आज भी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। इसकी लोकप्रियता इतनी रही कि फिल्मकार केदार शर्मा ने इस पर फिल्म भी बनाई, जिसमें वर्मा ने स्वयं बॉम्बे टॉकीज में पटकथा लेखन किया।
भगवतीचरण वर्मा को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
भगवतीचरण वर्मा को उपन्यास 'भूले-बिसरे चित्र' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया और वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे।
भगवतीचरण वर्मा ने वकालत क्यों छोड़ी?
1928 में वकालत शुरू करने के बाद उनका मन इस पेशे में नहीं रमा। हमीरपुर में वकालत के दौरान साहित्यिक संगत और 'चित्रलेखा' लेखन की शुरुआत ने उन्हें पूरी तरह साहित्य की ओर मोड़ दिया, और 'चित्रलेखा' की सफलता ने उनके इस निर्णय को सही ठहराया।
भगवतीचरण वर्मा की अन्य प्रमुख कृतियाँ कौन-सी हैं?
वर्मा की प्रमुख कृतियों में 'टेढ़े-मेढ़े रास्ते', 'आखिरी दांव', 'अपने खिलौने', 'पतन', 'तीन वर्ष' और 'भूले-बिसरे चित्र' शामिल हैं। इन उपन्यासों में उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन, जमींदारी के पतन और बदलते सामाजिक मूल्यों का जीवंत चित्रण किया।
राष्ट्र प्रेस
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