भोपाल में ईडी की बड़ी कार्रवाई: पूर्व सरकारी कर्मचारी महेंद्र प्रताप सिंह की ₹1.64 करोड़ की संपत्ति जब्त
सारांश
मुख्य बातें
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के भोपाल जोनल ऑफिस ने 1 अक्टूबर 2026 को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 की धारा 5(1) के तहत मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व असिस्टेंट महेंद्र प्रताप सिंह और उनकी पत्नी रीता सिंह की लगभग ₹1.64 करोड़ की अचल संपत्ति को अस्थायी रूप से जब्त किया है। जब्त की गई संपत्ति में रीवा, मध्य प्रदेश में स्थित एक भूखंड और एक स्कूल भवन शामिल हैं, जिन्हें कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन से बनाया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
ईडी ने यह जांच भोपाल की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) द्वारा महेंद्र प्रताप सिंह के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी (FIR) के आधार पर शुरू की थी। यह FIR भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित) की धारा 13(1)(बी) और 13(2) के तहत — अर्थात ज्ञात आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप में — दर्ज की गई थी।
EOW की जांच पूर्ण होने के बाद रीवा की विशेष अदालत में आईपीसी की धारा 120बी तथा प्रिवेंशन ऑफ करप्शन (संशोधन) एक्ट, 2018 की धारा 13(1)(बी) व 13(2) के तहत चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है।
कितनी बड़ी है कथित अनियमितता
ईडी की जांच के अनुसार, 13 फरवरी 1995 से 9 सितंबर 2020 तक की अवधि के दौरान महेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी ज्ञात आय के स्रोतों का लगभग 191.11 प्रतिशत अतिरिक्त संपत्ति अर्जित की। यह आँकड़ा उनकी वैध आय का लगभग दोगुना है, जो मामले की गंभीरता को रेखांकित करता है।
आरोप है कि महेंद्र प्रताप सिंह ने सरकारी सेवा में रहते हुए अवैध रूप से अर्जित इस धन का उपयोग बीमा पॉलिसियाँ, वाहन, भूखंड और स्कूल भवन खरीदने व बनाने में किया। जाँच में यह भी सामने आया कि वे अपनी संपत्ति के स्रोतों को न्यायिक रूप से स्पष्ट करने में विफल रहे।
जब्त संपत्ति का विवरण
PMLA, 2002 की धारा 5(1) के तहत की गई इस अस्थायी कुर्की में रीवा, मध्य प्रदेश में स्थित एक भूखंड और एक स्कूल भवन शामिल हैं। ईडी के अनुसार, ये संपत्तियाँ सीधे 'अपराध से प्राप्त आय' (proceeds of crime) से अर्जित की गई थीं।
गौरतलब है कि PMLA के तहत अस्थायी कुर्की एक प्रारंभिक कदम है — आगे न्यायनिर्णय की प्रक्रिया के बाद संपत्ति की स्थायी जब्ती या रिहाई तय होती है।
आगे की कार्रवाई
ईडी की ओर से इस मामले में आगे की जांच और कार्रवाई जारी बताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार के मामलों में जाँच एजेंसियाँ अक्सर आरोपी के करीबी सहयोगियों और अन्य बेनामी संपत्तियों की भी पड़ताल करती हैं। यह कार्रवाई मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध चल रहे भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान का हिस्सा मानी जा रही है।