बिहार में 'कोटे में कोटा' विवाद: संतोष सुमन ने तेजस्वी से माँगा 15 साल का हिसाब
सारांश
मुख्य बातें
बिहार के लघु जल संसाधन मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने 2 सितंबर को पटना में आरक्षण के भीतर आरक्षण यानी 'कोटे में कोटा' की माँग को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेता तेजस्वी यादव पर कड़ा प्रहार किया। सुमन ने कहा कि दलितों को राजनीतिक ज्ञान देने से पहले तेजस्वी को अपने माता-पिता के 15 वर्षों के शासनकाल का हिसाब देना चाहिए।
विवाद की पृष्ठभूमि
आरक्षण की समीक्षा और दलित वर्ग के भीतर सबसे वंचित समुदायों के लिए अलग कोटे की माँग बिहार की राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा बन चुकी है। संतोष सुमन ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी आरक्षण समाप्त करने या किसी का अधिकार छीनने की पक्षधर नहीं है। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का वास्तविक लाभ समाज के सबसे वंचित तबके तक पहुँचे।
उन्होंने कहा कि जैसे ही 'कोटे में कोटा' की चर्चा होती है, कुछ लोग यह अफवाह फैलाने लगते हैं कि 'आरक्षण खत्म हो जाएगा।' सुमन के अनुसार यह भ्रामक प्रचार सामाजिक न्याय की असली बहस को पटरी से उतारने की कोशिश है।
सबसे वंचित समुदायों की पीड़ा
संतोष सुमन ने मांझी, डोम, नट और हलखोर समेत अन्य अत्यंत वंचित दलित समुदायों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये समुदाय आज भी आरक्षण के अपने उचित हिस्से और वास्तविक भागीदारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आरक्षण का लाभ किन जातियों, परिवारों और सामाजिक तबकों तक पहुँच रहा है और किन तक नहीं।
सुमन ने कहा कि सामाजिक न्याय का अर्थ केवल आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाना नहीं, बल्कि उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना भी है।
तेजस्वी यादव पर सीधा हमला
सुमन ने तेजस्वी यादव से कई तीखे सवाल पूछे — सामान्य सीटों पर कितने दलित उम्मीदवारों को टिकट दिया गया, यादव-बहुल क्षेत्रों से कितने दलित प्रत्याशी उतारे गए, और विधान परिषद तथा राज्यसभा में सबसे वंचित दलित समुदायों को कितना प्रतिनिधित्व मिला। उन्होंने कहा कि आरक्षित सीटों पर दलित उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का अवसर संविधान की देन है, न कि किसी राजनीतिक दल या परिवार की कृपा।
सुमन ने यह भी कहा कि दलितों को केवल वोट बैंक के रूप में देखना आसान है, लेकिन दलित नेतृत्व को मजबूत करना वास्तविक सामाजिक न्याय की असली कसौटी है।
नीतीश और मांझी के योगदान का उल्लेख
सुमन ने बिहार में सामाजिक बदलाव के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि असली सामाजिक न्याय तभी संभव होगा जब दलितों को सामान्य सीटों से भी चुनाव लड़ने का अवसर मिले और विधान परिषद, राज्यसभा, मंत्रिमंडल तथा संगठन में उन्हें निर्णय लेने की बराबर भागीदारी हासिल हो।
आगे क्या होगा
सुमन ने दोहराया कि आरक्षण न केवल बना रहेगा बल्कि और मजबूत होगा, और सबसे वंचित समुदायों के लिए 'कोटे में कोटा' सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास जारी रहेंगे। यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार में 2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं और दलित राजनीति एक निर्णायक भूमिका में आ रही है।