कलकत्ता हाईकोर्ट ने रद्द किया 2024 का मामला, कोलाघाट में सुवेंदु अधिकारी के घर पुलिस छापे से था विवाद
सारांश
मुख्य बातें
कलकत्ता हाईकोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को पश्चिम बंगाल के नेता विपक्ष सुवेंदु अधिकारी से जुड़ा एक पुराना कानूनी मामला रद्द कर दिया, जिसकी जड़ें मई 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान पूर्वी मिदनापुर जिले के कोलाघाट में हुई पुलिस छापेमारी में थीं। अदालत के इस फैसले से उस विवादास्पद घटना से उपजी कानूनी कार्यवाही का औपचारिक अंत हो गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
मई 2024 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम बंगाल पुलिस ने कोलाघाट में सुवेंदु अधिकारी के किराए के मकान पर छापा मारा था। पुलिस ने उस समय दावा किया था कि यह कार्रवाई एक वांछित अपराधी की गिरफ्तारी के लिए की गई थी।
घटना के समय सुवेंदु अधिकारी घर पर मौजूद नहीं थे, क्योंकि वे किसी अन्य स्थान पर एक राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल थे। अधिकारी ने आरोप लगाया था कि इस अभियान में लगभग 80 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे।
सुवेंदु अधिकारी के आरोप
तत्कालीन नेता विपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने पुलिस के दावों को सिरे से खारिज करते हुए आरोप लगाया था कि यह छापेमारी चुनाव के दौरान उन्हें राजनीतिक रूप से परेशान करने की साजिश थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने छापे और तलाशी अभियान के दौरान निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया।
अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद अभिषेक बनर्जी पर इस पुलिस कार्रवाई के पीछे मुख्य सूत्रधार होने का आरोप लगाया था। साथ ही उन्होंने दावा किया कि TMC के लिए चुनावी रणनीतिकार के तौर पर काम करने वाली संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के कर्मचारी भी पुलिसकर्मियों के साथ उस दौरान मौजूद थे।
विरोध प्रदर्शन और स्थानीय तनाव
इस घटना के तुरंत बाद स्थानीय भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेताओं और समर्थकों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने मौके पर पहुँचकर पुलिसकर्मियों से तीखी बहस की। यह विवाद चुनाव आचार संहिता के बीच राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर बड़े राजनीतिक टकराव का हिस्सा बन गया था।
अदालत में पुलिस की रिपोर्ट और फैसला
कलकत्ता हाईकोर्ट में दायर अपनी रिपोर्ट में पुलिस ने स्वीकार किया कि कोलाघाट में की गई तलाशी में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला और जब्ती की सूची खाली रही। जाँच आगे नहीं बढ़ी।
इन्हीं परिस्थितियों की समीक्षा के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को मामले को रद्द कर दिया। यह फैसला राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के बीच लंबे समय से चले आ रहे एक कानूनी विवाद का पटाक्षेप करता है।
राजनीतिक संदर्भ और आगे की राह
गौरतलब है कि यह मामला पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और BJP के बीच चुनावी तनाव के चरम पर सामने आया था। आलोचकों का कहना है कि राज्य में विपक्षी नेताओं के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई का यह पैटर्न नया नहीं है। हाईकोर्ट का यह निर्णय भविष्य में ऐसी कार्रवाइयों की जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ सकता है।