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AI शासन पर वैश्विक सर्वे: 85% लोगों ने माना — कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सुरक्षा और शासन को नई चुनौतियाँ

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AI शासन पर वैश्विक सर्वे: 85% लोगों ने माना — कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सुरक्षा और शासन को नई चुनौतियाँ

सारांश

एक वैश्विक सर्वे में 85.4% लोगों ने AI को सुरक्षा और शासन के लिए खतरा माना, 92.6% ने डीपफेक से सामाजिक विश्वास को ख़तरे में बताया। सवाल अब तकनीक का नहीं — जवाबदेही और वैश्विक समावेशिता का है।

मुख्य बातें

85.4% उत्तरदाताओं ने माना कि AI का तीव्र विकास वैश्विक सुरक्षा और शासन के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर रहा है।
92.6% ने चिंता जताई कि डीपफेक और AI-जनित गलत सूचनाएँ सामाजिक विश्वास की नींव कमज़ोर कर सकती हैं।
87.8% को आशंका है कि 'डिजिटल दीवारें' वैश्विक वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग को खंडित कर सकती हैं।
82.6% का मानना है कि विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ को AI प्रशासन नियमों में अधिक भूमिका मिलनी चाहिए।
87.5% उत्तरदाताओं ने समावेशी और सुलभ AI के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की उम्मीद जताई।

एक वैश्विक ऑनलाइन सर्वेक्षण के अनुसार, 85.4 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का तीव्र विकास वैश्विक सुरक्षा और शासन के लिए गंभीर नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहा है। सीजीटीएन द्वारा कराए गए इस सर्वे के निष्कर्ष 21 जुलाई को सामने आए, जो AI प्रशासन को लेकर वैश्विक जनमत की बढ़ती बेचैनी को उजागर करते हैं।

मुख्य निष्कर्ष

सर्वे में 92.6 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने चिंता जताई कि डीपफेक और AI-जनित गलत सूचनाएँ सामाजिक विश्वास की बुनियाद को कमज़ोर कर सकती हैं। वहीं, 87.8 प्रतिशत लोगों को आशंका है कि तकनीकी बाधाएँ और 'डिजिटल दीवारें' वैश्विक वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग को खंडित कर सकती हैं। ये आँकड़े बताते हैं कि AI से उत्पन्न चुनौतियाँ अब केवल प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे सामाजिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक आयाम भी ग्रहण कर चुकी हैं।

विकासशील देशों की भूमिका और समावेशिता

सर्वेक्षण में 82.6 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ को AI प्रशासन के नियमों को निर्धारित करने में अधिक प्रभावशाली भूमिका मिलनी चाहिए, ताकि यह व्यवस्था निष्पक्ष और समावेशी बन सके। इसके अलावा, 87.5 प्रतिशत लोगों ने उम्मीद जताई कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय सुलभ और समावेशी AI को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक प्रयास करेगा, जिससे तकनीक असमानता का नया स्रोत न बने।

AI की बदलती भूमिका: पूर्वानुमान से आकार देने तक

विश्लेषकों के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सबसे गहरा प्रश्न यह नहीं है कि मशीनें मानवों की तरह सोच सकती हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि उनके निर्णयों को किस प्रकार का अधिकार प्राप्त होने लगा है — और यह अधिकार कौन प्रदान करता है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब AI केवल मौजूदा वास्तविकता को दर्ज नहीं करती, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को सक्रिय रूप से आकार देने लगी है।

शासन और जवाबदेही का सवाल

सर्वे के निष्कर्ष यह भी दर्शाते हैं कि वैश्विक जनमत तकनीकी एकाधिकार के बजाय खुलेपन और सहयोग का समर्थन करता है। आलोचकों का कहना है कि नियामक बाधाओं की जगह समावेशिता और साझा लाभ को AI प्रशासन की आधारशिला बनाया जाना चाहिए। AI प्रशासन को मज़बूत करना और व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाना अब एक साझा वैश्विक अनिवार्यता बन गई है।

आगे की राह

ये निष्कर्ष ऐसे समय में आए हैं जब दुनिया भर की सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ AI विनियमन के लिए रूपरेखा तैयार करने में जुटी हैं। गौरतलब है कि यूरोपीय संघ का AI अधिनियम और संयुक्त राष्ट्र की AI सलाहकार समिति की सिफारिशें इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। आने वाले वर्षों में AI शासन का स्वरूप यह तय करेगा कि यह तकनीक मानवता के लिए अवसर बनती है या असमानता का नया कारण।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक विशेष भू-राजनीतिक दृष्टिकोण के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। 'डिजिटल दीवारों' और 'तकनीकी एकाधिकार' जैसी भाषा पश्चिमी तकनीकी वर्चस्व की आलोचना की ओर इशारा करती है। असली प्रश्न यह है कि क्या वैश्विक AI शासन के लिए कोई तटस्थ, बहुपक्षीय मंच उभर सकता है — जहाँ न तो अमेरिकी तकनीकी दिग्गजों का एकाधिकार हो और न ही किसी एक राज्य की नीतिगत प्राथमिकताएँ हावी हों। भारत जैसे देशों के लिए यह एक रणनीतिक अवसर है कि वे ग्लोबल साउथ की आवाज़ को AI प्रशासन में वास्तविक प्रतिनिधित्व दिलाएँ।
RashtraPress
5 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीजीटीएन के AI सर्वे में क्या पाया गया?
सीजीटीएन के वैश्विक ऑनलाइन सर्वेक्षण में पाया गया कि 85.4% उत्तरदाता AI के तीव्र विकास को वैश्विक सुरक्षा और शासन के लिए चुनौतीपूर्ण मानते हैं। इसके अलावा 92.6% ने डीपफेक और AI-जनित गलत सूचनाओं से सामाजिक विश्वास को खतरा बताया।
डीपफेक और AI गलत सूचना से क्या खतरा है?
सर्वे के अनुसार, 92.6% उत्तरदाताओं को चिंता है कि AI-निर्मित डीपफेक और फर्जी सूचनाएँ समाज में विश्वास की बुनियाद को कमज़ोर कर सकती हैं। यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, मीडिया विश्वसनीयता और सार्वजनिक संवाद को प्रभावित कर सकता है।
ग्लोबल साउथ को AI शासन में क्यों अधिक भूमिका मिलनी चाहिए?
सर्वे में 82.6% उत्तरदाताओं ने कहा कि विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ को AI नियम-निर्धारण में अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए, ताकि यह प्रणाली निष्पक्ष और समावेशी बने। अन्यथा AI तकनीक विकसित और विकासशील देशों के बीच असमानता को और गहरा कर सकती है।
AI प्रशासन के लिए वैश्विक सहयोग क्यों ज़रूरी है?
87.5% उत्तरदाताओं ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की उम्मीद जताई ताकि AI तकनीक सुलभ और समावेशी रहे। 87.8% ने यह भी कहा कि 'डिजिटल दीवारें' वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग को नुकसान पहुँचा सकती हैं, जिससे AI शासन में साझा अंतरराष्ट्रीय रूपरेखा की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
AI के निर्णयों की जवाबदेही कौन तय करता है?
यह अभी तक वैश्विक स्तर पर अनुत्तरित प्रश्न है। विश्लेषकों के अनुसार, AI के निर्णयों को मिलने वाले अधिकार और उनकी जवाबदेही का निर्धारण ही भविष्य के AI शासन की सबसे बड़ी चुनौती है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक साझा नियामक ढाँचे की ज़रूरत महसूस कर रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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