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असम: दंपति पर भीड़ हमले के मामले में देबब्रत सैकिया ने AHRC से जांच की मांग की

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असम: दंपति पर भीड़ हमले के मामले में देबब्रत सैकिया ने AHRC से जांच की मांग की

सारांश

लखीमपुर के कोना नदी इलाके में एक दंपति पर कथित भीड़ हमले के बाद कांग्रेस नेता देबब्रत सैकिया ने AHRC का दरवाजा खटखटाया है। ₹5 लाख मुआवजे, आरोपियों की गिरफ्तारी और पुलिस लापरवाही की जांच की मांग के साथ यह मामला असम में भीड़ हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर सवाल खड़ा करता है।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता देबब्रत सैकिया ने 17 जून को असम मानवाधिकार आयोग (AHRC) को ज्ञापन सौंपा।
मामला लखीमपुर जिले के चौलधोवा थाना क्षेत्र के कोना नदी इलाके में कथित भीड़ हमले से जुड़ा है।
आरोप: दंपति के साथ मारपीट, सार्वजनिक अपमान, महिला की गरिमा को ठेस और व्यापारिक प्रतिष्ठान में तोड़फोड़।
पीड़ित दंपति के लिए अंतरिम राहत के रूप में ₹5 लाख मुआवजे की मांग।
संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन का आरोप; पुलिस की कथित लापरवाही की जांच की मांग।
आयोग से भीड़ हिंसा रोकने के लिए नीतिगत सिफारिशें करने का भी आग्रह।

असम विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता देबब्रत सैकिया ने लखीमपुर जिले के चौलधोवा थाना क्षेत्र स्थित कोना नदी इलाके में एक दंपति के साथ कथित भीड़ द्वारा की गई मारपीट, उत्पीड़न और सार्वजनिक अपमान की घटना की तत्काल जांच के लिए असम मानवाधिकार आयोग (AHRC) का दरवाजा खटखटाया है। 17 जून को आयोग के अध्यक्ष को सौंपे गए ज्ञापन में सैकिया ने इस मामले को 'मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन' करार दिया और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की अपील की।

घटना का विवरण

ज्ञापन में लगाए गए आरोपों के अनुसार, लखीमपुर के कोना नदी इलाके में एक दंपति पर कथित तौर पर एक समूह ने हमला किया। पीड़ितों के साथ सार्वजनिक रूप से मारपीट की गई, अभद्र भाषा का इस्तेमाल हुआ और उन्हें अपमानित किया गया। शिकायत में यह भी आरोप है कि महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाई गई और दंपति के व्यापारिक प्रतिष्ठान में तोड़फोड़ कर उन्हें भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया।

संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप

सैकिया ने अपने ज्ञापन में तर्क दिया कि यह घटना संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत नागरिकों को प्रदत्त समानता, स्वतंत्रता, व्यक्तिगत सुरक्षा और सम्मानपूर्वक जीवन जीने के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि भीड़ हिंसा, सार्वजनिक अपमान, महिलाओं पर हमला और संपत्ति को नुकसान जैसी घटनाएं कानून के शासन को कमज़ोर करती हैं और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। गौरतलब है कि असम में भीड़ हिंसा की यह कोई पहली घटना नहीं है — आलोचकों का कहना है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही का अभाव ही इनकी पुनरावृत्ति को बढ़ावा देता है।

AHRC से की गई प्रमुख मांगें

सैकिया ने आयोग से इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने और लखीमपुर जिला पुलिस प्रशासन तथा चौलधोवा थाना प्रभारी से घटना एवं पुलिस कार्रवाई पर विस्तृत रिपोर्ट तलब करने की अपील की। उन्होंने सभी आरोपियों की तत्काल पहचान कर गिरफ्तारी, पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों की कथित लापरवाही की जांच और पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच की भी मांग की।

पीड़ितों के लिए राहत और मुआवजे की मांग

ज्ञापन में पीड़ित दंपति को अंतरिम राहत के रूप में कम से कम ₹5 लाख का मुआवजा देने की मांग की गई है। इसके अतिरिक्त, व्यापारिक प्रतिष्ठान को हुए नुकसान की भरपाई, पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा, निःशुल्क चिकित्सा सुविधा, मनोवैज्ञानिक परामर्श और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की भी अपील की गई है।

भविष्य की नीति पर सिफारिश

सैकिया ने AHRC से यह भी आग्रह किया कि वह राज्य में भीड़ हिंसा की पुनरावृत्ति रोकने और कानून-व्यवस्था को और सख्ती से लागू करने के लिए नीतिगत सिफारिशें करे। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब असम में कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर विपक्षी दल सरकार पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। आयोग की प्रतिक्रिया और पुलिस की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही इस मामले की दिशा स्पष्ट होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

मानवाधिकार आयोग को दी गई शिकायतें महज कागज़ी कार्रवाई बनकर रह जाती हैं। असली परीक्षा यह है कि AHRC पुलिस से रिपोर्ट तलब करने के बाद क्या कार्रवाई करता है — क्योंकि अतीत में ऐसे मामलों में आयोग की सिफारिशें अक्सर लागू नहीं हो पातीं।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लखीमपुर दंपति पर भीड़ हमले का मामला क्या है?
असम के लखीमपुर जिले के चौलधोवा थाना क्षेत्र स्थित कोना नदी इलाके में एक दंपति पर कथित तौर पर एक समूह ने हमला किया। आरोपों के अनुसार, पीड़ितों के साथ सार्वजनिक मारपीट हुई, महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाई गई और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठान में तोड़फोड़ की गई।
देबब्रत सैकिया ने AHRC से क्या मांगें की हैं?
सैकिया ने AHRC से मामले का स्वतः संज्ञान लेने, पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट तलब करने, आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी और पीड़ित दंपति को कम से कम ₹5 लाख का अंतरिम मुआवजा दिलाने की मांग की है। साथ ही पुलिस की कथित लापरवाही की उच्चस्तरीय जांच की भी अपील की है।
इस मामले में किन संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप है?
सैकिया के अनुसार यह घटना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि भीड़ हिंसा और सार्वजनिक अपमान कानून के शासन को कमज़ोर करते हैं।
पीड़ितों के लिए और क्या राहत मांगी गई है?
ज्ञापन में ₹5 लाख मुआवजे के अलावा व्यापारिक नुकसान की भरपाई, पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा, निःशुल्क चिकित्सा सुविधा, मनोवैज्ञानिक परामर्श और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
AHRC से भविष्य के लिए क्या सिफारिश मांगी गई है?
सैकिया ने AHRC से आग्रह किया है कि वह असम में भीड़ हिंसा की पुनरावृत्ति रोकने और कानून-व्यवस्था को सख्ती से लागू करने के लिए राज्य सरकार को नीतिगत सिफारिशें करे। आयोग की प्रतिक्रिया अभी आनी बाकी है।
राष्ट्र प्रेस
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