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बिहार के तीन उत्पादों को जीआई टैग: नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग को मिली कानूनी पहचान

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बिहार के तीन उत्पादों को जीआई टैग: नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग को मिली कानूनी पहचान

सारांश

बिहार की तीन सदियों पुरानी विरासत को अब कानूनी पहचान मिल गई है। नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग — तीनों को जीआई टैग मिलने से इन कलाओं के कारीगरों और बुनकरों के लिए नए बाज़ार के द्वार खुलने की उम्मीद है।

मुख्य बातें

नालंदा की बावन बूटी , गया की पत्थरकट्टी और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया।
नाबार्ड और बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों से यह उपलब्धि हासिल हुई।
पत्थरकट्टी शिल्पकला लगभग 300 वर्षों पुरानी है; माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर में यहाँ के ग्रेनाइट का उपयोग हुआ था।
बावन बूटी में 52 प्रकार के बौद्ध एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को हाथकरघे पर बुना जाता है।
पीढ़िया पेंटिंग मुख्यतः महिलाओं द्वारा प्राकृतिक रंगों से बनाई जाने वाली लोक चित्रकला है।

बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों — नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग — को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) और बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों से मिली यह मान्यता राज्य के बुनकरों, शिल्पकारों और ग्रामीण उत्पादक समुदायों के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताई जा रही है।

जीआई टैग का महत्व

जीआई टैग किसी उत्पाद की विशिष्टता, गुणवत्ता और भौगोलिक पहचान को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है, जिससे उसकी नकल या दुरुपयोग रोका जा सकता है। नाबार्ड की ओर से जारी बयान के अनुसार, यह उपलब्धि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक एवं हस्तशिल्प विरासत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। माना जा रहा है कि इससे 'वोकल फॉर लोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे अभियानों को भी बल मिलेगा।

बावन बूटी: नालंदा की अनूठी बुनकरी परंपरा

नालंदा जिले की बावन बूटी बिहार की प्राचीन हाथकरघा परंपरा का एक दुर्लभ उदाहरण है। इस शैली में कपड़े पर 52 प्रकार के पारंपरिक बौद्ध एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को हाथकरघे पर बुना जाता है। इस कला का केंद्र मुख्यतः बसवन बिगहा और आसपास के गाँव रहे हैं, जहाँ पीढ़ियों से बुनकर परिवार इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

पत्थरकट्टी: गया की तीन सौ साल पुरानी शिल्पकला

गया जिले के पत्थरकट्टी गाँव की पत्थर शिल्पकला लगभग 300 वर्षों से अपनी उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है। यहाँ के कारीगर स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थरों से भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, देवी-देवताओं और अन्य कलात्मक प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। यह भी माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर के निर्माण में यहाँ के ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग किया गया था।

पीढ़िया पेंटिंग: भोजपुर की लोक चित्रकला

भोजपुर क्षेत्र की पीढ़िया पेंटिंग बिहार की लोक चित्रकला की एक विशिष्ट शैली है, जिसे मुख्यतः महिलाएँ पारंपरिक पर्व-त्योहारों और सामाजिक अवसरों पर बनाती रही हैं। इस कला में प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से लोक जीवन, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक आस्थाओं और ग्रामीण संस्कृति का सजीव चित्रण किया जाता है।

आगे की राह

जीआई टैग मिलने से इन तीनों उत्पादों के कारीगरों और शिल्पकारों को घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में बेहतर पहुँच मिलने की उम्मीद है। यह मान्यता बिहार की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में भी एक सकारात्मक संकेत है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है — टैग मिलने के बाद कारीगरों तक बाज़ार पहुँच और उचित मूल्य सुनिश्चित करना। देश में दर्जनों जीआई-प्रमाणित उत्पाद ऐसे हैं जो मान्यता के बावजूद व्यावसायिक रूप से हाशिये पर हैं। नाबार्ड की भूमिका केवल टैग दिलाने तक सीमित न रहे — वित्तीय सहायता, बाज़ार संपर्क और निर्यात प्रोत्साहन के बिना यह उपलब्धि कागज़ी ही रह सकती है।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बिहार के किन तीन उत्पादों को जीआई टैग मिला है?
नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किया गया है। यह मान्यता नाबार्ड और बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों से मिली है।
जीआई टैग क्या होता है और इससे कारीगरों को क्या फायदा होगा?
जीआई टैग किसी उत्पाद की विशिष्टता, गुणवत्ता और भौगोलिक पहचान को कानूनी संरक्षण देता है, जिससे उसकी नकल रोकी जा सकती है। इससे कारीगरों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में बेहतर पहुँच और उचित मूल्य मिलने की उम्मीद है।
बावन बूटी क्या है और यह कहाँ बनती है?
बावन बूटी नालंदा जिले की प्राचीन हाथकरघा कला है, जिसमें कपड़े पर 52 प्रकार के पारंपरिक बौद्ध एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को बुना जाता है। इसका मुख्य केंद्र बसवन बिगहा और आसपास के गाँव हैं, जहाँ पीढ़ियों से बुनकर परिवार इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
पत्थरकट्टी शिल्पकला कितनी पुरानी है?
गया जिले के पत्थरकट्टी गाँव की यह शिल्पकला लगभग 300 वर्षों से प्रसिद्ध है। यहाँ के कारीगर स्थानीय काले ग्रेनाइट से बुद्ध, महावीर और देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ बनाते हैं; माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर में भी यहाँ के ग्रेनाइट का उपयोग हुआ था।
पीढ़िया पेंटिंग किस क्षेत्र की कला है और इसे कौन बनाता है?
पीढ़िया पेंटिंग भोजपुर क्षेत्र की लोक चित्रकला शैली है, जिसे मुख्यतः महिलाएँ पर्व-त्योहारों और सामाजिक अवसरों पर प्राकृतिक रंगों से बनाती हैं। इसमें लोक जीवन, पारिवारिक संबंध, धार्मिक आस्थाएँ और ग्रामीण संस्कृति का चित्रण होता है।
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